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Thursday, November 15, 2012

विरोध की बिसात पर फहराया राजनीतिक परचम


मराठियों के 'नायक' तो उत्तरभारतीयों के लिए 'खलनायक' रहे हैं ठाकरे बंधु।

राजनीति के शेर बाल ठाकरे शनिवार दोपहर 3:30 बजे सदा के लिए शांत हो गए। चमत्कार की आस लगाए मातोश्री के बाहर खड़े लाखों शिवसैनिकों का भरोसा टूट गया। 86 साल के ठाकरे 14 नवंबर से ही बेहोशी की हालत में थे। सेहत सुधर रही थी, लेकिन दिल के दौरे ने सारी उम्मीदें तोड़ दी। रविवार को उनका अंतिम संस्कार हुआ है।  अपने कैरियर की शुरुआत एक कार्टूनिस्ट के रूप में करने वाले ठाकरे को उत्तर भारतीयों के खिलाफ घृणा और विरोध के लिए याद किया जाता है। उनका संपूर्ण राजनीतिक कैरियर हिन्दू और मराठी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।

उनकी राजनीतिक विचारधारा उपने पिता केशव सीताराम ठाकरे से काफी प्रभावित थी। भाषा के आधार पर महाराष्ट्र को एक अलग राज्य बनाने वाले आन्दोलन 'संयुक्त महाराष्ट्र मूवमेंट' के वह अग्रणी नेता थे। उन्होंने महाराष्ट्र में गुजरातियों, मारवाड़ियों और उत्तर भारतीयों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ आन्दोलन चलाया था। 1966 में बाल ठाकरे ने 'शिवसेना' के नाम से राजनीतिक दल का गठन किया। अपनी विचारधारा को लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने 1989 में 'सामना' नामक अखबार की शुरुआत की।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए शिवसेना मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीयों को निशाना बनाती रही है। शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में लिखा था कि मुंबई पर पहला हक मराठियों का है। उनके भतीजे राज ठाकरे भी मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीय टैक्सी चालकों के खिलाफ काफी हल्ला बोल कर चुके हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक रोटी उत्तरभारतीयों मुद्दों की गरमाहट पर सिंकती रही है।

ठाकरे, विवाद और बयान


यूपी की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा अपने राज्य को चार भागों में बांटने की घोषणा के बाद शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने धमकी भरे लहजे में कहा था कि यूपी के चाहे जितने भी टुकड़ करो, परंतु महाराष्ट्र अखंड रहेगा। उन्होंने पार्टी के मुखपत्र में लिखा था कि यूपी में भले ही मायावती ने गाय मारी हो, मगर हम महाराष्ट्र में विदर्भ रूपी बछड़े को नहीं मारने देंगे। महाराष्ट्र में भी खुछ लोगों ने दिन में ही राज्य का टुकड़ा कर स्वतंत्र विदर्भ बनाने का सपना देखना शुरू कर दिया होगा। मगर ऐसे सपने देखने वालों के मुंह पर शिवसैनिक और जनता जोरदार तमाचा जड़े बिना नहीं रहेंगे।

बाल ठाकरे के भतीजे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने आज एक बार फिर उत्तर भारतीयों को निशाना बनाते हुए कहा था कि मुंबई में आपराधिक वारदातों के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के मजदूर जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा था कि मुंबई में हो रहे अपराधों के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड से यहां आने वाले मजदूर जिम्मेदार हैं।

उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने मुंबई में रहने वाले बिहार के लोगों के लिए 'परमिट सिस्टम' लागू करने की मांग उठाई थी। उनका कहना था कि महाराष्ट्र में क्राइम कर बिहार जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मुंबई पुलिस को अगर बिहार सरकार की परमिशन की जरूरत है तो हमें भी बिहारियों के लिए मुंबई में 'परमिट सिस्टम' लागू करना चाहिए।

Sunday, March 4, 2012

यूपी चुनाव: रिजल्ट से पहले सियासी बिसात पर गठजोड़ का गणित!


यूपी में चुनाव परिणाम आने से पहले ही सियासी गलियारों में जोड़-तोड़ का गणित शुरू हो चुका है। चुनाव से पहले तक खुद के दम पर सरकार बनाने का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ में लगी हुई हैं। राजनीतिक पंडितों की मानें तो सपा चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे मजबूत स्थिति में रहेगी। ऐसी में सपा की सियासी चाल सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


चुनाव परिणाम छह मार्च को घोषित हो जाएंगे। अब तक के अनुमान के आधार पर यह लग रहा है कि कोई भी पार्टी बहुमत में नहीं आने वाली है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ कर सकती हैं। नए समीकरण के मुताबिक कांग्रेस के प्रति सपा का झुकाव बढ़ा है। रालोद के युवा चेहरे और अजित सिंह के उत्तराधिकारी जयंत के सपा के समर्थन में दिए बयान से साफ जाहिर हो रहा है कि सपा और कांग्रेस को एक करने में रालोद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


हालांकि सपा, कांग्रेस और रालोद के समीकरण में राहुल और सोनिया के साथ केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का अड़ियल रुख अड़ंगा डाल सकता है।बेनी ने कहा है कि यूपी में एसपी से हजार गुना बेहतर बीएसपी है। कांग्रेस को नतीजों के बाद बीएसपी से गठबंधन करना चाहिए। वैसे इस बयान से एक नया समीकरण भी बनता हुआ दिख रहा है। वह यह कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस, बीएसपी से भी हाथ मिला सकती है।


बीजेपी से हाथ मिलाएंगी मायावती?


दूसरा सबसे बड़ा समीकरण बीएसपी और बीजेपी के साथ बनता हुआ दिख रहा है। वैसे अभी तक दोनों ही पार्टियों ने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया है, जिसके आधार पर उनके बीच किसी तरह के गठजोड़ की बात पुख्ता तौर पर कही जा सके। पर दोनों ने इस बारें में कोई नकारात्मक बयान भी नहीं दिया है।


सूत्रों के हवाले से मिली खबर के मुताबिक, बीएसपी सरकार के एक बड़े अधिकारी ने बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के साथ मुलाकात की है। इतिहास पर भी नजर डाला जाए तो दोनों पार्टियों के बीच गठजोड़ की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।


यूपी की राजनीति पूरे देश की राजनीतिक दिशा और दशा तय करती है। सन् 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय पार्टियां खास करके कांग्रेस और बीजेपी ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएंगे जिससे लोकसभा का चुनाव प्रभावित हो। इसमें सपा, बसपा और रालोद जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का सत्ता मोह जरूर प्रभावित होगा और प्रभाव डालेगा। सही मायने में छह मार्च के बाद ही तस्वीर साफ हो पाएगी।

Saturday, December 24, 2011

बज गई रणभेरी, चढ़ गई त्योरियां


बज गई चुनावी रणभेरी
चढ़ गईं उनकी त्योरियां...


नाचने लगी उनकी आंखें
बजने लगे उनके गाल...


बढ़ गई गरीबों की पूछ
आम आदमी हुआ खास...


बहुर गए इनके दिन
झोपड़ी में दिखे राजकुमार...


खड़ंजें पर चली सैंडिल
पगडंडियों पर दौड़ी साइकिल...


कीचड़ में खिला कमल
हाथ का मिला साथ


पर अफसोस...


फिर छा जाएगी मायूसी
फिर सूनी हो जाएगी झोपड़ी


फिर उखड़ जाएंगे खड़ंजें
छूट जाएगा हाथ का साथ


फिर आम आदमी रह जाएगा 'आम'
खास यूं ही बना रहेगा खास


(जैसा कि अभी तक का अनुभव रहा है)

Sunday, November 27, 2011

ऐसे ही बचते रहे 'युवराज' तो बची हुई सीटें ही आएंगी 'हाथ'!

गरीबों के मसीहा। मजलूमों के मददगार। आम के साथ इनका 'हाथ'। भ्रष्टाचार और अत्याचार देख तमतमाया हुआ एंग्री यंगमैन। कुछ इसी अंदाज में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब पूर्वांचल की यात्रा पर निकले तो लगा कि कांग्रेस की काया पलट हो जाएगी। आम आदमी की सहानुभूति मिलेगी। पर यह क्या आम आदमी की बात करने वाले राहुल ने अपनी पूरी यात्रा के दौरान एक बार भी उनकी बात नहीं की। उनसे जुड़े मुद्दों की बात नहीं की। उनसे बात नहीं की। 

राहुल ने बात की तो राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की। सपा, बसपा और भाजपा की। उनकी कमियों की। एक बार भी आम आदमी के दुखों की बात नहीं की, बल्कि उनकी दुखती रग पर प्रहार किया। राहुल ने जब भी गरीबों का गाल सहला कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की, तब मंहगाई और मुश्किलों का तमाचा पड़ा। गरीबों की तरफदारी करने वाला मंहगाई पर मौन रहा।

ऐसे ही देंगे जवाब?

राहुल जब यात्रा पर निकलने वाले थे तो पूरा यूपी 'जवाब हम देंगे' की होर्डिंग से पटा पड़ा था। राहुल ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि आपकी परेशानियों पर जवाब हम देंगे। यहां तो लोगों को जवाब देना तो दूर अपने कार्यकर्ताओं तक को जवाब नहीं दिया गया। राहुल ने कहा कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की रीढ़ तोड़ देने वाला यूपी अब दूसरे राज्यों की ओर देख रहा है। परप्रांत में जाकर विकास में अपनी मेहनत मजदूरी से योगदान दे रहा है। बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता। पर खुद ही राहुल और उनके दिग्गज साथी महंगाई जैसे मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए थे। जब खुद के कार्यकर्ताओं ने मंहगाई का मुद्दा उठाया तो खामोशी की चादर ओढ़ ली। सिद्धार्थनगर में गांव के लोगों ने रोका तो राहुल मुस्कराते हुए गाड़ी से उतरे। वहीं एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा कि ‘महंगाई को लेकर बहुत किरकिरी हो रही है, कुछ कीजिए। वर्ना जनता जीने नहीं देगी।’ इस मुस्कराते हुए राहुल मौन रहे। कोइ प्रतिक्रिया नही दी। 

बांसी रैली के भीड़ से आवाज आई ‘सांसदों के लिए संसद में एक रुपए की चाय, डेढ़ रुपए में दाल, एक रुपए में रोटी मिलती है। जबकि हम लोगों को इतने पैसे में सिर्फ रोटी मिलती है। ऐसी महंगाई क्यों।’ राहुल ने अनसुना कर दिया। सभा स्थल पर एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने माला से स्वागत करने के साथ उन्हे एक पत्र थमाया। इस पत्र में महंगाई के मुद्दे पर बोलने का आग्राह था। यहां भी राहुल ने इस मुद्दे को नजर अंदाज कर दिया। दरअसल, महंगाई और उसके बाद एफडीआई संबंधित केन्द्र सरकार के फैसले ने राहुल गांधी के यूपी दौरे के दौरान बन रहे माहौल को बिगाड़ दिया। राहुल गांधी गरीबों के सबसे बड़े पैरोकार बन कर उभर रहे थे। केन्द्र के निर्णय ने विपक्ष को केन्द्र सरकार और कांग्रेस को घेरने का मंहगाई के साथ नया मुद्दा दे दिया। 

रहे थे ललकार, निकल गई खुद की हवा

इधर राहुल गांधी विपक्ष को ललकार रहे थे तो उधर विपक्ष इनकी यात्रा की हवा निकालने में जुटा हुआ था। राहुल की चुटकी लेते हुए भाजपा नेता उमा भारती ने कहा कि राहुल गांधी को बहुत गुस्सा आता है तो अब मुझे भी गुस्सा आ रहा है। गुस्सा इतना कि वालमॉर्ट का एक भी स्टोर खुला तो आग लगा दूंगी।

मायावती ने कहा कि वह विदेशी कंपनियां यूपी में नहीं खुलने देंगी। राहुल के विदेशी दोस्तों को फायदा पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने रीटेल कारोबार में एफडीआई की अनुमति दी है। इससे छोटे व्यापारियों और किसानों को तो नुकसान होगा। महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी।

पूर्वांचल के दौरे पर थे पर ज्वलंत समस्याओं पर चुप्पी साधे रहे। गोरखपुर जिले में स्थित बन्द पडा खाद कारखाना, दिमागी बुखार की भयावहता, बन्द सुगर मिल, गन्ना किसानों की बदहाली आदि मुद्दों का जिक्र तक नहीं किया। दिमागी बुखार से प्रतिदिन मौतें हो रही है इससे विकलांग हुए लोगों की अलग समस्या है। बाबा राघवदास मेडिकल कालेज संसाधनों की मार झेल रहा है, राष्ट्रीय राजमार्ग की बुरी हालत है। प्रदेश का विभाजन हो रहा है। पर इन तमाम मुद्दों पर राहुल की खामोशी ने पूर्वांचल के लोगों को मायूस किया है। यही कारण था जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा।


ऐसे ही बचते रहे, तो बची हुई सीटें आएंगी 'हाथ'


राजनीति में एक-दूसरे पर छींटाकशी आम बात है, लेकिन सिद्धांतों को तिलांजली दे देना यह साबित करता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं। हर राजनेता और राजनीतिक पार्टी कोरी राजनीति करते हैं। किसी को न तो आम आदमी की फिक्र है ना किसी को विकास, महंगाई और बेरोजगारी जैसी भयंकर समस्याओं से मतलब। एक एक करके हर किसी के चेहरे से मुखौटा उतर जाता है। वही हाल राहुल का है। 

राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी का चेहरा बनकर विधान सभा के मैदान में उतरे हैं। राज्य में सरकार बनाने पार्टी ख्वाब देख रही है। पर जिनके कंधों पर कांग्रेस के उद्धार का भार है, वही नाजुक मुद्दे पर बोलने से इस कदर बचता रहा है। यदि राहुल ऐसे ही बचते रहे, तो इनके हिस्से बची बचाईं सीटें ही हाथ आने वाली हैं। अपने राजनीतिक सलाहकारों की वजह से वह एक बार बिहार चुनाव खो चुके हैं। अब यूपी की बारी है। उसके बाद केंद्र भी हाथ से निकलता दिख रहा है। राहुल का तो कुछ नहीं होगा, लेकिन दिग्गी राजा की गर्दन कटनी तय है। 

Tuesday, October 11, 2011

आडवाणी जी...कहीं ये प्रधानमंत्री बनने की आखिरी कोशिश तो नहीं!!!


महा'रथी' आडवाणी की एक और रथ यात्रा...



भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बिहार के सिताबदियारा से अपनी 'जन चेतना यात्रा' की शुरुआत कर दी है। यात्रा से पहले ही राजनीतिक दांव पेंच और प्रधानमंत्री बनने के कयासों में उलझे आडवाणी ने साफ करना चाहा कि देश में सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है और इस यात्रा का उद्देश्य आम जनमानस के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ चेतना पैदा करना है। उन्होने साफ किया कि इस यात्रा की शुरुआत भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए की जा रही है। देश में सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है। चलिए मान लेते हैं आडवाणी जी की बात। वह सत्ता के लिए नहीं व्यवस्था के लिए यात्रा निकाल रहे हैं। पर कौन समझाए इनको कि व्यवस्था परिवर्तन यात्राओं से नहीं होता, मजबूत इच्छाशक्ति से होता है। जो इन राजनेताओं में होना चाहिए। जिसका इनमें सर्वथा आभाव है।

आडवाणी जी कोई पहली बार रथयात्रा नहीं निकाल रहे हैं। इससे पहले वह 1990 में सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की राम रथयात्रा निकाल चुके हैं। इस यात्रा को देशव्यापी समर्थन मिला था। भारतीय जनता पार्टी इस रथयात्रा से अपने लक्ष्य को साधने में सफल रही। इस राजनीतिक रथयात्रा ने उसे अन्य दलों से अलग एक राष्ट्रीय पहचान और चरित्र भी दिया। कई राज्यों में भाजपा की सरकारें भी बनी। आडवाणी की इस रथयात्रा की सफलता ने भाजपा को केंद्रीय सत्ता तक पहुंचने की राह भी आसान कर दी। इसके बाद आडवाणी ने 1993 में जनादेश यात्रा निकाली। इस यात्रा में उनके साथ पार्टी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी, भैरो सिंह शेखावत और कल्याण सिंह मौजूद थे। इस यात्रा का भी व्यापक प्रभाव देखने को मिला।

सन 1997 में आजादी के पचास साल पूरे होने पर आडवाणी ने स्वर्ण जयंती रथयात्रा निकाली। यह यात्रा भी सफल रही। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2004 से ठीक पहले भारत उदय रथयात्रा निकाली। यह यात्रा लोगों को रास नहीं आई। उस समय केंद्र में भाजपा शासित सरकार थी। सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी थी। जमीन पर कार्यकरने की बजाय इस सरकार ने हवा में ज्यादा पुल बांधे थे। जिसका नतीजा यह हुआ कि तत्कालिक चुनाव में भाजपा के राजग गठबंधन को करारी शिकस्त मिली।

इस बार 2004 से माहौल जुदा है। भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर लोगों में गजब का गुस्सा है। अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पूरे देश को एक कर दिया। लोगों का आक्रोश रामलीला मैदान से ज्यादा देश की सड़कों पर दिखा। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब इस आंदोलन के रंग में रंग गए। राजनीतिक दलों ने लोगों का गुस्सा भांप लिया। भाजपा भी इस मौके को भुनाने के ताक पर लग गई। ऐसे में महारथी आडवाणी को अपनी यात्रा निकालने का यह बेहतर मौका लगा। अभी कुछ दिनों के बाद ही यूपी सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा का चुनाव होने हैं। राजगकी सरकार बनीं तो प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल सकता है। राजग और देश में अपनी स्वाकार्यता बनाने के लिए सही अवसर है; और प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा करने की आखिरी कोशिश भी। इस तरह आडवाणी का रथयात्रा पर जाने का ऐलान करना रथयात्रा के व्यापक मर्म और उसके राजनीतिक निहितार्थ को संदर्भित करता है।




हाईटेक यात्रा के लिए हाईटेक इंतजाम

सोमनाथ से शुरू पिछली रथयात्रा जिसमें मोदी भी थे  साथ

'जन चेतना यात्रा' में इस्तेमाल की जा रही हाईटेक बस आधुनिक सुख-सुविधा संपन्न है। जापानी बस में वे सभी सुविधाएं हैं जो आडवाणी की यात्रा को सुगम और आरामदायक बनाएंगे। इसमें आडवाणी के लिए एक एलसीडी लगाया गया है, जिसपर वह देश और दुनिया की खबरों से अवगत होते रहेंगे। 'मूविंग चेयर' और लिफ्ट की सुविधा है। यात्रा मार्ग में जहां भी आडवाणी को जन समूह को सम्बोधित करने की जरूरत पड़ेगी वह लिफ्ट की सहायता से ऊपर आ जाएंगे।

बस एक मंच के रूप में तब्दील हो जाएगा। इसके लिए लाउडस्पीकर और माइक जैसी चीजों का भी इंतजाम किया गया है। करीब 50 लाख रुपये की बस को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने में और 50 लाख रुपये खर्च हुए हैं। मीडियाकर्मियों के लिए एक बस और एक एम्बूलेंस की भी व्यवस्था है। एक बस में खाने-पीने की चीजें हैं। ड्राइवर के नजदीक स्टीयरिंग के पास वाले स्थान पर भी कैमरे लगाए गए हैं। इनके जरिए ड्राइवर हर वक्त चारों ओर नजर रख सकता है।

Wednesday, October 5, 2011

ये है माया की 'माया': जिसने भी लगाई इज्जत की बाट, उसकी खड़ी कर दी खाट!

यूपी की मुख्यमंत्री मायावती का तेवर इन दिनों देखते ही बन रहा है। पिछले कुछ महिने के हालात पर गौर करें तो माया के फैसलों ने न केवल लोगों को चौंकाया है, बल्कि विपक्षी पार्टियों के हाथ से भी चुनावी मुद्दा करीब छीन लिया है। हाल ही में माया ने माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र तथा श्रम मंत्री बादशाह सिंह को मंत्री पद से तब तक के लिए हटा दिया है, जब तक की ये दोनों मंत्री जांच में निर्दोष साबित नहीं हो जाते। इससे पहले भी वह कई मंत्रियों, बसपा कार्यकर्ताओं और अधिकारियों को दंडित या पदच्यूत कर चुकीं हैं। चुनाव से एन वक्त पहले मायावती का यह रुख चौंकाने वाला है। कोई इसे ऑपरेशन क्लीन का नाम दे रहा है, तो कोई राजनीतिक स्टंट।




जिसने भी लगाई इज्जत की वाट, उसकी खड़ी कर दी खाट





मायावती ने बहुजन समाज पार्टी की छवि को धक्का पहुंचाने वालों को बिना माफ किए तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया। मई 2007 में राज्य की चौथी बार बागडोर सम्भालने मायावती ने अपने कार्यकाल के दौरान 26 प्रभावशाली लोगों को सरकार या पार्टी से निकाल बाहर किया है। इस हिट लिस्ट में तमाम मंत्री, सांसद, विधायक, पार्टी के बडे पदाधिकारी शामिल हैं। लोगों का मानना है कि माया पार्टी या सरकार की छवि को धक्का पहुंचाने वालों को वह बर्दाश्त नहीं करतीं हालांकि निकालने से पहले वह चेतावनी जरुर दे देती हैं। हाल में सांसद धनंजय सिंह और विधायक योगेन्द्र सागर के निलंबन और विधायक अशोक चन्देल की पार्टी से बर्खास्तगी से उन्होंने सबसे पहला झटका सांसद उमाकांत यादव को दिया था। फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर विधानसभा सीट से विधायक आनन्द सेन यादव का खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बनाने के कुछ ही महीनो बाद शशि नाम की युवती के अपहरण मामले में नाम आने पर उन्हें तत्काल मंत्री पद से हटा दिया था।


करीबी लोगों को भी नहीं बक्शा


ऐसा माना जाता है कि मायावती कुछ मामलों में अपने करीबियों को भी नहीं छोड़ती। प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला देने वाले दो-दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या के बाद मायावती ने अपने सबसे नजदीकी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और अनन्त कुमार मिश्र को भी एक झटके में मंत्रिमंडल से निकाल दिया। उनके साथ ही भूमि विकास एवं जल संसाधन मंत्री अशोक कुमार दोहरे, मुस्लिम एवं समाज कल्याण राज्य मंत्री विद्या चौधरी. सूचना मंत्री सुधीर गोयल. राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त पन्ना लाल कश्यप. राज्य मंत्री रघुनाथ प्रसाद शंखवार. राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त इन्तजार आब्दी से भी अलग अलग समय पर विभिन्न वजहों से इस्तीफे ले लिये गये।


विकीलीक्स के तूफान से भी नहीं डगमगाई



मायावती अपने मजबूत इच्छाशक्ति के कारण विकीलीक्स के तूफान को भी यूं ही झेल गईं। इस केबल ने दावा किया था कि मायावती को 'अव्वल दर्जे की अति अहंकारी' है। इन पर प्रधानमंत्री बनने की धुन सवार है। अमरीकी कूटनयिकों की ओर से भेजे गए इस दस्तावेज़ में मायावती के धन एकत्रित करने के तरीक़ों पर चर्चा की गई है और साथ ही उनके व्यवहार की भी। केबल ने माया के करीबियों को भी दगाबाज बताया था। इनके सबसे विश्वासपात्र सतीश चंद्र मिश्र पर भी आरोप लगाया था। पर माया ने विकीलीक्स के आरोपो को बकवास बताते हुए निराधार बताया था।




मायावती को कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली है। उन्होंने अपने दम चार बार मुख्यमंत्री की गद्दी हासिल की है। दलितों की महारानी नाम से ख्यात माया ने कभी भी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया है। इनके जीवन में जितने बार तूफान आया, उतनी बार उभरी हैं। एक राजनेता से ज्यादा एक महिला के रूप में मायावती की तारीफ होनी चाहिए।

तथ्य साभार दैनिक भास्कर डॉट कॉम

Saturday, June 18, 2011

राहुल बाबा तुम कहां हो???

राहुल गांधी इन दिनों नजर नहीं आ रहे हैं। पता नहीं कहां चले गए। गरीबों और कमजोरों पर अत्याचार हो रहा है, लेकिन राहुल बाबा के कानों तक उनकी आवाज शायद नहीं पहुंच रही है। जब भट्टा-पारसौल में यूपी पुलिस ने लोगों के साथ अत्याचार किया था, तो झट से राहुल बाबा लोगों से मिलने गांव चले गए। उनके साथ चौपाल पर अनशन किया। गांव में धारा 144 का जमकर विरोध किया। यूपी सरकार से पूछा कि धारा 144 क्यों लगाया।



वहीं जब रामलीला मैदान में अहिंसात्मक आंदोलन और सत्याग्रह कर रहे लोगों पर लाठियां बरसाई गईं। लोगों के हाथ-पांव तोड़ा दिए गए। सो रहे लोगों पर गोलियां बरसाई गईं। तब हमारे राहुल बाबा कहां थे? जब एक वृद्ध लाठी की मार खाने के बाद अस्पताल में दम तोड़ रही थी तब राहुल बाबा कहां थे? हमें आश थी कि यहां भी राहुल पहुंचेंगे। लोगों के दुख में शरीक होंगे। अपनी सरकार द्वारा लगाए गए धारा 144 का विरोध करेंगे। पर दुख कि वो नहीं आए। दिल टूट गया।



किसी ने बताया कि यूपी और दिल्ली के धारा 144 में अंतर है (यूपी में चुनाव होने वाले हैं)। दोनों घटनाओं में शामिल आम आदमी में अंतर है। वो शायद पहचानते हैं। इसलिए नहीं आए।



हमने तो सोचा था कि आप अन्य राजनीतिज्ञों से अलग हो। आप में देश का भविष्य देखा। पर ये भूल गया कि राजनीति के कीचड़ में कभी कमल नहीं खिल सकता। इस हमाम में सब नंगे हैं।

 
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