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Friday, September 26, 2014

निठारी कांड की पड़ताल: जिद्द और जुनून की रोमांचक दास्तां

निठारी के कथित नर पिशाच सुरेंद्र कोली की फांसी की सजा जब टली तो मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। इस दौरान उसकी मां ने उससे मेरठ जेल में मुलाकात की। पहली बार उसके परिवार की तरफ से उसे फंसाए जाने की बात कही गई। निठारी में इस घिनौने कांड के खुलासे से लेकर कोली की फांसी की सजा के एलान के बीच कई सवाल खड़े हुए। मुख्य आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी किए जाने और कोली द्वारा सारे गुनाह मान लेने जैसी बातों ने मन में संशय पैदा कर दिया।
नोएडा में निठारी के नर पिशाच की शिकार ज्योति का भाई अर्जुन
सच्चाई जानने के लिए हम निकल नोएडा के निठारी गांव पड़े, जहां बच्चों और महिलाओं के साथ खूनी खेल खेला गया था। यहां पीड़ित परिवारों और प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत के बाद कई तथ्य सामने आए। इसकी पड़ताल कोली के गांव गए बिना नहीं हो सकती थी। इसलिए हमने कोली के अल्मोड़ा स्थित गांव मंगरूखाल जाने का निश्चय किया।

हम दिल्ली से निकल पड़े। कुछ भी पता नहीं था कि क्या होने वाला है। मन में मुख्य गुनाहगार के छूटने की कसक और उसे फांसी पर चढ़ाए जाने की आशा थी। हम दिल्ली से कोली के गांव मंगरूखाल की पहाड़ी के नीचे पहुंचे। वहां से कई किमी उपर खड़ी पहाड़ी पर चढ़ाई करनी थी। हम निकल पड़े। हर पांच मिनट बाद सांस फूल जाती। प्यास लगती। किसी भी तरह दुर्गम रास्तों से होते हुए हम गांव में पहुंचे। वहां अजीब परिस्थिति का सामना करना पड़ा। मुझ अजनबी को देख गांव के लोग कन्नी काटने लगे।

किसी तरह से भाषाई (गढ़वाली) समस्या से जूझते हुए कोली के घर तक पहुंचा। उसकी मां देखते ही भड़क गईं। चिल्लाते हुए बोलीं- भाग जाओ, तुम लोगों की वजह से मेरा बेटा मर रहा है। गांव वाले भी कुछ सुनने को तैयार न थे। दो घंटे की कोशिश के बाद किसी तरह कोली की मौसेरी बहन समझने को तैयार हुई। फिर उसने कोली की मां को समझाया। फिर क्या था...शुरू हो गई बातचीत।
मंगरूखाल में फांसी की सजा पाए सुरेंद्र कोली की मां कुंती देवी

हम लगातार पांच घंटे बात करते रहे। गांव में टहलते रहे। उसी दौरान प्रधान भी आ गए। उन्होंने पहले दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन थोड़ी देर की बात के बाद वह भी बदल चुके थे। उनका कहना था कि कोली की वजह से पूरा गांव शर्मसार है। बदनामी के दंश झेल रहा है। पर वे चाहते हैं कि पहले पंढ़ेर को फांसी हो। इसी दौरान दो नए लोग मेरा पीछा करते नजर आए। मुझे शक हुआ। लोगों ने भी शक जताया कि ये लोग पंढ़ेर के आदमी हो सकते हैं। आए दिन गांव में नए लोग दिखाई देते रहते हैं; और कोली के वहां आने वालों पर नजर रखते हैं।

जब मैं गांव से निकलने लगा तो मुझे अकेले जाने से मना कर दिया गया। शाम ढल रही थी। मौसम खराब हो रहा था। गांव के तीन-चार लोग मुझे नीचे गाड़ी छोड़ने आए। उन्होंने कहा कि जब तक आप तीन-चार किमी आगे तक नहीं चले जाएंगे हम लोग यहीं डटे हैं। इस तरह हम वहां से दिल्ली की तरफ रवाना हुए। मन में आज की संतुष्टि और कल की बेचैनी थी। पर एक खतरे से बचने के बाद दूसरा खतरा तैयार था।

मंगरूखाल में सुरेंद्र कोली की मौसेरी बहन श्यामा देवी
मौसम खराब होता जा रहा था। हम मैदान से करीब 300 किमी दूर ऊंचाई पर थे। पहाड़ी में भयंकर बारिश-आंधी का सामना कर रहे थे। नाले-नदी बन चुके थे। रास्ते में पेड़ लोट गए थे। कहीं पानी, तो कहीं पेड़ से रास्ता बंद होता रहा। अंधेरा गहरा चुका था। बारिश की पानी की वजह से कार के शीशे से साफ नहीं दिख रहा था।

पहाड़ी रास्ते पर कब आप नीचे चले जाएं, इसका खतरा दिन में बना रहता है। ऐसे में रात के अंधेरे में वहां चलना जान हथेली पर लेकर चलना था। हमारी मुसीबत यह थी कि हम न तो हर जगह रुक सकते थे, न ही ज्यादा तेज चल सकते थे। जहां रास्ता बंद मिला, वहां रुकना मजबूरी थी। घने जंगल और अंधेरे में पहाड़ी ड्राइवर के भी हाथ-पैर फूल रहे थे।

उसका कहना था कि यहां कब खतरनाक जंगली जानवार सामने आ जाएं, कहा नहीं जा सकता। रास्ते में वैसे भी हिरण, सांभर, भालू, लकड़बग्‍घा टाइप के कई जानवर दिखते जा रहे थे। उनको देख ऐसा लग रहा था कि जंगल के राजा के दर्शन कभी भी हो सकते हैं। वैसे भी वह जिम कॉर्बेट जंगल का एरिया है। ऐसे में आशंका कभी भी सच्चाई में बदल सकती थी। पर कहा गया है न कि जब आप ठान लेते हैं, तो ईश्वर भी आपका साथ देते हैं। हम हर बाधा पार करके आगे बढ़ते रहे। अंतत: अगले दिन सुबह नई मंजिल के करीब पहुंच चुके थे। तीन दिन बीत चुके थे। कई सौ किमी की यात्रा की थकान हावी हो रही थी। तीन दिन से कपड़े तक नहीं बदल पाया था।

चुनौती कोली की पत्नी और भाई को उससे जेल में मिलवाने की थी। डासना जेल के बाहर मेन रोड पर हमारी मुलाकात हुई। उनके मेन वही सवाल था कि आखिरकार मैं क्यूं उनकी मदद कर रहा हूं। मैंने उनको अपने दिल की बात बताई। उसे सुनकर कोली की पत्नी ने कहा कि वह पूरी तरह से हमारी मदद करेगी। वह अपने पति को यूं मरने नहीं देगी। अपने हालात की वजह से वह आठ साल तक सामने नहीं आ सकी थी। हम जेल गए। वहां नंबर आने पर कोली की पत्नी-बच्चे और भाई अंदर चले गए। मैं बाहर खड़ा था। इसी बीच हमने खबर ब्रेक कर दिया।

मुझे नहीं पता था कि हमारे खबर ब्रेक करते ही लोकल मीडिया वहां इतनी जल्दी आ पहुंचेगी। जेल के बाहर मीडिया का जमावड़ा शुरू हो गया। एक रिपोर्टर अपने बॉस से बात करता हुआ नजर आया। वह बोल रहा था- अरे सर, भास्कर वाले फर्जी खबर चला दिए हैं। मैंने कोली के गांव फोन किया था। वे अभी उत्तराखंड से चले ही नहीं हैं। फिर मैं यहां तब तक वेट करूंगा जब तक मुलाकात का सिलसिला चल रहा है। मैं पास में खड़ा मंद-मंद मुस्करता रहा। इसी बीच बुलेट से दो मठाधीश टाइप के जर्नलिस्ट आ गए। वे लोग सीधे जेल में घुस गए। तभी बाहर एक हवलदार आया। उसने आवाज लगाई- सुरेंद्र कोली के घर से कोई आया है क्या? फिर उनक तरफ मुड़ के देखा और बोला- देखो, मैंने कहा था न कि नहीं आए हैं।

अपनी पत्नी शांति देवी के साथ सुरेंद्र कोली और उसकी बच्ची
दरअसल, मीडिया से बचाने के लिए हवलदार ने झूठ बोल दिया। मैं खुश हो गया। क्योंकि मैं भी नहीं चाहता था कि किसी और के सामने वे लोग आएं। इस बीच मेरा दिल धक-धक करता रहा। डर सता रहा था कि कहीं कोली की फैमली की पहचान उजागर न हो जाए। उनकी चिंता भी इसी बात की थी। उनका कहना था कि पहचान उजागर होने के बाद उनको नौकरी तक नहीं मिलेगी। खैर, मुलाकात के दो घंटे हो चुके थे।

उनका इतनी देर तक रहना मेरे लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था। बाहर मीडिया और अंदर उनका इतनी देर तक रहना। तभी सभी लोग गेट से बाहर निकलते दिखाई दिए। अब चुनौती उनको मीडिया की नजरों से बचाए रखते हुए निकाल ले जाना था। मैंने उनको इशारा किया कि जल्दी निकलो। वे लोग तेजी से गाड़ी की तरफ बढ़े। इसी बीच एक मठाधीश टाइप स्ट्रिंगर की नजर उन पर पड़ गई। उसे शक हो गया। वह भी उनके साथ तेजी से आगे बढ़ने लगा। मैंने कोली की फैमली को गाड़ी में बैठा दिया। तब तक वह मेरे पास आ गया।

उसने पूछा- क्या आप सुरेंद्र कोली की फैमली से हैं? मैंने तुरंत कहा- अरे, नहीं हम तो विधायक जी से मिलने आए थे। उसने सॉरी बोला और वापस चला गया। अब जाकर मेरी सांस में सांस आई। मैं खुश था। मैंने ड्राइवर से बोला कि जितनी तेज गाड़ी चला सकते हो चलाकर यहां से निकल लो। इस तरह मैं अपने वादे के मुताबिक, उनकी पहचान छिपाने में सफल रहा।

इसके बाद इनको लेकर ऑफिस गया। वहां हमने कुछ देर रिलैक्स किया। उसके बाद शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला। इस दौरान कोली की पत्नी ने अपने पति से बातचीत के आधार पर कई खुलासे किए। पहली बार कोली की बात उसकी पत्नी के माध्यम से बाहर आई। इन बातों और तथ्यों को मैंने स्टोरी और वीडियो के माध्यम से आप सभी के सामने पेश किया है। आशा है कि पंढेर जैसे शातिर नर पिशाच को सजा जरूर होगी।

निठारी से लेकर मंगरूखाल और डासना जेल से एक्सक्लूसिव रिपोर्ट...

Monday, October 29, 2012

'मीडिया ट्रायल की बात निराधार'


ट्रायल मुकदमे का होता है, आरोपी का होता है, वह भी जांच के बाद। ट्रायल अदालत में होता है, वह भी तब जबकि पुलिस या ऐसी कोई अन्य राज्य शक्तियों से निष्ठ संस्था मामला वहां ले जाए या अदालत स्वयं संज्ञान लेकर जांच कराए। ट्रायल के बाद किसी को सजा मिलती है, तो कोई छूट जाता है। बहुस्तरीय न्याय व्यवस्था होने के कारण कई बार नीचे की अदालतों का फैसला ऊपर की अदालतें खारिज ही नहीं करतीं बल्कि यह कहकर कि निचली अदालत ने कानून की व्याख्या करने में भूल की, फैसला उलट भी देती हैं। ऐसा भी होता है कि कई बार सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय के फैसले को न केवल उलट देता है बल्कि निचली अदालत की समझ की तारीफ भी करता है। तात्पर्य यह कि जहां सत्य जानने और जानने के बाद अपराधी को सजा दिलाने की इतनी जबरदस्त प्रक्रिया हो, वहां क्या मीडिया ट्रायल हो सकता है?

ट्रायल अखबारों या टीवी चैनलों के स्टूडियो में नहीं होना चाहिए। क्या भारतीय मीडिया अदालतों की इस मूल भूमिका को हड़प रही है? एक उदाहरण लें। चुनाव के महज कुछ वक्त पहले सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील एक जिले के मुख्य चौराहे पर एक बम विस्फोट होता है। एक चैनल के कैमरे में एक दृश्य कैद होता है, जिसमें दिखाई देता है कि दो लोग एक कार में भाग रहे हैं। चैनल के रिपोर्टर द्वारा यह भी पता लगाया जाता है कि इस कार का नंबर जिस व्यक्ति का है, वह राज्य के एक प्रभावशाली नेता का भतीजा है। वह नेता उस क्षेत्र से चुनाव लड़ रहा है।

क्या सीआरपीसी की धारा 39 का अनुपालन करते हुए चुपचाप यह टेप क्षेत्र के पुलिस अधिकारी को देने के बाद मीडिया के दायित्य की इति-श्री हो जाती है? क्या यह खतरा नहीं है कि पूरे मामले को वह नेता महोदय दबा दें? यह संभव है कि जो लोग भाग रहे हों, वे निर्दोष दुकानदार हों या फिर अपराधियों ने ही उस कार को हाइजैक कर लिया हो, जो बाद की तफ्तीश से पता चले। लेकिन क्या यह उचित नहीं होगा कि सारे तथ्य जन संज्ञान में इसलिए लाए जाएं ताकि कोई सत्ताधारी प्रभाव का इस्तेमाल कर बच न सके? दोनों खतरों को तौलना होगा। एक तरफ व्यक्ति गरिमा का सवाल है और दूसरी तरफ जनता के विश्वास का या यूं कहें कि संवैधानिक व्यवस्था पर और प्रजातंत्र पर जनता की आस्था का सवाल।

फिर अगर मीडिया की गलत रिपोर्टिंग से किसी का सम्मान आहत हुआ है तो उसके लिए मानहानि का कानून है लेकिन अगर सत्ता में बैठा कोई नेता आपराधिक कृत्य के जरिए सांप्रदायिक भावना भड़का कर फिर जीत जाता है और मंत्री बनता है, उसके लिए बाद में कोई इलाज नहीं है। ऐसे में क्या यह मीडिया का दायित्व नहीं बनता कि तथ्यों को लेकर जनता में जाए और जनमत के दबाव का इस्तेमाल राजनीति में शुचिता के लिए करे? क्या मीडिया मानहानि के कानून से ऊपर है?

जब संस्थाओं पर अविश्वास का आलम यह हो कि मंत्री से लेकर विपक्ष तक विवादित दिखाई दें तो क्या मीडिया तथ्यों को भी न दिखाए? आज हर राजनेता जो भ्रष्टाचार का आरोपी है एक ही बात कह रहा है - 'जांच करवा लो, मीडिया ट्रायल हो रहा है।' मूल आरोप का जवाब नहीं दिया जा रहा है कि संपत्ति तीन साल में 600 गुना कैसे हो जाती है। कैसे एक कंपनी झोपड़पट्टी में ऑफिस का पता देकर करोड़ों का खेल करती है। जांच करवाने की वकालत करने वाले यह जानते हैं कि जांच के मायने अगले कई वर्षों तक के लिए मामले को खटाई में डालना है। अगर आरोपपत्र दाखिल भी हो जाए तो तीन स्तर वाली भारतीय अदालतों में वह कई दशकों तक मामले को घुमाते रह सकता है और कहीं इस बीच उसकी सरकार आ गई तो सब कुछ बदला जा सकता है।

दरअसल, यह सब देखना कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही है, वित्तीय व कानून की संस्थाओं का काम था। जब उन्होंने नहीं किया तब मीडिया को इसे जनता के बीच लाना पड़ा। अगर ये संस्थाएं अपना काम करतीं तो न तो किसी की संपत्ति तीन साल में 600 गुना बढ़ती, न ही ड्राइवर डायरेक्टर बनता और न ही फर्जी कंपनियां किसी नेता की कंपनी में पैसा लगातीं। यहां एक बात मीडिया के खिलाफ कहना जरूरी है। मीडिया को केवल तथ्यों को या स्थितियों को जनता के समक्ष लाने की भूमिका में रहना चाहिए। जब स्टूडियो में चर्चा करा कर एंकर खुद ही आरोपी से इस्तीफे की बात करता है तो वह अपनी भूमिका को लांघता है। मीडिया की भूमिका जन-क्षेत्र में तथ्यों को रखने के साथ ही खत्म हो जाती है, बाकी काम जनता और उसकी समझ का होता है। अगर इसे मीडिया ट्रायल की संज्ञा दी जाती है तो वह सही है।

एक अन्य प्रश्न भी है। क्या वजह है कि आज भी भ्रष्टाचार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है? और जिन पर आरोप सालों से रहा है, वो या तो सरकर में हैं या सरकार बना -बिगाड़ रहे हैं। यह सही है कि मीडिया का किसी के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाना बेहद गलत है। यह भी उतना ही सही है कि अगर किसी पर मीडिया ने ऐसे आरोप लगाए जो बाद में अदालत से निर्दोष साबित हों तो, मीडिया को कठघरे में होना चाहिए क्योंकि वह गलत सिद्ध हुआ, पर अगर यही आरोप ऊपर की अदालत से फिर सही सिद्ध हो जाए, तब क्या कहा जाएगा? क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि मीडिया सही साबित हुआ? एक और स्थिति लें।

अगर इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट फिर से हाईकोर्ट के फैसले को उलट दे तो, मीडिया एक बार फिर गलत साबित होगा। कहने का मतलब यह कि मीडिया सही था या गलत यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आरोपी में सीढ़ी दर सीढ़ी लडऩे का माद्दा कितना है। यानी, सत्य उसके सामथ्र्य पर निर्भर करेगा। यही कारण है कि आज देश में जहां तीन अपराध के मामले हैं, वहीं केवल एक सिविल मामला। ठीक इसके उलट ऊपरी अदालतों में यानी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अगर तीन मामले सिविल के होते हैं तो केवल एक अपराध का। कारण साफ है, जो समर्थ है, वह किसी स्तर तक अदालतों के दरवाजे खटखटा सकता है। अपराध में सजा पाने वाला अपनी मजबूरी के कारण निचली अदालतों से सजा पाने के बाद जेल की सलाखों को ही अपनी नियति मान लेता है। उसके लिए सत्य की खोज की सीमा है। ऐसे में मीडिया क्या करे? क्या तथ्यों को देना बंद कर दे?

लेखक- एनके सिंह, वरिष्ठ पत्रकार (दैनिक भास्कर से साभार)

Sunday, October 28, 2012

मीडिया की ताकत!


आज समाज में विश्वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है.

मीडिया की ताकत क्या है? अगर मीडिया के पास कोई शक्ति है, तो उसका स्रोत क्या है? क्यों लगभग एक सदी पहले कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो? सरकार को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. न्यायपालिका अधिकारों के कारण ही विशिष्ट है. विधायिका की संवैधानिक भूमिका है, उसे संरक्षण भी है. पर संविधान में अखबारों, टीवी चैनलों या मीडिया को अलग से एक भी अधिकार है? फिर मीडिया का यह महत्व क्यों?

जिसके पीछे सत्ता है, जिसे कानूनी अधिकार मिले हैं, सीमित-असीमित, वह तो समाज में सबसे विशिष्ट या महत्वपूर्ण है ही, पर मीडिया के पास तो न संवैधानिक अधिकार है, न संरक्षण. फिर भी उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. क्यों?
मीडिया के पास महज एक और एक ही शक्ति स्रोत है. वह है उसकी साख. मीडिया का रामबाण भी और लक्ष्मण रेखा भी. छपे पर लोग यकीन करते हैं. लोकधारणा है कि शब्द, सरस्वती के प्रसाद हैं. सरस्वती देवी, विद्या, ज्ञान की देवी या अधिष्ठात्री हैं. वे सबसे पूज्य, पवित्र और ईश्वरीय हैं. ज्ञान का संबंध जीवन के प्रकाश (सच, तथ्यपूर्ण, हकीकत, यथार्थ वगैरह) से है, अंधेरे (झूठ, छल, प्रपंच, छद्म वगैरह) से नहीं.

सरस्वती हमारे मानस में प्रकाश की, ज्ञान की, मनुष्य के अंदर जो भी सर्वश्रेष्ठ-सुंदर है, उसकी प्रतीक हैं. इसलिए छपे शब्द, ज्ञान या प्रकाशपुंज के प्रतिबिंब हैं. इसलिए हमारे यहां माना गया है कि छपे शब्द गलत हो ही नहीं सकते. सरस्वती के शब्दों पर तिजारत नहीं हो सकती. यही और यही एकमात्र मीडिया की ताकत है. शक्ति- स्रोत है. लोग मानते हैं कि जो छपा, वही सही है. टीवी चैनल, रेडियो, इंटरनेट, ब्लाग्स वगैरह सब इसी ‘प्रिंट मीडिया’ (छपे शब्दों) के ‘एक्सटेंशन’ (विस्तार) हैं. इसलिए इनके पास भी वही ताकत या शक्ति-स्रोत है, जो प्रिंट मीडिया के पास थी.

इस तरह, मीडिया के पास लोक साख की अपूर्व ताकत है. यह संविधान से भी ऊपर है. इसलिए संविधान के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ (जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं) भी मीडिया की इस अघोषित साख के सामने झुकते हैं. न चाहते हुए भी उसकी ताकत-महत्व को मानने-पहचानने के लिए बाध्य हैं. पर, मीडिया जगत को महज अपनी असीमित ताकत, भूमिका और महत्व का ही एहसास है, लक्ष्मण रेखा का नहीं. और लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का बार-बार अवसर नहीं मिलता! यह लोक जीवन का यथार्थ है. मीडिया अपनी एकमात्र पूंजी साख को बार-बार दावं पर लगाने लगे, तो क्या होगा? दावं पर लगाने के लिए फिर कोई दूसरी पूंजी नहीं है. ‘91 के उदारीकरण के दोनों असर हुए, अच्छे व बुरे भी. जीवन-देश के हर क्षेत्र में. मीडिया में भी. 1991 से ही शुरू हुई, पेज-थ्री संस्कृति. यह नयी बहस कि मीडिया का काम मनोरंजन करना है और सूचना देना भर है. इसी दौर में मीडिया में बड़ी पूंजी आयी, नौकरी की शर्तें बेहतर हुईं, पर यह सिद्धांत भी आया कि अब यह शुद्ध व्यवसाय है. विज्ञापन का व्यवसाय. खबरों का धंधा. इसका मकसद भी ‘अधिकतम मुनाफा’ (प्राफिट मैक्सिमाइजेशन) है.

1991 के उदारीकरण के बाद नया दर्शन था, हर क्षेत्र में निवेश पर कई गुणा रिटर्न या आमद यानी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन. पर, जीवन के यथार्थ कुछ और भी हैं. जैसे रेत से तेल नहीं निकलता. उसी तरह मीडिया व्यवसाय में भी नैतिक ढंग से, वैधानिक ढंग से, स्वस्थ मूल्यों के साथ ‘अधिकतम वैधानिक कमाई’ की सीमा थी. चाहे प्रिंट मीडिया हो या न्यूज चैनल या रेडियो वगैरह.

तब शुरू क्या हुआ?

साख से सौदेबाजी. अपनी एकमात्र नैतिक ताकत की नीलामी! हुआ तो बहुत कुछ है, पर इसके पहले बताते चलें कि हो क्या सकता था? ईमानदारी से मीडिया के धुरंधर और बड़े लोग कोशिश करते कि ‘मीडिया का ईमानदार आर्थिक मॉडल’ ढ़ूंढ़ा जाये. इसके रास्ते थे, बड़ी तनख्वाहों पर पाबंदी लगती या कटौती होती. अखबारों की कीमतें बढ़ायी जातीं. समाज को बताया जाता कि ईमानदार मीडिया चाहते हैं, तो अखबार की अधिक कीमत देनी पड़ेगी. मुफ्त अखबार (दो-तीन रुपये में) चाहिए और ईमानदार पत्रकारिता, यह संभव नहीं. पाकिस्तान के अखबार आज भारत के अखबारों से काफी महंगे है, पर वे बिकते हैं. यह उल्लेख करना सही होगा कि पाकिस्तान की मीडिया ने वहां के तानाशाहों के खिलाफ जो साहस दिखाया, वह साहस तो भारत में है ही नहीं. वह भी भारतीय लोकतंत्र के अंदर. फिर भी गरीब पाकिस्तानी अधिक कीमत देकर अपनी ईमानदार मीडिया को बचाये हुए है.

गांधी ने जब अपनी पत्रिका ‘इंडियन ओपिनियन’ शुरू की थी, तो उन्हें इस द्वंद्व से गुजरना पड़ा. वगैर विज्ञापन, पत्रिका घाटे का सौदा थी. विज्ञापन से समझौते की शर्तें शुरू होती थीं. साख या मीडिया की एकमात्र नैतिक ताकत से सौदेबाजी, उन्हें पसंद नहीं आयी. इस द्वंद्व पर उन्होंने बहुत सुंदर विवेचन किया है. उदारीकरण के बाद उनका यह विवेचन, भारतीय मीडिया के लिए आदर्श हो सकता था. रोल मॉडल या लाइट हाउस की तरह पथ प्रदर्शक. पर हमने क्या रास्ता चुना? आसान-सुविधाजनक!
इसकी शुरुआत भी बड़े लोगों ने की. पहले ‘एडवरटोरियल’ छपने लगे. खबर या रिपोर्ट की शक्ल में विज्ञापन. फिर पार्टियों की तसवीरें छपने लगीं, पैसे लेकर. फिर शेयर बाजार का उफान (‘बूम’) आया. कंपनियों के शेयर लेकर उन्हें प्रमोट करने का काम मीडिया जगत करने लगा. इस प्रक्रिया में हर्षद मेहता, केतन पारिख, यूएस-64 जैसे न जाने कितने लूट या सार्वजनिक डाका प्रकरण हुए. कितने हजार या लाखों करोड़ डूब गये या लूटे गये? मीडिया का तो फर्ज था, इन लोभी ताकतों से देश को आगाह करना. यह सवाल मीडिया उठाता कि रजत गुप्ता जैसे इंसान (जिस आदमी ने उल्लेखनीय बड़े काम किये, इंडियन बिजनेस स्कूल, हैदराबाद की स्थापना के अतिरिक्त अनेक काम) ने भी गलती की, तो अमेरिकी कानून ने दोषी माना. सख्त सजा दी. उस इंसान को जिसका समाज के प्रति बड़ा योगदान रहा है. देश-विदेश के कारपोरेट वर्ल्‍ड में.

पर भारत में कितने हर्षद मेहता, केतन पारिख या यूएस-64 के लुटेरे या राजा या कनिमोझी या कलमाड़ी जैसे लोगों को सजा मिली? सार्वजनिक लूट के लिए आज तक भारत में किसी को सजा मिली है? मीडिया का धर्म था यह देखना. मीडिया ने 1991-2010 के बीच यह नहीं देखा. परिणाम आज देश में घोटालों का भूचाल-विस्फोट का दौर आ गया है.

पर, मीडिया में भी खबरें बिकने लगीं. ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत का दौर. खबर, जिसपर लोग यकीन करते हैं, वही बिकने लगी. एकमात्र साख से सौदेबाजी. फिर 2जी प्रकरण हुआ. मीडिया जगत के बड़े स्तंभ, नाम और घराने इसमें घिरे. अब ताजा प्रकरण जिंदल और जी न्यूज विवाद का है. इसके पहले भी इंडियन एक्सप्रेस में कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य चैनलों के बारे मे कह चुके हैं कि कैसे उनके टॉप लोग आकर धमकी देते हैं. विज्ञापन मांगते हैं! हम नहीं जानते कौन सही है या कौन गलत! हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि मीडिया में होने के कारण, हम सब इसके लिए जिम्मेवार हैं. कुछेक दोषी, कुछेक पाक-साफ, यह कहना या बताना भी हमारा मकसद नहीं.

पर, मीडिया अपनी आभा खो रही है. उसका सात्विक तेज खत्म हो रहा है. समाज में उसके प्रति अविश्वास ही नहीं, नफरत भी बढ़ रही है. यह किसी बाहरी सत्ता के कारण या हस्तक्षेप के कारण नहीं, खुद हम मीडिया के लोग कालिदास की भूमिका में हैं. साख की जिस एकमात्र डाल पर बैठे हैं, उसे ही काट रहे हैं. क्या मीडिया के अंदर से यह आवाज नहीं उठनी चाहिए कि हम अपनी एकमात्र पूंजी, साख बचायें? यह सवाल आज बहस का विषय नहीं. एक दूसरे पर दोषारोपण का भी नहीं. हम सही, आप गलत के आरोप-प्रत्यारोप का भी नहीं. हर मीडियाकर्मी अपनी अंतरात्मा से आज यह सवाल करे, तो शायद बात बने!

आज समाज में विश्वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है. इसके लिए बड़े मीडिया घरानों को एक मंच पर बैठना होगा. निजी हितों और पूर्वग्रह से ऊपर उठना होगा. अपने लोभ और असीमित धन कमाने की इच्छा को रोकना होगा. इस प्रयास से मीडिया को अपनी साख पुन: बनाने का अवसर मिलेगा. मीडिया की साख बढ़ेगी, आर्थिक विकास तेज होगा, तो इसका लाभ मीडिया उद्योग जगत को भी मिलेगा.

मुद्दा है, संयम से काम करने का, अनुशासन में काम करने का और अचारसंहिता बना कर मीडिया की सही भूमिका में उतरने का. इसके साथ ही मीडिया की पहल पर कोई कारगर संवैधानिक व्यवस्था बने, तो मीडिया में वैल्यूज-इथिक्स (मूल्य-अचारसंहिता) की मानिटरिंग (निगरानी) करे. अगर मीडिया की सहमति से यह सब हो, तो मीडिया सचमुच भारत बदलने की प्रभावी भूमिका में होगी. याद करिए, कुछेक वर्ष पहले चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिजनेस पेपर (पिंक पेपर्स) के बारे में क्या कहा था? बड़े संगीन और गंभीर आरोप लगाये थे. उदाहरण समेत. कहा, कैसे खराब कंपनियों के शेयर भाव अचानक बढ़ाये जाते हैं और अच्छी कंपनियों के भाव गिराये जाते हैं? यह खेल कौन और कैसे अखबार करते हैं, यह सबको पता है.

प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर एडीटर्स गिल्ड ने तब कमेटी भी बनायी. इससे अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकार भी जुड़े. कमेटी की रिपोर्ट आयी. उस रिपोर्ट को मीडिया में लागू करने की बात उठी, पर सबकुछ भुला दिया गया. मीडिया घराने सार्वजनिक क्षेत्र या जीवन से जुड़े हैं. आज के माहौल में जरूरत है कि वे सभी अपने कामकाज को सावजनिक और पारदर्शी बनाये. अंतत: इससे, इनके प्रति आस्था बढ़ेगी. इसी तरह यह काम आज मीडिया के हित में तो है ही, समाज के हित में है और देश के हित में भी.

हरिवंश - (लेखक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं) प्रभात खबर से साभार

Monday, November 21, 2011

हम जाहिल हैं, आरोप अच्छा है: आशुतोष

मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है। वह अपनी भूमिका ठीक से निभाएगा तभी सरकारों और नेताओं को तकलीफ होगी। नेताओं को तकलीफ होगी तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा। वरना नेता तो चाहते हैं कि लोकतंत्र सोता रहे। 


नया-नया जर्नलिज्म में आया था। अयोध्या का आंदोलन उफान पर था। बनारस में दंगे हुए थे। मुझे कवर करने के लिए भेजा गया था। वहां कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत हो रही थी। वे कह रहे थे कि पत्रकारिता की नई गंगा अब बनारस से निकलेगी। दंगों के दौरान की रिपोर्टिंग देख मैं पहले से ही सदमे में था। सब के सब उग्र हिंदूवादी रंग मे रंगे थे। 

रिपोर्ट के नाम पर अफवाहें खबर बन रही थीं। दिल्ली से जाने के बाद उन खबरों की पुष्टि मैंने कई बार करने की कोशिश की। हर बार प्रशासन ने कहा, तथ्यहीन। नामी-गिरामी अखबारों की खबर एक खास समुदाय को टारगेट करके, उनको विलेन बताने के मकसद से लिखी जाती थी। लौटकर मैंने एक छोटा-सा बॉक्स बनाया था, जिस पर एक अखबार के मालिक इतने नाराज हो उठे कि मेरी शिकायत संपादक से कर दी। संपादक जी की कृपा से मैं बच गया। 

अयोध्या विवाद खत्म होते-होते मैं टीवी में आ गया। पहले सिर्फ दूरदर्शन था, सरकार का प्रेस रिलीज विभाग। निजी प्रोड्यूसरों ने खबरों को नया तेवर दिया। देखते-देखते दूरदर्शन के ये बुलेटिन फिनामिना बन गए। बुलेटिन से निकल कर टीवी चैनल में तब्दील हो गया। 2004 तक सब ठीक-ठाक चला। अचानक नंबर एक बनने की दौड़ शुरू हो गई और नई तरह की खबरों को परोसने का सिलसिला भी। सबसे पहले एमएमएस का बाजार गरम हुआ था। 

हर चैनल पर एमएमएस की खबरें ही दिखने लगीं। अपराध जगत की खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने का अंदाज भी इस दौर में ईजाद किया गया। नाट्य रूपांतरण होने लगे। मुझे याद है इस बीच एक वीडियो क्लिप करीना और शाहिद कपूर का कहीं सेलफोन वाले के हाथ लग गया था। ‘लिप टू लिप किस’ एक चैनल पर चला तो दूसरे भी कहां पीछे रहते। न तस्वीर को धुंधला किया गया और न पहचान छिपाने की कोशिश। न्यूजरूम में पहली बार विरोध के स्वर संपादकों को सुनने पड़े। असल रिपोर्टर दंग थे। नकल रिपोर्टर मस्त। 

किसी चैनल पर चला कि फलां आदमी शाम चार बजे मरने वाला है। ओबी वैन दौडऩे लगीं। बेशर्म होकर पत्रकारों ने दिन भर उस शख्स पर लाइव किया। किसी ने एक और खबर निकाल ली। एक शख्स यमराज से मिल कर आया था। उसका लाइव भी खूब हुआ। इस बीच पुनर्जन्म की भी लॉटरी निकल आई। स्टूडियो में ऐसे गेस्ट लाने के लिए चैनलों के बीच मारपीट होने लगी। मंदिर का रहस्य सफलता की गांरटी हो गया। 

नंबर वन की रेस और तेज हुई तो सांप-बिच्छू और भूत-प्रेत ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, आडवाणी की जगह ले ली। एलियन भी टीवी पर छाने लगे। नंबर वन की इस रेस में जब कुछ चैनल कामयाब हुए तो बाकी चैनलों ने भी यही आसान रास्ता पकड़ लिया। अब न्यूजरूम में हर शख्स खबरों की जगह टीआरपी की जुगाड़ में लग गया। एडिट मीटिंग्स में खबरों की जगह आधे घंटे के प्रोग्राम की बात होने लगी। रिपोर्टर की जगह स्ट्रिंगरों ने ले ली। चैनल अब एडिटर के हाथ से निकल कर असिस्टेंट प्रोड्यूसर के हाथ में चला गया। 

शायद ही कोई चैनल हो, जिसने ये रास्ता न पकड़ा हो या किसी न किसी रूप में इस रास्ते पर चलने की कोशिश न की हो। कुछ कामयाब थे और कुछ नाकामयाब। कोशिश सभी ने की थी। इन दिनों मंै अक्सर बनारस के उन दिनों को याद कर लिया करता था। खबरों की बलि तब भी चढ़ी थी। उस वक्त भी खबरों की जगह कहानी-किस्सों ने ली थी और इस दौर में भी। तब विचारधारा की आड़ में, इस दौर में टीआरपी की आड़ में बिसात बिछाई गई। 

ऐसा नहीं था कि उस दौर में अच्छे अखबार और अच्छे पत्रकार नहीं थे। इस दौर में भी अच्छे चैनल और अच्छे पत्रकार थे। इस दौर में भी टीवी ने कुछ बहुत अच्छे काम किए थे। दहेज हत्या, स्त्री उत्पीडऩ, भ्रूण हत्या के खिलाफ जबरदस्त कैंपेन, सांप्रदायिकता का तगड़ा विरोध। दंगों को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं हुई। टीवी ने आम आदमी को बात कहने का एक मजबूत प्लेटफार्म दिया। घूस और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े स्टिंग ऑपरेशन किए गए। पहली बार मैंने कैमरे को देख कर पुलिस और नौकरशाहों को कांपते देखा। 

देश के एक कोने के त्योहार को देश के दूसरे कोने तक पहुंचाने का काम भी टीवी ने किया। गुजरात का गरबा बिहार पहुंच गया और बिहार का छठ महाराष्ट्र। दही-हांड़ी की तस्वीरें पूरे देश को रोमांचित करने लगीं। टीवी ने करवाचौथ को फैशनेबल बना दिया। नए तरह के सांस्कृतिक धागे में पूरे देश को बांधने का काम टीवी ने किया। लेकिन एलियन और सांप ने ऐसा बदनाम किया कि टीवी वालों के लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो गया। 

हैरत की बात यह है कि जब तक टीवी राखी सावंत और राजू श्रीवास्तव में व्यस्त था, सरकार की नींद नहीं टूटी लेकिन जैसे ही टीवी ने मुंबई हमलों पर सरकार की धज्जियां उड़ानी शुरू कीं, सरकार को लगा टीवी हदें पार कर रहा है। रेगुलेशन की बहस गति पकडऩे लगी। 

सरकार जानती है अखबार और प्रेस की ताकत। उसे ऐसा मीडिया अच्छा लगता है जो उसकी तरफ ध्यान न दे। वह टीआरपी के खेल में उलझा रहेगा तो सरकार की कमजोरियों को नहीं उघाड़ेगा। उसके घोटाले नहीं दिखाएगा। लेकिन, मुंबई हमले ने टीवी के दिमाग को बदला। मैं नहीं कहता कि सारे टीवी वाले बदल गए लेकिन कुछ लोग सोचने के लिए मजबूर हुए।

 इंडस्ट्री के अंदरूनी दबाव ने भी धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू किया। टीवी 2009 आने तक पटरी पर आता दिखा। अब सरकार के कान खड़े होने लगे। टीवी एक के बाद एक घोटालों को उजागर करने लगा। आईपीएल, कॉमनवेल्थ, आदर्श, २जी स्पेक्ट्रम घोटाले सामने आने लगे। टीवी ने बढ़-चढ़ के दिखाना शुरू किया। सरकार परेशान होने लगी। उसके खिलाफ माहौल बनने लगा। घाव में मिर्च लगी, जब अन्ना अनशन पर बैठे। टीवी ने उन्हें रातोरात उठा लिया। 

अब टीवी पर लोकतंत्र विरोध के आरोप लगने लगे। रेगुलेशन की आवाज बुलंद होने लगी। कुछ ऐसे लोगों को छोड़ा जाने लगा, जो टीवी को जनहित विरोधी बताने लगे, सांप्रदायिकता बढ़ाने का दोष देने लगे। पत्रकार रिपोर्टर अपढ़ हो गए। जाहिल। लेकिन ये आरोप उन आरोपों से बेहतर हैं।

 उन आरोपों को सुनकर शर्म आती थी और आज गर्व से सीना चौड़ा होता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है। वह अपनी भूमिका ठीक से निभाएगा तभी सरकारों और नेताओं को तकलीफ होगी। नेताओं को तकलीफ होगी तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा। वरना नेता तो चाहते हैं कि लोकतंत्र सोता रहे।


साभार: दैनिक भास्कर

Tuesday, October 18, 2011

मुझे शर्म आती है...


मुझे कभी कभी शर्म आती है। इस पेशे पर। अपने दोस्तों पर। लोगों पर। प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल कई दिनों से गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत नाजुक है। ऐसे महान साहित्यकार की गंभीर तबियत खराब है, लेकिन अभी तक यह नेशनल मीडिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं बन पाई है। 


भला बने भी कैसे इस स्टोरी पर टीआरपी (टीवी रेटिंग) और पेजव्यू (वेबसाइट में खबरों की रेटिंग) कम आने का जो खतरा है। मेरे हर मीडियाकर्मी मित्र को पता है कि ऐसी खबरें मुनाफेदार नहीं होती। चलिए मान लिया कि मीडिया को इस खबर से मुनाफा नहीं था इसलिए इसका महत्व नहीं दिया। लेकिन उन लोगों का क्या जो मीडिया से जुड़े नहीं हैं। जो खबरें पढ़ते और सुनते हैं। आखिरकार यही लोग तो तय करते हैं कि किसी खबर की टीआरपी या पेजव्यू क्या होगा।


मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर इस संबंध में एक पोस्ट डाली। लिखा कि, ''प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल गम्भीर रूप से बीमार है। उनको लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सहारा अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खबर है कि उनको साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार आज अस्पताल में ही दिया जाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी हालत नाजुक है। आइए हम सब मिलकर उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करें; क्योंकि दुआएं दवा से ज्यादा कारगर होती हैं।'' करीब चार घंटे बीत गए, लेकिन एक भी व्यक्ति ने इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। मुझे बहुत ग्लानि हुई।


मैं सोचने लगा कि इतना प्रखर साहित्यकार जिसे अस्पताल में ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसा साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान मिलने वाला है। उससे संबंधित पोस्ट पर एक भी साथी ने कमेंट करना मुनासिब क्यों नहीं समझा। आखिरकार जो लोग खुद को साहित्यकार या साहित्य का प्रेमी समझते हैं वो इतना संवेदना शून्य कैसे हो गए हैं। जबकि मेरे फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में कई साहित्कार और साहित्य प्रेमी मित्र भी हैं।


खैर, अपनी पहली पोस्ट के चार घंटे के बाद मुझे रहा नहीं गया तो मैने एक और पोस्ट डाली। इंतजार किया। लगा कि इस बार तो लोगों की प्रतिक्रिया जरूर मिलेगी। पर निराशा हाथ लगी। मेरा एक इंजीनियर मित्र ने इसके लिए अफसोस जाहिर किया, लेकिन और किसी भी मित्र का एक भी कमेंट नहीं आया। यह भी तय था कि यदि पूनम पांडे से संबंधित कोई पोस्ट डाला होता तो कमेंट्स की भरमार हो जाती। बता दूं कि पूनम पांडे के एक वीडियो को एक हफ्ते में 70 लाख लोगों ने देखा था।


भई, अब मैं इतना समझ चुका हूं कि ऐसे मुद्दों पर हमारे मीडियाकर्मी मित्रों से ज्यादा वो लोग दोषी हैं, जो खुद को संवेदनशील होने का ढ़ोंग करते हैं। यदि आप ऐसी खबरों को पढ़ना शुरू कर देते हैं। जो निश्चित ही टीआरपी और पेजव्यू अधिक रहेंगे। ऐसे में पत्रकारिता और ड्यूटी दोनों हो जाएगी।


बताता चलूं कि श्रीलाल शुक्ल को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत है। उनके फेफड़े में संक्रमण है। फिलहाल वह आईसीयू में भर्ती हैं। उनको 20 सितम्बर को वर्ष 2009 के लिए 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार कहानीकार अमरकांत के साथ संयुक्त रूप से देने की घोषणा की गई थी।




उनके लिए जिन्हें नहीं पता कि कौन है  श्रीलाल शुक्ल 


हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश में सन् 1925 में हुआ था। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग 'अंगद का पांव' (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 मे पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।


उपन्यास:  सूनी घाटी का सूरज · अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं। कहानी संग्रह:  यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में। व्यंग्य संग्रह:  अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर। आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग




         
http://bhadas4media.com/book-story/13541-------------.html

Monday, May 16, 2011

मीडिया में गैर-हाजिर किसान

काश!

'सत्य सांई'

होते 'टिकैत'







इस शीर्षक को पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि मैं कैसी बेतुकी बातें कर रहा हूं। भला महेंद्र सिंह टिकैत को सत्य सांई बनने की क्या जरूरत है। टिकैत एक किसान नेता थे और सांई प्रख्यात संत। सांई में आस्था रखने वालों में बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल थी। वहीँ टिकैत अभाव में जी रहे किसानो क़ि एकमात्र आवाज़ थे। सांई लोगों क़ि नज़रो में भगवान और टिकैत मामूली नेता किसान। फिर एक किसान को संत बनने की क्या जरूरत है। पर जरूरत है।

देश के दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो जाता है। उनके निधन की खबर शायद ही किसी न्यूज चैनल की ब्रेकिंग खबर बन पाती है। किसी ने भी इस खबर को अपने तेज-20 या 100 में जगह देना उचित नहीं समझा। कहीं खबर चली तो वह भी एक बार नाम के लिए। अखबारों में इस खबर के लिए एक कॉलम की जगह देकर जिम्मेदारी से छुट्टी पा ली गई। ( कुछ जिम्मेदार अखबारों और चैनलों को छोड़कर)


वहीं जब सत्य सांई का निधन हुआ था, तो सारा मीडिया टूट पड़ा था। चैनलों में प्राइम टाइम पैकेज चलाए गए, तो अखबारों के कई पेज भरे गए। उनकी बीमारी से लेकर संपत्ति के बटवारें तक की चर्चा की गई। उत्तराधिकारी के लिए बहसवाड़े का आयोजन किया गया। वसीयत पर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दी गई। ये है दो महान व्यक्तियों के निधन पर मीडिया कवरेज की असलियत।

इस बात पर अधिकतर मीडियावालों की दलील होती है कि, भईया हम कॉरपोरेट मीडिया युग में काम कर रहे हैं। भला एक किसान के मरने की खबर को इतनी प्रमुखता कैसे दे सकते हैं। मैं भी मानता हूं कि मोटी सैलरी के लिए पूंजी की जरूरत होती है। और पूंजी के लिए विज्ञापन की। और विज्ञापन के लिए वैसी खबरों की। इसलिए वैसी खबरें देना मजबूरी है। पर मेरा मानना है कि आप तेज-20 या 100 में ऐसी खबरों को एक जगह तो दे ही सकते हैं।

खैर, बिन मांगे सुझाव देने की क्या जरूरत। जो मीडिया पुलिस और प्रशासन के एंगल से खबर बनाता हो, वह भला इस बात को क्या समझेगा। हाल ही में ग्रेटर नोयडा के भट्टा-परसौल में हुए पुलिस-किसान संघर्ष में अधिकतर मीडिया घरानों ने प्रशासन के एंगल से खबर लगाई थी। अखबारों में शीर्षक था- 'पुलिस-किसान में खूनी संघर्ष, 2 पुलिस वालों सहित 4 की मौत'। इस शीर्षक में दो किसानों की मौत को छुपा लिया गया। क्या पुलिस वालों की जान, किसान की जान से ज्यादा कीमती है?

हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि हमारा देश को कृषि प्रधान देश है। गांवों का देश है। पर दुर्भाग्य है इस देश का कि जिसके बलबूते पर हैं, उसी की सबसे ज्यादा बेइज्जती करते हैं। किसान अपने हक क़ि आवाज़ उठाते हैं तो उनका दमन करते हैं। उस पर पड़ने वाली हर लाठी में अपनी जीत का जश्न मनाते हैं।

निर्दोष मौत के बाद भी उसको मीडिया में भी वो जगह नहीं मिल पाती. जो लोगो में किसान के प्रति संवेदना जगाये। जो ये बताये क़ि अपने हक के लिए लड़ने वाले के साथ ये सुलूक कहां का इन्साफ है। हर तरफ से उपेक्षित हुआ किसान अब मीडिया से भी कोई आस नहीं लगा सकता। लोकतंत्र और कमजोरों निरीहों का तथाकथित पहरेदार मीडिया भी आंखें बंद करके इस दमनचक्र का गवाह जो बना हुआ है।


http://www.samachar4media.com/


http://www.samachar4media.com/content/mukesh-kumar-artical-on-media-00091%20


http://vichar.bhadas4media.com/media-manthan/1276-2011-05-16-12-59-15.html

 
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