Pillar of True Journalism to save Public Domain
Showing posts with label social. Show all posts
Showing posts with label social. Show all posts

Friday, November 18, 2011

आपको पता है कि क्या होती है नौटंकी?

'नौटंकी मत करो' ऐसा बार-बार लोगों को बोलते हुए आपने सुना होगा। पर क्या आपको पता है क्या होती है नौटकी? आइए हम आपको बताते हैं। नौटंकी एक जीवंत, लोकप्रिय और प्रभावशाली लोककला है।


यह कला जन-मानस से जुड़ी है। इस विधा में अभिनय थोड़ा लाउड किया जाता था। ठीक पारसी थियेटर की तरह। विषय कई बार बोल्ड रखे जाते थे, डायलॉग तीखे चुभने वाले होते थे। समयांतर इस विधा में विकृति आ गई औऱ इसे अश्लीलता का भी पर्याय माना जाने लगा।


विद्वानों के मुताबिक, यह कहना कठिन है कि नौटंकी का मंच कब स्थापित हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ। किंतु यह सभी मानते हैं कि नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में जिस सट्टक को नाटक का एक भेद माना है, इसके विषय में जयशंकर प्रसाद और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि सट्टक नौटंकी के ढंग के ही एक तमाशे का नाम है।


संगीत प्रधान लोकनाट्य नौटंकी सदियों तक उत्तर भारत में प्रचलित स्वांग और भगत का मिश्रित रूप है। स्वांग और भगत में इस प्रकार घुलमिल गई है कि इसे दोनों से अलग नहीं किया जा सकता। संगीत प्रधान इस लोक नाट्य के नौटंकी नाम के पीछे एक लोक प्रेमकथा प्रचलित है। इसकी जन्मस्थली उत्तर प्रदेश है। हाथरस और कानपुर इसके प्रधान केंद्र है।


हाथरस और कानपुर की नौटंकियों के प्रदर्शन से प्रेरित होकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, मेरठ और बिहार में भी इसका प्रसार हुआ। मेरठ, लखनऊ, मथुरा में भी अलग-अलग शैली की नौटंकी कंपनियों की स्थापना हुई। आज नौटंकी खत्म होती जा रही है, थोड़ा-बहुत जहां बचा है वहां इसका अश्लील पर्याय ही देखने को मिलता है। सरकार की ओर से इसे संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इस कला के प्रेमी आज भी बीते दिनों की याद करते हैं, जब नौटंकी प्रदर्शन जगह-जगह होते थे। उनका मानना हैं कि, बाहर से उजड़ी है, दिल में बसी है- नौटंकी।

साभार: दैनिक भास्कर डॉट कॉम

Thursday, October 6, 2011

एक लड़की के 'दर्द' की दर्दनाक कहानी, सुन आंखे छलक जाएंगी आपकी!


दर्द जब बेदर्द बन जाता है तो इंसान जीने की चाह छोड़ देता है। कोई शख्स कितना भी हिम्मती क्यों ना हो, लेकिन असहनीय दर्द को सहने की बजाय मौत को गले लगाना उचित समझता है। कुछ ऐसा ही हाल है कानपुर की रहने वाली अलका का। एप्लास्टी एनीमिया नामक बीमारी से पीड़ित 21 साल की एक अलका ने कोर्ट से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई है।

उनका कहना है कि सरकार या तो उसका इलाज कराने में मदद करे या फिर उसे इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी जाये। कानपुर शहर के पहाड़ी लाइन में झुग्गी में रहने वाली अलका नौ साल से एप्लास्टी एनीमिया से पीड़ित है। उसके पिता की मौत 1998 में हो चुकी थी। घर पर उनकी बूढ़ी मां सूरजमुखी और एक भाई ब्रज बिहारी रहते हैं। भाई ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्च चलाता है। ऐसे में इतनी खतरनाक और महंगे इलाज की दरकार रखने वाली बीमारी के इलाज के लिए उनके पास धन नहीं है।

भयंकर दर्द से कराहने वाली अलका का इलाज पहले कानपुर के उर्सला और हैलट अस्पताल में हुआ। कोई फायदा न होने पर यहां के डॉक्टरों ने उसका ब्लड टेस्ट कराया तो उसे ब्लड कैंसर की पुष्टि हो गयी। तब डाक्टरों ने उसे मुंबई जाने की सलाह दी। परिवार अपने खेत आदि बेचकर मुंबई गया लेकिन वहां के महंगे इलाज से परेशान हो कर लौट आया। जून 2011 में अलका के मुंह से खून आने पर शहर के डाक्टरों ने उसे तुरंत वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कालेज जाने को कहा। वेल्लोर जाने पर डाक्टरों ने उसकी जांच कर बताया कि इसका इलाज केवल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इस इलाज के लिए 20 लाख रूपये का खर्च होना है।

परिवार इतनी रकम कहां से जुटा पाएगा, यह सोचते हुए अलका ने अदालत से गुहार लगायी गई है कि सरकार इलाज के लिए पर्याप्त रकम दे या उन्हे इच्छा मृत्यु दे दी जाये। अब उसका दर्द असहनीय हो गया है। हालत दिन पर दिन ब दिन खराब होती जा रही है। जल्द इलाज न कराया गया तो दर्द से झटपटाती यह लड़की मर जाएगी।

अलका तिवारी की हालत बिगड़ने पर पीजीआई अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। वहीं कानपुर से सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल ने उसे दिल्ली के एम्स में भर्ती कराने के प्रयास शुरु कर दिये हैं। बसपा के राज्यसभा सांसद गंगाचरण राजपूत इलाज के लिये सांसद निधि से 20 लाख रूपये दिलाने का वायदा किया है।


सूचना साभार dainikbhaskar.com

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | Best Buy Coupons