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Tuesday, September 16, 2014

विश्वास बोले- BIGG BOSS के लिए होती है 'डील'

टीवी रियलटी शो बिग बॉस में सब कुछ पहले से फिक्स होता है। प्रतियोगी अपने मन मुताबिक कमरे में रह सकता है। अपने साथ डायरी-पेन रख सकता है। एंट्री से पहले अपने हिसाब से शो के नियम-कानून भी बदलवा सकता है। 'आप' नेता और कवि डॉ. कुमार विश्वास का कहना है कि उनको शो में शामिल होने का जब तीसरी बार न्योता मिला, तो उन्होंने कुछ शर्तें रखीं। इनमें से कुछ को बिग बॉस रियलिटी शो की निर्माता कंपनी एंडेमॉल और कलर्स टीवी ने मान लिया, लेकिन बात जब पैसों पर आई तो कंपनी ने किनारा कर लिया।

dainikbhaskar.com से खास बातचीत में डॉ. कुमार विश्वास ने बताया कि उन्हें इस शो में शामिल होने के लिए बीते तीन साल से ऑफर आ रहे थे, पर वह मना कर देते थे। इस बार न्योता मिलने पर उन्होंने कुछ शर्तों के साथ जाने का मन बनाया। एंडेमॉल और कलर्स के सामने अपनी शर्तें रखीं, जिसे मान लिया गया। लेकिन जब कुमार ने वार विडोज फंड (शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं के लिए फंड) के नाम पर 21 करोड़ रुपए मांगा तो कंपनी ने किनारा कर लिया। इस वजह से वह बिग बॉस का हिस्सा नहीं बन सके।

घर में अलग से रूम देना किया स्वीकार 

बिग बॉस के घर का नियम होता है कि सभी सदस्य एक साथ खुले में रहते और सोते हैं। शो में कुमार विश्वास को प्रतिभागी बनाने के लिए बिग बॉस ने अपना यह नियम भी तोड़ने की बात मान ली। दरअसल, कुमार विश्वास का कहना था कि वह खुले में नहीं सो सकते हैं। इस शर्त को मानते हुए इसका तोड़ भी निकाल लिया गया। कंपनी की तरफ से कहा गया कि उन्हें पहले प्रतिभागी के रूप में शो इंट्री करा दी जाएगी। चूंकि बिग बॉस के नियम के हिसाब से पहले प्रतियोगी को रूम मिलता है; और इस तरह उनको रूम मिल जाएगा।

डायरी और पेन रखने की मिली इजाजत

शो में शामिल होने के लिए कुमार विश्वास ने एक और शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि वह कवि हैं। उन्हें कविता लिखने के लिए डायरी और पेन चाहिए। पहले उनकी इस शर्त को नहीं माना गया। लेकिन जब कुमार अपनी शर्त पर अड़े तो बिग बॉस में उन्हें डायरी और पेन रखने की इजाजत मिल गई।
 
शो में स्पेशल सेगमेंट देने की हुई पेशकश

कुमार विश्वास की तीसरी शर्त थी कि वह बिग बॉस में सामाजिक मुद्दों पर चर्चा भी चाहते हैं। इसका भी जुगाड़ निकाल लिया गया। कुमार विश्वास मुताबिक, बिग बॉस ने कहा था कि घर में हर दिन एक घंटा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होगी। इस सेगमेंट को 'गुरु ज्ञान' का नाम दिया जाएगा। इसे शो में पांच मिनट 'आज का गुरु ज्ञान' से अलग चलाया जाएगा।    

कुमार विश्वास का कहना था कि 500 करोड़ रुपए शो को बनाने में लगते हैं। 100 से 125 करोड़ रुपए कंपनी शो में एंकरिंग के लिए सलमान को देती है। फिर सैनिकों के विधवाओं के लिए फंड में 21 करोड़ रुपए देने में क्या दिक्कत है? यदि बिग बॉस उनकी इस शर्त को मान लेता है तो उन्हें घर के बाथरूम साफ करने में भी कोई दिक्कत नहीं है। 

कुमार विश्वास ने भाजपा नेता नवजोत सिंह सिद्ध पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वह अमृतसर से सांसद रहते हुए साढ़े तीन करोड़ रुपए लेकर बिग बॉस में चले गए थे। वहां वे बाथरूम साफ करते थे, कहीं किसी को एतराज नहीं था। जनता उनसे ऐसी ही उम्मीद करती है। वह ऐसा कर सकते हैं। वह भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होकर कपिल के शो में 'ठोकों ताली', 'और गुरुवर' बोलते रहते हैं।  

कपिल के शो में उन्होंने एक हिरोइन से कहा था कि यदि आप संसद में आ जाओ तो मैं पूरे दिन संसद में रहुंगा। यह बात रिकॉर्डेड है। इसका मतलब है कि उनका संसद में रहना किसी हिरोइन पर निर्भर है। इस पर अपने आप को राष्ट्रवादी बोलने वाले कोई टिप्पणी नहीं करते हैं। उनका राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ऐसी बात बोल रहा है। 

सनी लियोनी के साथ रहने में एतराज

कुमार विश्वास को पोर्न स्टार और पूर्व प्रतिभागी रही सनी लियोनी के साथ बिग बॉस में रहने में एतराज था। साथ ही उन्होंने शो की इस पॉलिसी पर नाखुशी जताई कि पहले से शामिल होने वाले प्रतिभागी के बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा कि यदि अंदर जाकर पता चले कि कुछ करोड़ रुपए के लिए सनी लियोनी के साथ रहना पड़ेगा और कॉफी या चाय बनाने पर हो रहा है, तो यह कोई इंटरटेनमेंट नहीं हुआ।

उन्होंने कहा कि बिग बॉस के लिए उन्हें काफी बड़ी रकम ऑफर हुई थी, लेकिन रकम ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होती है। सम्मान जरूरी होती है। यदि किसी से चार साल का बच्चा पूछे कि सनी लियोनी क्या परफार्म करती हैं? तो कोई जानकर भी नहीं बता सकता है।

ऐसा लगता है कि भारत में कलाकार, संगीतकार और गीतकार नहीं बचे हैं। क्या भारत की हिरोइनों की परंपरा इतनी मलिन और छोटी हो गई है कि एक पोर्न स्टार को हिंदुस्तान में लाकर स्टार बनाना पड़े।

कुमार विश्वास ने dainikbhaskar.com से बातचीत के दौरान फिल्मी स्टारों पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इशारों में सलमान और अमिताभ बच्चन को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि जब राहुल गांधी का क्रेज होता है तो सब स्टेडियम में उनके बगल में बैठकर मैच देखते हैं। नरेंद्र मोदी का क्रेज होता है तो अहमदाबाद में जाकर पतंग उड़ाने लगता हैं। इस बार उनका इशारा सलमान खान की तरफ था।

अमिताभ बच्चन पर भी निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि वे राजीव गांधी की सरकार में उनके साथ रहते हैं। यूपी में जब मुलायम की सरकार थी तो यूपी का विज्ञापन कर रहे थे। बाद में जब नरेंद्र मोदी का क्रेज बढ़ने लगा तो वह गुजरात में विज्ञापन देने लगे।

उन्होंने कहा कि प्रिति जिंदा के साथ सब काम करना चाहते हैं, पर जब वह एक बड़े रईसजादे के खिलाफ खड़ी होती है तो उनकी मदद के लिए कोई स्टार सामने नहीं आता है। शिर्डी के साईं बाबा के यहां अंगूर सभी चढ़ाने जाते हैं, लेकिन जब साईं की मूर्तियों को उठाकर फेंका जाता है तो सभी चुप हो जाते हैं। कोई भी दामिनी और गुड़िया पर बोलने को राजी नहीं होता है। 

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना यदि कसौटी पर कसी जाए तो कभी नहीं चूकती है। जिस कश्मीर में सेना के खिलाफ नारे लगाए गए। जहां उनके ऊपर पत्थर फेंके गए। आज उस कश्मीर की बाढ़ में वे सिपाही अपनी जान हथेली पर लेकर उतरे हुए हैं। भारतीय सेना एकमात्र ऐसा संस्थान बचा है, जिसको जब चुनौती मिलने पर उसे हर हाल में पूरा करती है। बात चाहे उत्तराखंड या जम्म कश्मीर की हो या देश की सीमा की। वह सब कुछ भूलकर अपनी जान न्यौछावर करती है। इसलिए हमारा भी फर्ज बनता है कि हम सभी शहीद सैनिकों के घरवालों के लिए कुछ न कुछ करें।

उन्होंने कहा कि यदि इन शहीदों की विधवाओं के लिए 21 करोड़ रुपए पहुंचते हैं। वह बिग बॉस तो क्या कहीं भी पोछा लगा सकते हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता है। हमारे देश और पड़ोसी मुल्क पीएम की मां के लिए शाल और साड़ी आती- जाती रहती है, लेकिन कफन में लिपटे बेटे आना बंद नहीं होते हैं। नई सरकार आ गई है। इसके बावजूद भी अब तक 30-40 सैनिक बार्डर पर शहीद हो चुके हैं।

Friday, December 16, 2011

औकात


रमेश शापिंग कर रहा था। अचानक उसकी नजर एक महिला से टकराई। दोनों ठिठक गए। वह मोना थी। रमेश को देखते ही वह बोली, 'ओह माई गॉड, रमेश तुम? कैसे हो? इट्स सरप्राइज फॉर मी। इनसे मिलो, ये मेरे हसबैंड सोहन हैं। बहुत बड़ी कंपनी में काम करते हैं।' मोना बोलती जा रही थी, रमेश उसकी बातें गौर से सुन रहा था। इस बीच हैरान सोहन पत्नी की बात बीच में ही काटते हुए बोल पड़ा।

सोहन बोला, 'सर...आप...यहां? कोई जरूरत थी तो बता दिया होता, किसी को भी भेज कर सामान मंगवा देता। अब आपको इतनी जहमत उठाने की क्या आवश्यकता थी।' अपनी पत्नी की तरफ तुरंत मुड़ते ही सोहन उत्साहित होकर बोला, 'मोना, ये मेरे बॉस हैं। पांच हजार करोड़ सालाना टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक होते हुए भी सर बहुत सरल, सभ्य और सुशील हैं। इनके पास सबकुछ है। खुशियां कदम चूम रही हैं। पर पता नहीं क्यूं अभी तक शादी नहीं की।' रमेश बुत बना सब सुन रहा था। मोना की आंखें चौड़ी हो गईं। उसकी जबान हलक में अटक गई। आंखें खुलीं थी पर सामने दृश्य 10 साल पुराना था।

उस दिन कॉलेज का पहला दिन था। वह क्लास में अकेली बैठी थी। इतने में एक सीधा-साधा शर्मीला लड़का क्लास में आकर आगे की सीट पर बैठ गया। मोना ने तुरंत पूछा कि, 'इसी कोर्स में दाखिला लिया है तुमने? कहां से आए हो?' अचानक हुए सवालों के बौछार से रमेश सकपका गया। लड़की से इस तरह बातें करनी की उसे शायद आदत नहीं थी। फिर भी हिम्मत जुटाकर आंखे नीचे किए बोला, 'हां मैनें इसी कोर्स में दाखिला लिय़ा है। कानपुर से आया हूं। आप कहां से आई हैं?' मोना तपाक से बोली, 'यहीं फरीदाबाद से हूं। रहने वाली तो साउथ इंडिया की हूं, लेकिन यहां पापा जॉब करते हैं न इसलिए।'

इसी बीच दूसरे लड़के-लड़कियां भी आ गए। सबका इंट्रोडक्शन हुआ। उसके बाद हर कोई अपने पसंद के लड़के-लड़की के साथ बातें करने लगा। रमेश अकेला था। उससे कई लोगों ने बात करने की कोशिश लेकिन पता नहीं क्यूं वह खोया-खोया सा रहा।

इधर बुत बने रमेश की आंखों में भी वो दृश्य तैरने लगे। उसे याद आ रहा था कि छोटे शहर से निकल कर तब वह नया-नया दिल्ली आया था। उसका हाल कुछ उस मछली की तरह था, जिसे तलाब से निकालकर समंदर में डाल दिया गया हो। आंखों में एक बड़े सपने को संजोए। मां-बाप के नाम को और ऊंचा करने की शपथ लिए उसने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। कॉलेज का पहला दिन था। कैम्पस में सीनियर्स की रैगिंग से बचते-बचाते किसी तरह से क्लास में पहुंचा। उस समय तक केवल एक लड़की क्लास में मौजूद थी। मोना...उस लड़की से पहली मुलाकात से उसका दिल धड़क गया था।

मोना से बातचीत में पहला दिन तो जैसे पल में ही बीत गया। फिर तो सुबह उससे फिर मुलाकात हो। कुछ बात हो। बात ही बात में कोई बात बन जाए। ऐसे ख्याली पुलाव बनना तो रोज की बात हो गई। लेक्चर के समय मौका निकाल कर मोना को निहरता रहता था। छुट्टी का दिन तो जैसे काल बन गया था। बस एक ही काम, जब तक वो कॉलेज में है कभी पास तो कभी दूर से निहारना, बस निहारना।

पर कहते हैं न कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता। खासकर दोस्तों के बीच। हो गई मीठी नोक-झोंक शुरू। कभी कोई छेड़ता तो कभी कोई कहता, 'ओए होए क्या बात है। जनाब, मोना को बता दूं क्या? छुप कर उसे बहुत निहारते रहते हो।'

रमेश की तो जैसे जान ही निकल जाती। कभी-कभी मोना से हाय-हैलो कर लेता। जिस दिन नजरें टकरा जातीं और बात हो जाती तो माशाअल्लाह रात आंखों ही आंखों में ही कट जाती। सपनों के पंखों पर सवार होकर ख्वाब उड़ान भरने लगते। कभी-कभार बात करने वाला रमेश अब सेंटिमेंटल मैसेज भेजने लगा। मोना को भी दोस्तों की बातों पर यकीन होने लगा। फिर क्या? प्रेम की पंखुडियां पनपें नहीं इसलिए कन्नी काटने लगी। मोना के इस बदले बर्ताव से दुख हुआ। आहत रमेश का दिल उसके कन्नी काटने से और बेचैन हो गया। दोस्त भी रमेश को बार-बार जोर दे रहे थे। जो दिल में है वो बोल डाल।

दरअसल छोटे शहर के लड़कों के साथ यही समस्या होती है। बचपन मां-बाप के दबाव के कारण पढ़ने और रटने में गुजर जाता है। लड़के-लड़कियां बिगड़ें नहीं इसलिए अलग-अलग स्कूल कॉलेज होते हैं। जैसे रामाबाई कन्या विद्यालय यानी यहां सिर्फ लड़कियां पढ़ेंगी, महात्मा गांधी इंटर कॉलेज यानी यहां सिर्फ लड़के पढ़ेंगे। ऐसे माहौल से जब कोई लड़का पहली पहल दिल्ली जैसी जगह पर आ जाए, और उपर से बाबूजी की छत्रछाया ना हो तो ऐसा होना स्वभाविक ही है।

खैर, अगले दिन कॉलेज का फेस्ट था। मौका भी था, दस्तूर भी। सो, उस दिन प्रपोज करने की योजना बन ही गई। फेस्ट में सबने खूब एंजॉय किया। इस दौरान रमेश ने कई बार प्रपोज करने की हिम्मत जुटाई। पर असफल रहा। आखिरकार जब वह घर जाने के लिए चली तो उसके पीछे हो लिया। रास्ते में सही जगह देख कर उसने उसे आवाज दी। रमेश को पीछे आता देख वह आवाक रह गई।

कांपती हुई आवाज में रमेश बोला, 'हॉय कैसी हैं। वो मैं आपसे दोस्ती करना चाहता था।' वह बोली, 'ओके, हम दोस्त तो पहले से ही हैं।' रमेश बोला कि, 'अरे नहीं...वो अलग वाली दोस्ती करना चाहता हूं।' पहले से ही माजरा समझ रही मोना गुस्से से बोली, 'व्ह्वाट? क्या बात करते हो? देखो, तुमसे हंस कर कभी कभार बात कर लेती हूं, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरे काबिल हो। तुम्हारे महीने भर का पॉकेट खर्च, मैं रोज अपने दोस्तों पर लूटा देती हूं। ऐसी फिजूल की बातें कभी सोचना भी मत। अपनी औकात तो देखी होती।'

इतना कहकर वह तेज कदमों से चली गई। उसका यह जवाब सुन कर रमेश को गहरा धक्का लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। सिर पर हाथ रखे वह सड़क किनारे ही बैठ गया। पता नहीं कितना समय गुजर गया। बाद में खोया-खोया सा रमेश हॉस्टल वापस आया। रात भर सोचता रहा। फिर उसने तय किया अब सिर्फ अमीर बनना है।

उतना अमीर जितना प्यार को पाने के लिए जरूरी है। उतनी दौलत कमाना है जितनी मोना के सपनों को पूरी कर सके। इतना पैसा जुटाना है जितनी से उसकी औकात मोना की खुशियों को संजोने के लिए काफी हो सके। उसी जद्दोजहद में गुजर गए कई बरस। सपना तो पूरा हुआ लेकिन मोना खो गई। आज मिली भी तो किन हालात में।

सीयू, बॉय सर, सोहन कह रहा था। बॉय, रमेश की तंद्रा टूटी। नजर सामने गई तो देखा कि मोना अवाक सी रमेश को देखते हुए सोहन के साथ पॉर्किंग की तरफ बढ़ रही थी। औकात...औकात.....मोना शर्म से सिर भी नहीं उठा पा रही थी।

उस भीड़ में चमकते चेहरे दिखाई दे रहे थे। चहकते जोड़े बाजू से गुजर रहे थे। किसी को खबर भी नहीं हुई और चमचमाती लाइटों के बीच एक सपना दरक गया। रमेश की आंखों से दर्द बह रहा था। पाने और पाकर खोने का दर्द। सच्ची मोहब्बत शायद बलिदान की मोहताज होती है....हमेशा से।

Friday, November 18, 2011

आपको पता है कि क्या होती है नौटंकी?

'नौटंकी मत करो' ऐसा बार-बार लोगों को बोलते हुए आपने सुना होगा। पर क्या आपको पता है क्या होती है नौटकी? आइए हम आपको बताते हैं। नौटंकी एक जीवंत, लोकप्रिय और प्रभावशाली लोककला है।


यह कला जन-मानस से जुड़ी है। इस विधा में अभिनय थोड़ा लाउड किया जाता था। ठीक पारसी थियेटर की तरह। विषय कई बार बोल्ड रखे जाते थे, डायलॉग तीखे चुभने वाले होते थे। समयांतर इस विधा में विकृति आ गई औऱ इसे अश्लीलता का भी पर्याय माना जाने लगा।


विद्वानों के मुताबिक, यह कहना कठिन है कि नौटंकी का मंच कब स्थापित हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ। किंतु यह सभी मानते हैं कि नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में जिस सट्टक को नाटक का एक भेद माना है, इसके विषय में जयशंकर प्रसाद और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि सट्टक नौटंकी के ढंग के ही एक तमाशे का नाम है।


संगीत प्रधान लोकनाट्य नौटंकी सदियों तक उत्तर भारत में प्रचलित स्वांग और भगत का मिश्रित रूप है। स्वांग और भगत में इस प्रकार घुलमिल गई है कि इसे दोनों से अलग नहीं किया जा सकता। संगीत प्रधान इस लोक नाट्य के नौटंकी नाम के पीछे एक लोक प्रेमकथा प्रचलित है। इसकी जन्मस्थली उत्तर प्रदेश है। हाथरस और कानपुर इसके प्रधान केंद्र है।


हाथरस और कानपुर की नौटंकियों के प्रदर्शन से प्रेरित होकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, मेरठ और बिहार में भी इसका प्रसार हुआ। मेरठ, लखनऊ, मथुरा में भी अलग-अलग शैली की नौटंकी कंपनियों की स्थापना हुई। आज नौटंकी खत्म होती जा रही है, थोड़ा-बहुत जहां बचा है वहां इसका अश्लील पर्याय ही देखने को मिलता है। सरकार की ओर से इसे संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इस कला के प्रेमी आज भी बीते दिनों की याद करते हैं, जब नौटंकी प्रदर्शन जगह-जगह होते थे। उनका मानना हैं कि, बाहर से उजड़ी है, दिल में बसी है- नौटंकी।

साभार: दैनिक भास्कर डॉट कॉम

Monday, October 10, 2011

कहां तुम चले गए...


गजल सम्राट जगजीत सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने मुंबई के लीलावती अस्पताल में दम तोड़ दिया। करीब दो सप्ताह पहले ही उन्हे यहां भर्ती कराया गया था। उनकी आखिरी सांस के साथ ही मौशिकी की दुनिया का एक कालखंड समाप्‍त हो गया। 


जगजीत जिंदगी के आखिरी वक्‍त तक गाते रहे। जिस दिन उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया, उस दिन भी मुंबई में उन्‍हें एक कार्यक्रम देना था। 70 साल के जगजीत सिंह को उस दिन पाकिस्तान के गजल गायक गुलाम अली के साथ एक कंसर्ट में हिस्सा लेना था। 




गजल गायकी को नया अंदाज देने के लिए जगजी‍त सिंह को हमेशा याद किया जाता रहेगा। जगजीत सिंह ने 1999 में आई फिल्‍म ‘सरफरोश’ के गीत ‘होश वालों को खबर क्‍या...’ को आवाज दी थी। 


मशहूर गायिका लता मंगेशकर के मुताबिक उन्‍होंने गजल गायकी में हर चीज बदल ली। बोल, सुर, ताल, आवाज...सब कुछ। उन्‍होंने गजल गाकर यह भी साबित किया कि गायिकी में दौलत-शोहरत कमाने के लिए बॉलीवुड से भी बाहर दुनिया है। 


जीवन की राह पर मजबूती से बढ़ाते रहे कदम


जगजीत सिंह राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे। उनके पिता संगीतकार बनने में असफल रहे, अत: अपने पुत्र के माध्यम से अपने सपने को साकार करना चाहते थे। लिहाजा वे जगजीत को संगीत गुरुओं के पास ले गए और सेन बंधुओं की शिक्षा उन्हें लंबे समय तक मिली। जालंधर के कॉलेज में पढ़ते हुए उनके गायन के कई लोग कायल हुए और वे मुंबई आए। उन्होंने लंबा संघर्ष किया। 


वह संगीत की शिक्षा देने कई जगह जाते थे और दत्ता की विवाहिता तथा कन्या मोनिका की मां चित्रा को उनसे प्रेम हो गया। हारमोनियम की पट्टी पर सीखने-सिखाने के समय दोनों की अंगुलियां टकराईं और प्रेम का संदेश आत्मा तक जा पहुंचा। दत्ता साहब ने नजाकत समझी और दृश्य पटल से पटाक्षेप कर गए। 




जगजीत-चित्रा का विवाह हुआ और विवेक नामक पुत्र का जन्म हुआ। मोनिका की भी शादी हो गई। निदा फाजली ने बताया कि एक बार लता मंगेशकर ने कहा था कि पाकिस्तान के गजल गायक मेहंदी हसन के गले में ईश्वर विराजते हैं। इसी तर्ज पर निदा का ख्याल है कि जगजीत सिंह के गले में अल्लाह विराजते हैं।


 मेहंदी हसन और जगजीत सिंह ने गजल गायकी में महारत हासिल की है। जगजीत सिंह और चित्रा ने लंदन में मिलकर गाया और उसी लाइव शो की रिकॉर्डिग जारी होकर अत्यंत लोकप्रिय हुई। उसमें निदा फाजली की प्रसिद्ध गजल ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है। 


'सबसे मधुर है गीत वही जो हम दर्द की धुन में गाते हैं'




जगमोहन से बने जगजीत
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’ गाया और बाद के अनेक रिकॉर्डस में उन्होंने निदा को गाया है। ‘इनसाइट’ नामक रचना में तमाम दोहे और गजलें निदा फाजली की हैं, जो उन्होंने खुद चुनीं। ज्ञातव्य है कि जगजीत सिंह उर्दू पढ़ते हैं। युवा पुत्र विवेक की कार दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद जगजीत सिंह ने अपने दर्द को अपने काम में डुबो दिया और उनका माधुर्य बढ़ गया। याद आता है अंग्रेजी कवि शैली का विश्वास ‘वी लुक बिफोर एंड आफ्टर, एंड पाइन फॉर व्हाट इज नॉट, अवर सिंसेयर लाफ्टर विद सम पेन इज फ्रॉट, अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज, दैट टेल ऑफ सेडेस्ट थॉट।’ इसी भाव को शैलेंद्र ने दोहराया है- सबसे मधुर है गीत वही जो हम दर्द की धुन में गाते हैं।




दरअसल सृजन दर्द के अंधे कुएं से ही उपजता है। एक ओर साहसी जगजीत सिंह ने गायन के रूप में अपनी आराधना जारी रखी, दूसरी ओर चित्रा बिखर गईं। मोनिका ने भी दो लड़कों को जन्म देकर 


जाने क्यों आत्महत्या कर ली और फिर ईश्वर ने जगजीत सिंह को आजमाया। वे हमेशा खरे उतरे। कैफी साहब का लिखा गीत ही जगजीत सिंह की जीवन शैली बना- ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो।’




साभार: daininbhaskar.com

Monday, January 24, 2011

''मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा''

देश के महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी का सोमवार सुबह 8.05 बजे पुणे के एक अस्पातल में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गडक में हुआ था। इनको बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 1932 में वह गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े।

अगले दो वर्षों तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से संगीत की शिक्षा ली। घर वापसी से पहले वह कलकत्ता और पंजाब भी गए। सन् 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने पंडित रामभन कुंडगोलकर से गडग के पास कुंडगोल में संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने खयाल गायकी की बारीकियां भी सीखीं।

पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया। उनको कई रागों को मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना करने का भी श्रेय जाता है। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल की है।

सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित

भीमसेन जोशी को 4 नवम्बर, 2008 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से पुरस्कृत किया गया। इन्हें भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन् 1985 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। इसके साथ इन्हें पद्म विभूषण और पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

19 साल की आयु में आये सार्वजनिक मंच पर

किराना घराना के जोशी ने 19 वर्ष की आयु में पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से अपनी गायन कला का प्रदर्शन किया था। उनकी अनवरत यात्रा आज समाप्त हुई है। उन्होंने पहली बार अपने गुरु सवाई गंधर्व के 60वें जन्मदिवस पर जनवरी 1946 में पुणे अपना गायन प्रस्तुत किया था।

गीत जो हो गए अमर

जोशी जी द्वारा गाए गए गीत लोगों के बीच समां बांध देते थे। उनके संगीत में गजब का जादू था। उनके द्वारा गाए गए गीत पिया मिलन की आस, जो भजे हरि को सदा और मिले सुर मेरा तुम्हारा संगीत के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं। इस का सम्मोहन आज भी बरकरार है।
दैनिक भास्कर से साभार

 
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