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Friday, December 3, 2010

जर्जर इमारतें

मौत के साए में जिंदगी

दिल्ली के लक्ष्मी नगर में इमारत ढह जाने का जो दर्दनाक हादसा हुआ है, उसने सबको दहला कर रख दिया है। इसमें 70 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग जख्मी हुए। ऐसा ही कुछ मंजर गाजियाबाद सहित पूरे वेस्ट यूपी में भी देखने को मिल सकता है। यहां लक्ष्मी नगर जैसी कई जर्जर इमारतें हैं, जो कभी भी ढह कर मलबे में तब्दील हो सकती हैं। इमारतों में नीचे दुकानें हैं और ऊपर लोग रहते हैं। अगर भविष्य में यह इमारतें गिरीं तो तय है कि बड़ी संख्या में जान-माल का नुकसान होगा। इन बातों से बाखबर प्रशासन कन्नी काटता नजर आ रहा है, तो वहीं इन इमारतों का जन्मदाता जीडीए नींद में है। इमारतों में भूकंप के मामूली झटके बर्दाश्त करने की जरा भी कूवत नहीं है। भूकंप के हल्के झटके भर से जर्जर इमारतें ताश के पत्तों की तरह कभी भी भरभरा सकती हैं।
हाई रिस्क जोन में बहुमंजिला इमारतें
भूकंप शब्द से ही लोगों में दहशत फैल जाती है। खासकर दिल्ली और एनसीआर के लोगों में। यह क्षेत्र हाईरिस्क जोन में आने के कारण सबसे ज्यादा संवेदनहै। बहुमंजिला इमारतों की भरमार होने से यहां भूकंप आने पर जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।
दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुडग़ांव, फरीदाबाद जैसे शहरों में जगह की कमी के कारण ऊंची बिल्डिंग बनाने का चलन काफी समय से चल रहा है। लेकिन बहुमंजिला इमारत बनाने का यही चलन लोगों के लिए मुसीबत बन गया है। प्राधिकरण निजी बिल्डरों से भूकंपरोधी भवन नहीं बनवा पा रहे। भूकंप से बचाव के उपाय केवल कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। गनीमत बस इतनी है कि अभी तक दिल्ली और एनसीआर में बड़ा भूकंप नहीं आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 7 तक की तीव्रता का भूकंप आ सकता है। 4.5 से अधिक तीव्रता का भूकंप आने पर इमारतों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। भूस्खलन के साथ-साथ बड़े-बड़े भवन ढह सकते हैं। भूमिगत पाइप लाइनों के टूटने का खतरा बढ़ जाता है। भूकंप की तीव्रता बढऩे पर नदियों का मार्ग तक बदल सकता है।

यमुना तीरे इमारतों की बाढ़
यमुना के किनारे के रेतीले इलाकों में तेजी से बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा रहीं हंै। सबसे खतरनाक बात यह है कि यहां की ऐसी अनेक बहुमंजिला इमारतें हैं, जो भूकंप का हल्का झटका भी नहीं सह सकतीं। भूकंप वैज्ञानिकों के अनुसार अगर चार रिक्टर पैमाने की भी हलचल हुई तो ताश के पत्तों की तरह इस क्षेत्र की इमारतें ढह जाएंगी।
केन्द्र सरकार के शहरी भूकंप भेदता यूनीकरण कार्यक्रम (यूईवीआरपी) के अधिकारियों ने नदी में निर्माण को खतरनाक करार दिया है। ऐसी स्थिति में लोगों को यही कहा जाना चाहिए कि नदी के नहीं तो खुद के जीवन के लिए ही सही ऐसी जगहों पर बहुमंजिला इमारतें बनाने से बचें। आगरा भूकंपीय खतरे की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है। यहां भूकंप का झटका कभी भी लग सकता है। यूपी के राहत आयुक्त के नेतृत्व में चल रही यूईवीआरपी के प्रोजेक्ट समन्वयक जीवन पंडित के मुताबिक ठोस मिट्टी पर बनी इमारतों पर भूकंप का असर कम होता है। जबकि यमुना और इसके तट रेत से भरे हंै। भूकंप होने पर रेत में भूजल मिल जाता है, इसे लिक्वफिकेशन कहते हैं। यह दलदल बनाने का काम करता है। इससे नींव कमजोर हो जाती है और भवन ध्वस्त हो सकते हंै। भूकंप की दृष्टि से कभी भी नदी के पास निर्माण नहीं करना चाहिए।

क्या कहता है जियोलॉजिकल सर्वे
जियोलॉजिकल सर्वे में यह बात सामने आई है कि गाजियाबाद सहित पूरा दिल्ली-एनसीआर फोर्थ जोन में है। यानि हल्का भूकंप का झटका भी तबाही ला सकता है। ट्रांस हिंडन क्षेत्र में रियल स्टेट कारोबार के फैलने से भारी मात्रा में जल दोहन हो रहा है। जिससे मिट्टी खिसकती है और अत्याधिक बारिश से इमारतों में दरार की संभावना है। जबकि भू-जल पर्याप्त मात्रा में होने से दबाव बना रहता है और मिट्टी नहीं खिसकती। सर्वे के अनुसार यदि प्राकृतिक तरीके से मिट्टी खिसकती है तो कोई खतरा नहीं, लेकिन दोहन से इमारतों की नींव कमजोर हो सकती है।
भूकंप से सुरक्षित बनाने के लिए इमारतों को रिक्टर स्केल मैग्निटयूड 6 की तीव्रता का भूकंप झेलने के लिए तैयार किया जाता है। इसके लिए बिल्डिंग के कंस्ट्रक्शन के वक्त ही उसे भूकंपरोधी बनाने के सभी उपाय किए जाते हैं। घर खरीदने के पहले किसी सर्टिफाइड स्ट्रक्चरल इंजीनियर का सर्टिफिकेट, जिसमें रिक्टर स्केल मैग्निटयूड कम से कम छह रखा गया हो, उसे जरूर देखना चाहिए।

भूकंप की वजह
भूकंप आज भी ऐसा प्रलय माना जाता है जिसे रोकने या काफी समय पहले सूचना देने की कोई प्रणाली वैज्ञानिकों के पास नहीं है। प्रकृति के इस तांडव के आगे सभी बेबस हो जाते हैं। सामने होता है तो बस तबाही का ऐसा मंजर जिससे उबरना आसान नहीं होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन और हैती में आए भूकंप हैं।
भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है। सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण भंगुर होती है। ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें गिरती हैं तो भूकंप आता है। एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे होते हैं।
धरती की सतह से काफी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया। सतह से 600 किलोमीटर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिकों क्रियाओं के कारण भूकंप आते होंगे।
जानवरों को होता है भूकंप का अहसास!
बचपन में बड़े बुजुर्गों से सुना था कि जब भूकंप आने को होता है तो पशु-पक्षी कुछ अजीब हरकतें करने लगते हैं। चूहे अपनी बिलों से बाहर आ जाते हैं। अगर यह सही है तो वैज्ञानिक पशु-पक्षियों की इस अद्भूत क्षमता को भूकंप की पूर्व सूचना प्रणाली में क्यों नहीं बदल सकते। अगर ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति की इस तबाही पर मानव विजय पा सकेगा। भुज में आए भूकंप के समय ऐसा देखा गया था कि पशु वहां से भागने लगे थे।

घर बनाने या खरीदने के पहले इन बातों का रखें ध्यान
निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उस जगह की मिट्टी की जांच जरूरी होती है। इससे पता चलता है कि उसमें इमारत का वजन सहन करने की क्षमता है या नहीं। मिट्टी की क्षमता के आधार पर ही इमारत में फ्लोर्स की संख्या तय की जाती है। और डिजाइन तैयार किया जाता है।
अब सवाल उठता है कि मिट्टी की जांच कहां कराई जाए? मिट्टी की जांच की जिम्मेदारी सरकार से मान्यता प्राप्त प्राइवेट लैब संभालती है। इसके लिए वह बाकायदा एक तय फीस चार्ज करती है। यह 20 हजार से एक लाख रुपये तक हो सकती है। जांच के बाद लैब सर्टिफिकेट जारी करती है।
जांच में यह पता चलता है कि मिट्टी प्रति स्क्वेयर सेंटीमीटर कितना लोड झेल सकती है। वॉटर लेवल और बियरिंग कपैसिटी का सही अनुपात क्या है। मिट्टी की दशा क्या है यानी मिट्टी हार्ड है या सॉफ्ट।

बेसमेंट का ध्यान जरूरी
ललिता पार्क (दिल्ली) में गिरी इमारत के बेसमेंट में पानी भरा था। ऐसा माना जा रहा है कि नींव में पहुंचे पानी ने बिल्डिंग को कमजोर बना दिया। बेसमेंट इमारत का आधार होता है, इसलिए इसका मजबूत होना बहुत जरूरी है।
इमारत की वॉटर प्रूफिंग बहुत जरूरी होती है। इमारत का बिल्डर ही बेसमेंट की वॉटर प्रूफिंग के लिए जिम्मेदार होता है। जब उस इलाके में वॉटर लेबल ज्यादा हो, जैसे यमुना और हिंडन किनारे वाले इलाके, तब उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। संबंधित जगह के वॉटर लेवल के अनुसार ही यह तय किया जाता है कि बेसमेंट को किस तरह की वॉटर प्रूफिंग सुरक्षित रख सकती है। ऊंचे वॉटर लेवल वाले इलाकों में आमतौर पर बॉक्स टाइप वॉटर प्रूफिंग की जाती है, जिसमें नींव और चारों तरफ की दीवारों पर कोटा स्टोन की परत चढाई जाती है।

निर्माण सामग्री की करें जांच
मिट्टी का ठीक होना ही इमारत की सुरक्षा की लिए काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि इमारत को तैयार करने में लगाए जाने वाले सामग्री की गुणवत्ता अच्छी हो। इस सामग्री में क्रंक्रीट, सीमेंट, ईंट, सरिये आदि शामिल होती हैं। निर्माण सामग्री के ठीक होने या नहीं होने के बारे में ज्यादातर संतुष्टि सिर्फ देखकर ही की जाती है। फिर भी कुछ हद तक सावधानी बरती जा सकती है।
सबसे पहले प्लास्टर की जांच करनी चाहिए। इसके लिए एक कील या गाड़ी की चाबी लें, इसे दीवार पर हाथ से गाढऩे की कोशिश करें। अगर कील दीवार में धंस जाती है तो रेत झड़ता है, तो साफ है कि खराब सामग्री लगाया गया है। यदि कील आसानी से नहीं धंसती, तो समझ सकते हैं कि सामग्री अच्छी है और काफी तराई भी की गई है।
यदि आप संतुष्ट नहीं हैं, तो जांच में प्रोफेशनल की मदद लें सकते हैं। कंक्रीट फ्रेमवर्क के तहत आने वाली चीजों की जांच किसी प्रफेशनल से कराई जा सकती है। इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत पिलर, नींव, स्लैब्स आदि आते है। प्रोफेशनल स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग से सर्टिफिकेट लिया जा सकता है।
थर्ड पार्टी से गुणवत्ता जांची जा सकती है। इस प्रक्रिया के तहत बिल्डर मिट्टी समेत सभी निर्माण सामग्री आदि की गुणवत्ता की जांच कराता है। यह जांच प्राइवेट एजेंसियां तय मानकों के आधार पर करती हैं, जिन्हें मानना बिल्डर के लिए जरूरी होता है। सभी चीजों की जांच के बाद सर्टिफिकेट दिए जाते हैं, जिन्हें एक बार जरूर देख लेना चाहिए।

दस्तावेज जरूर लें
अगर आप इमारत की सुरक्षा के बारे में जांच-पड़ताल कर रहे हैं, लेकिन उसके वैध या अवैध होने पर लापरवाही कर जाते हैं, तो आप बड़ी भूल कर रहे हैं। कोई भी बिल्डर या सरकार तभी तक जिम्मेदार है, जब तक इमारत लीगल है।
नेशनल बिल्डिंग कोड के मानक, जो सीपीडब्ल्यूडी जैसी सरकारी संस्थाओं के पास या इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
सबके साथ यह भी जानना जरूरी है कि उस क्षेत्र में बिल्डिंग में कितने फ्लोर की इजाजत है, फ्लोर एरिया अनुपात के अनुसार कितनी जगह पर निर्माण किया जा सकता है, जोन के अनुसार, बिल्डिंग की अधिकतम ऊंचाई कितनी रखी जा सकती है, किस तारीख को प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया, यानी बिल्डिंग कितनी पुरानी है।

अग्नि सुरक्षा
घर लेने से पहले यह संतुष्टि कर लेना भी जरूरी है कि बिल्डिंग को आग के खतरों से सुरक्षित बनाया गया है या नहीं। इसके यह जांच कर लें कि अगर मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट है तो फायर डिपार्टमेंट से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिला है कि नहीं।

स्ट्रक्चरल इंजीनियर से जरूर लें सलाह
इमारत बनवाने या फ्लैट खरीदने से पहले किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह जरूर लें। यह सलाह ड्रॉइंग डिटेल्स बनवाने तक ही सीमित न रहे। उस डिटेल्स पर पूरी तरह अमल भी करें। घर के निर्माण के वक्त स्ट्रक्चरल इंजीनियर से यह चेक करवाते रहें कि निर्माण सही हो रहा है या नहीं। आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर का आपसी मेल-जोल होना बहुत जरुरी है। अगर खुद घर बनवा रहे हैं, तो निर्माण पर आने वाली कुल लागत का अनुमान लगाना आसान हो जाता है।

कानूनी प्रावधान
नेशनल बिल्डिंग कोड के अनुसार बिल्डिंग के डिजाइन व निर्माण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर तैयार की गई इमारत को सुरक्षा के आधार पर 100 फीसद खरा माना जा सकता है। इसे सबसे पहले 1970 में प्लानिंग कमिशन ने लागू किया था। 1983 में इसे संशोधित किया गया। इसके बाद दो बार 1987 में और एक बार 1993 में इसमें सुधार किए गए। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया 2005 लाया गया। 'एनबीसी 2005Ó का निर्माण ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड, म्यूनिसिपल एडमिस्ट्रिेशन, पब्लिक बॉडीज और प्राइवेट एजेंसी वगैरह ने मिलकर तैयार किया। इसका मकसद डेवलेपमेंट कंट्रोल रूल्स और बिल्डिंग की आम जरूरतों, फायर सेफ्टी जरूरतों, मटीरियल क्वॉलिटी, स्ट्रक्चरल डिजाइन, कंट्रक्शन और प्लंबिंग सर्विस आदि का ध्यान रखना है। जो बिल्डिंग कोड के मापदंड पर फिट नहीं बैठतीं, उन पर पेनल्टी भी ली जा सकती है या प्रोजेक्ट ही निरस्त भी किया जा सकता है।

कहां है लैबोरेट्रीज
देशभर में विभिन्न चीजों की जांच के लिए लैबोरेट्रीज को मान्यता 'नेशनल एक्रीडिशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेट्रीजÓ की ओर से दी जाती है। यह बोर्ड सरकार के विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय के तहत बनाया गया है, जिसका मुख्यालय न्यू महरौली रोड पर सत्संग विहार मार्ग पर स्थित है। बिल्डिंग मटीरियल और मिट्टी आदि की जांच के लिए बोर्ड ने दिल्ली-एनसीआर में कई लैब्स को अधिकृत किया के लिए फोन नंबर 011-46499999 पर भी संपर्क कर सकते हैं।

भुज और लातूर में भूकंप के बाद जिंदगी
26 जनवरी, 2001 का वो दिन भुलाए नहीं भूलता। इस दिन गुजरात के भुज में आए भूकंप ने हजारों लोगों को लील लिया। कितने घायल हुए, कितने अपनों से बिछड़ गए। यही कहर 30 सितंबर, 1993 में महाराष्ट्र के लातूर में बरपा था। भुज में 13 हजार 805 लोग मरे, तो लातूर में 7 हजार 928 लोग काल के गाल में समा गए। लेकिन इन दोनों घटनाओं में जीत जिंदादीली और हिम्मत की हुई थी। लोगों ने हिम्मत से काम लिया। उन्होंने इस घटना से सबक लेते हुए खुद को तैयार किया। आज इन दोनों जगहों पर भूकंपरोधी इमारतें बन चुकीं हैं। ये इमारतें हल्के -फुल्के भूकंप के झटके को यूं ही सह सकती हैं।


ऐसे बनाएं भूकंपरोधी इमारतें
आइए जानते हैं भूकंपरोधी इमारतों को किस तकनीक के सहारे बनाया जा सकता है। भूकंप के दौरान इमारतों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए दो आधारभूत तकनीक को अपनाया जा सकता है। इनमें पहला, बेस आइसोलेसन डिवाइस और दूसरा सिसमिक डैंपर है।

बेस आइसोलेसन डिवाइस
इस तकनीक से इमारत को ग्राउंड से एक रोलर के सहारे अलग रखा जाता है। इससे भूकंप आने पर इमारत को प्रत्यक्ष रूप से झटका नहीं लगता है। और इमारत क्षतिग्रस्त नहीं हो पाती है।

सिसमिक डैंपर
इस तकनीक से एक विशेष डिवाइस के जरिए काम लिया जाता है। यह डिवाइस भूकंप के समय पैदा होने वाली एनर्जी को अवशोषित कर लेती है। इस तरह से भूकंप का झटका इमारत को महसूस नहीं होता है।
भुज में भूकंप के बाद इसी डिवाइस पर आधारित इमारते बनाई गईं हैं, जो सामान्य भूकंप के झटके को आसानी से सह सकती हैं।

क्या करें भूकंप के दौरान

भूकंप के दौरान जितना संभव हो सुरक्षित स्थान पर रुकें। ध्यान रखें कि अधिकतर भूकंप कम समय के लिए आते हंै। भूकंप आते ही खुद को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठायें-

यदि अंदर हैं तो
किसी मेज के नीचे बैठ जाएं अथवा किसी फर्नीचर या लकड़ी के तख्ते से खुद को कवर कर लें। इस अवस्था में तब तक बैठे रहें जब तक कि भूकंपन खतम न हो जाए। यदि टेबल या फर्नीचर न हो तो कमरे के कोने में बैठकर अपने हाथों से चेहरे व सिर को ढक लें।
कांच की खिड़कीयों, बाहरी दरवाजों और बिजली के उपकरण जो से दूर रहें।
अगर आप पलंग पर हैं तो वहीं रहें और अपने सिर को तकिए से कवर करें। यदि आप किसी ऐसी चीज के नीचे हैं जो गिर सकती है तो किसी नजदीकी सुरक्षित स्थान पर जाएं।
यदि आप जानते हैं कि दरवाजे की चौखट मजबूत है और भार संभाल सकती है तो उसकी ओट लें।
तब तक अंदर रहें जब तक कि भूकंप रुक न जाए और बाहर निकलना सुरक्षित न हो जाए। यह सिद्ध हो चुका है कि सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं तब होती है जब लोग बाहर की ओर या बिल्डिंग में ही इधर-उधर भागते हैं।
ध्यान रखें कि बिजली चली गई हो और फव्वारे और फायर अलार्म चालू हों।
लिफ्ट आदि का उपयोग न करें।

यदि बाहर हैं तो यदि आप घर से बाहर हैं तो वहीं रुकें।
इमारतों, स्ट्रीट लाइटों और बिजली के तारों से दूर रहें।
यदि खुले में हैं तो भूकंप रुकने तक वहीं ठहरें। सबसे ज्यादा खतरा इमारतों के ठीक बाहर होता है, बाहरी दरवाजों पर या बाहरी दीवारों के निकट।

गाड़ी चलाते वक्त
जितनी जल्दी हो रुक जाएं और गाड़ी के अंदर रहें। इमारत के समीप, पेड़ के नीचे, फ्लाईओवर के नीचे और बिजली की तारों के नीचे रुकने से बचें।
सावधानी से आगे बढ़ें। उन सड़कों, पुलों और ढलानों से बचें जोकि भूकंप से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

यदि मलबे के नीचे दबे हैं
माचिस न जलाएं
मलबे में हिलें और ढकेले नहीं।
अपने मुंह को रुमाल या कपड़े से ढकें।
पाइप अथवा दीवार पर ठकठकाएं ताकि सुरक्षा दल आपको ढूंढ सकें। यदि सीटी है तो उसका उपयोग करें। केवल तभी चिल्लाएं जब कोई और चारा न हो। चिल्लाने से आपके मुंह में धूल जा सकती है. Photo by Ekkadamaage.

Thursday, June 10, 2010

Happiness and Unhappiness of Human life

Mahatma Gandhi said that Our happiness or unhappiness is always determined by our thoughts. Happiness is when what you think, what you say, and what you do, are in harmony.
BUDDHA said that Thousands of candles can be lighted from a single candle, and the life of the candle will not be shortened. Happiness never decreases by being shared. .
Our thoughts determine what people and situations mean to us. Our thoughts determine our experience of ourselves and others—how people and things and situations exist for us in our awareness. But we are usually unaware of the role of our thoughts, and so we believe that we are simply experiencing “what is there,” “how things really are.” And therefore we think that it is the people and things and situations outside of ourselves that are causing us to be happy or unhappy.
But actually, whenever we are unhappy, we are always unhappy about our own interpretation of our situation, our own thoughts. And when we are happy, we are really just responding to our own interpretation, our own thoughts. All of our thoughts more or less hold together in our overall way of thinking. Without some level of consistency, we could make no sense of ourselves and the world. Everything would be just meaningless chaos.
What holds any way of thinking together are its foundational core beliefs, its underlying foundational principles. These core beliefs are usually subconscious presuppositions, at least until we make some kind of deliberate effort to discover them.
It turns out that some core beliefs are incompatible with the experience of deep and lasting happiness. What that means is that a way of thinking based on such core beliefs will always interpret everything—every person, thing and situation—in a way that contains some element of conflict and fear. That is not to say that we are unpeaceful and unhappy all of the time. It simply means that there is always at least the potential for threat and conflict and loss in every experience. Sometimes that potential is deeply buried in our subconscious; other times it is fully present in our unhappy awareness. But it is always there, because every interpretation we make is based on core beliefs which are fundamentally incompatible with perfect happiness.
Moreover, it turns out that these core beliefs that are incompatible with happiness are the core beliefs that are so prevalent in human culture that they are simply taken for granted. Most of us don’t think of them as “beliefs” or “choices” at all—we think that they simply describe “how things really are.” And so our usual everyday experience tends to vacillate between happiness and unhappiness. There may be relative differences in the mixture from person to person. But most of us have this on-going cycle, this mixture of happiness and unhappiness. This is what some mystics call “the endless wheel of suffering,” or “the endless wheel of life and death.”
Until we recognize those core beliefs, and we replace them with different core beliefs, we can never experience deep and lasting happiness no matter what we do, or how much we acquire, or what special techniques we practice, or how many affirmations and visualizations we do. Our habitual thought patterns will always end up interpreting our lives in a way that introduces an element of fear and conflict. Our happiness will always be sabotaged, at least to some extent, by our underlying fundamental principles. But due to the mental sleight of hand called “projection,” it will always seem to us that our unhappiness is being caused by external forces beyond our control.
We all live through moments of happiness and unhappiness, each varying in intensity. Which experience, would we say, can be the stronger of the two?
Before answer, let’s clarify first what “strength of an emotion” means. In accordance with the definition of happiness, I propose that one “happy moment” is of equal strength to one “unhappy moment” if we would be indifferent to re-living both of them (if offered as a “package”), i.e. the positive moment exactly compensates the experience from the negative one. With this in mind, I believe most people would say that being in a state of maximum unhappiness (which would most likely be a state of severe pain) can considerably outweigh maximum states of happiness (be it sexual pleasure, feelings of success, etc.) of same duration.
We may also try to explain this subjective assessment from a more “objective” and evolutionary perspective. As both pleasure and pain are nature’s tools to motivate us to do what is best for our (genes’) reproduction, the question is: Does nature steer us more by telling us what not to do (punishment), or by actively rewarding us for what nature understands as positive actions or happenings?
At last I leave you with great Indian poet Kalidasa.Read and think deeply about happiness and unhappiness of human life….
KALIDASA
Listen to the Exhortation of the Dawn!
Look to this Day!
For it is Life, the very Life of Life.
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence.
The Bliss of Growth,
The Glory of Action,
The Splendor of Beauty;
For Yesterday is but a Dream,
And To-morrow is only a Vision;
But To-day well lived makes
Every Yesterday a Dream of Happiness,
And every Tomorrow a Vision of Hope.
Look well therefore to this Day!
Such is the Salutation of the Dawn!

ग्लोबल वार्मिग और कृषि

अभी हाल ही में जलवायु पर चर्चा करने के लिए कोपनहेगन में पूरा विश्व इकठ्ठा हुआ था। लेकिन सम्मेलन से ठोस कुछ भी हासिल नहीं हुआ। पहले भी क्योटो प्रोटोकाल के नाम से एक अंतरराष्ट्रीय संधि हो चुकी है। क्योटो प्रोटोकाल का लक्ष्य है वर्ष 2012 तक जीएचजी का उत्सर्जन 1990 के उत्सर्जन स्तर से नीचे ले जाना। यदि यह संधि सफल रहती है तो वायुमंडल में जीएचजी की मात्रा घटेगी और धरती का तापमान सामान्य हो जाएगा। लेकिन संधि असफल रही तो धरती की गर्मी में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी।
कोपनहेगन जलवायु सम्मेलन में शामिल हुए भारत के विशेष दूत श्याम सरन के मुताबिक कोपनहेगन जलवायु सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन की कटौती के सिलसिले में आपसी सहमति के साथ कानूनी तौर पर बाध्यकारी फैसला होना चाहिए था। हालांकि सम्मेलन की कामयाबी को लेकर दुनियाभर में पहले से ही आशंकाएं थी। अमीर देशों ने सब कुछ पहले से तय कर रखा था। विकासशील देशों के सलाह के बिना ही ड्राफ्ट तैयार कर लिया। इस ड्राफ्ट के लीक हो जाने से विकासशील देशों में खलबली मची गई। जी-77 के अध्यक्ष सूडान के लुमुंबा स्टैनिसलैस डिया ङ्क्षपग ने कहा कि डेनमार्क की तरफ से पेश किया गया ड्राफ्ट बहुत ही खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है, इससे कोपनहेगन सम्मेलन असफल रहा।
ग्लोबल वर्मिग ने समूचे जलवायु चक्र को प्रभावित किया है। हम जानते है कि कृषि पूरी तरह से मानसून के मिजाज पर निर्भर करती है। अतिवृष्टि, सूखा और बाढ़ बदलते जलवायु की ही देन है, जिनसे कृषि प्रभावित होती है। इसका कोई स्थायी उपाय अब तक संभव नहीं हो सका।
कृषि अब पहले की तरह समृद्ध नहीं रही। किसान यह कहने पर मजबूर है कि अब कृषि की से कोई फायदा नहीं है। वह खेती करने की बजाय अन्य उद्यमों की ओर आकॢषत हो रहा है। क्योंकि खेती के लिए आवश्यक परिस्थितियों और संसाधनों का घोर अभाव है। ये परिस्थियां प्राकृतिक है,जो कृषि चक्र के लिए बहुत ही जरुरी है।

बीज बोते समय कृषि भूमि में कितनी नमी हो, कितनी गर्मी हो कि बीज बोया जाए, बीज बोने के उपरांत कितने समयांतराल पर कितना पानी उपलब्ध हो, एक समय इन चीजों के आधार पर किसान उपज का पूर्वानुमान लगाता था। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में किसान न तो पूर्वानुमान ही लगा पाते हैं और न ही इसे सुनिश्चित करने का कोई उपाय तलाश पाते हैं। इसकी प्रमुख वजह है जलवायु में हो रहा परिवर्तन, जिसके चलते बाढ़, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने तो कृषि को प्रभावित किया है। निरंतर घटता जा रहा भू-जल स्तर भी कृषि के लिए स्थायी समस्या बन चुका है। इससे पेय जल की समस्या तक खड़ी हो गई है।

कुछ साल पहले तक किसान या आम आदमी केवल इन समस्याओं से जूझता था, इन बदलती जा रही परिस्थितियों को महसूस करता था। लेकिन अब वह इसके पिछे छिपे जलवायु परिवर्तन की भूमिका को भी समझने लगा है। शिक्षित लोगों के अलावा एक अशिक्षित किसान भी आज इस बात को समझने लगा है कि धरती गर्म होती जा रही है। बीज के स्वस्थ अंकुरण के लिए आवश्यक पर्याप्त नमी और गर्मी का संतुलन कृषि भूमि में अब पहले जितना सहज नहीं रहा है। और रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल ने फसल की गुणवत्ता के साथ-साथ भूमि की उपजाऊ शक्ति को भी किस हद तक प्रभावित किया है।

फसल की सिचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता तो एक स्थाई समस्या बनती जा रही है। पिछले कुछ समय में पिघलते ग्लेशियर, बाढ़, भू-स्खलन, तूफान, समुद्री जलस्तर का बढऩा और भू-जलस्तर का नीचे गिरना ग्लोबल वाॄमग की ही देन है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 85 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक आपदाओं के दायरे में आता है। 40 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़, 8 फीसदी चक्रवात और 68 फीसदी जमीन सूखे के दायरे में आती है। दूसरी ओर पिछले सौ सालों में देश में बाढ़, सूखा, भूकंप, तूफान, सूनामी और भू-स्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ग्राफ लगभग सौ फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 1996 से 2000 के बीच देश को सकल घरेलू उत्पाद का 2.25 और राजस्व का 12.5 फीसदी हिस्से का नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट में इसकी मूल वजह भौगोलिक परिस्थितियों, संसाधनों की कमी, आपदाओं से लडऩे की तैयारियों में अभाव और जलवायु परिवर्तन को बताया गया है। हिमालय के 8 हजार ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं उससे कृषि योग्य भूमि के डूबने की आशंका है। समुद्र का जल स्तर बढऩे से कई द्वीप और तटवर्ती इलाकों के जलमग्न होने और लोगों को अपनी जान बचाने का संकट भी है।

जलवायु परिवर्तन के बारे में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आईपीसीसी के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी के मुताबिक भारत सहित कई देशों की कृषि पैदावार जलवायु परिवर्तन की वजह से बुरी तरह प्रभावित होगी। गेहंू, चावल तथा दाल की पैदावार पर इसका ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। यह स्पष्ट है कि भारत की अधिकांश आबादी का मुख्य भोजन, गेहंू, दाल और चावल ही है। इसलिए इस उत्पादन में होने वाली कमी से भारत में पडऩे वाले प्रभाव का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इससे निजात पाने के लिए किसानों को जल तथा प्राकृतिक संसाधनों के संयमित दोहन की जरूरत है।

जिस प्रकार अधिकाधिक उपज प्राप्त करने की लालसा में भू-जल का दोहन और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है वह इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रहा है। इसलिए अब किसानों को कृषि के तौर-तरीकों और फसल चक्र में बदलाव लाने की जरूरत है। कृषि के लिए उन तरीकों को अपनाया जाय जिसमें कम पानी और सूखे की स्थिति में पर्याप्त उपज प्राप्त किया जा सके। डॉ. पचौरी ने 2007 में अपनी चौथी मूल्यांकन रिपोर्ट में वैश्विक तापमान में 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी की संभावना व्यक्त की है। इससे बारिश के पैटर्न में भारी बदलाव होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की इसका विद्युत, जल संसाधन और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए यह जरुरी है कि रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को कम करते हुए जैविक खेती पर ध्यान दिया जाए। जैविक खाद के उपयोग से न केवल भूमि की उर्वरता बढ़ेगी बल्कि उसमें नमी की वजह से काफी हद तक सूखे की समस्या से भी निजात मिलेगी। वर्तमान में 180 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि का भविष्य में संवद्र्धन करने में जैव उर्वरक एक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।


औद्योगिकीकरण के नाम पर जंगलों को अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों का कटाव और उसकी वजह से वर्षा चक्र में उत्पन्न

अनियमतता किसी से छुपी नहीं है। जिसका परिणाम भूमि के कटाव, भू-स्खलन के रूप में हमारे सामने है जो कृषि को प्रभावित करता है। वहीं दूसरी ओर ग्लोबल वाॄमग के चलते जिस गति से वाष्पीकरण और अन्य माध्यमों से जल का हनन हो रहा है उसके सापेक्ष जल संवद्र्धन, वर्षा जल एकत्रीकरण के उपाय नहीं किए गए हैं।

जंगलों की कटाई और औद्योगिकीकरण के चलते वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन व अवशोषन का समीकरण गड़बड़ाया है। जिसका एक मात्र उपाय ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण है। इसके लिए ग्रीनर ट्रांसपोर्ट, भवन ऊर्जा का कुशल उपयोग, वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग और परमाणु ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने जैसे उपाय सुझाए गए हैं। लेकिन इसके साथ हमें वृक्षारोपण, परिस्थितिकी संतुलन और ऊर्जा संरक्षण पर भी जोर देना होगा।

ईंधन के रूप में बायो फ्यूल का उपयोग कु छ हद तक प्रदूषण में कमी लाएगा। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि बायो फ्यूल फसलें उगाने से हमारी खाद्दान्न उपलब्धता कितनी प्रभावित होगी, खासकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में। इस संदर्भ में विचार करना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि सरकार द्वारा एथनॉल तथा जेट्रोफा की खेती पर पहले से ही काम किया जा रहा है।

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन का जो स्पष्ट प्रभाव देखा जा रहा है वह खाद्दान्न असुरक्षा के रूप में सामने आ रहा है। वहीं प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से खाद्दान्न की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। साथ ही तमाम किस्म की बामारियों का उद्भव भी हुआ है। जलवायु परिवर्तन मनुष्य के सर्वांगीण विकास के तत्वों—आजीविका, भोजन, स्वास्थ्य, संस्कृतिक और सामाजिक संबंधों—को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। इसके यथेष्ट समाधान के लिए आवश्यक है कि हम अपने अतीत के अनुभवों और ज्ञान से सबक लें और ऐसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करें जो कि खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए जलवायु परिवर्तन के लिए कारगर साबित हों।

भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसदी तक की कमी लाने का प्रयास करेगी। यह एक बहुत बड़ा कदम होगा, जिसे हासिल करना काफी मुश्किल होगा। वैसे कुछ छोटे-छोटे उपाय भी वैश्विक उष्णता को बढऩे से रोक सकते हैं। जरूरत केवल इंसानी जज्बे की है।
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वाॢमंग की वजह सेे होने वाले बदलाव भविष्य में और अकस्मात तथा अप्रत्याशित होंगे। रिपोर्ट में अगाह किया गया है कि अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र के जलस्तर में अचानक हुई बढ़ोतरी, कैलीफोॢनया के मौसम में बदलाव, भारत तथा नेपाल में मानसून के प्रभावित होने का करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ हुआ है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के ग्लोबल क्लाइमेट इनीशियेटिव के प्रमुख किम कारस्टेनसेन के मुताबिक अगर हमने जलवायु परिवर्तन को लेकर त्वरित कदम नहीं उठाए तो हमें विध्वंसकारी परिणाम भुगतने होंगे।

क्या है ग्लोबल वाॄमग?

ग्लोबल वाॄमग धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी है। धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणें से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुई धरती की सतह से टकराती है और फिर वहीं से परिवॢतत होकर पुन: लौट जाती है। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसे कार्बन डाई आक्साईड, मीथेन, क्लोरो फ्लोरो कार्बन आदि भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणें के एक हिस्से को रोक लेता है। इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। याद दिला दे कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रखने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणें को रोकने लगता है। फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वाॄमग के दुष्प्रभाव।

ग्लोबल वाॄमग की वजह

ग्लोबल वाॄमग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां ही हैं। मनुष्यजाति इन गतिविधियों से कार्बन डाईआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसो की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है जिससे इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावॢतत किरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृद्धि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों, उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन, धुंआ निकालने से कार्बन डाइआक्साइड में बढ़ोतरी हुई है। जंगल कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा की प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनकी बेतहाशा कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रण भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है।

इसकी एक अन्य वजह सीएफसी है जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का काम करता है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है, जिससे पराबैंगनी किरणें सीधे धरती पर पहुंच रही है। और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही है।


यह बढ़ते तापमान का ही नतीजा है कि ध्रुवों पर सदियों से जमी बर्फ भी पिघलती जा रही है। विकसित हो या अविकसित देश, हर जगह बिजली की जरूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन के लिए जीवाष्म ईंधन का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में करना पड़ता है। जीवाष्म

ईंधन के जलने पर कार्बन डाइआक्साइड पैदा होती है जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा ग्लोबल वाॄमग के रूप में सामने आता है।

ग्लोबल वाॄमग से कैसे बचें?


ग्लोबल वाॄमग के प्रति दुनियाभर में ङ्क्षचता बढ़ रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज’ (आईपीसीसी) को नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है।
ग्लोबल वाॄमग रोकने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होकर निम्नलिखित प्रयास करने होंगे-

1. सभी देशों क्योटो संधि का पालन करें। इसके तहत 2012 तक हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा।
2. यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। हम सभी भी पेट्रोल, डीज़ल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं।
3. जंगलों की कटाई को रोकना होगा। हम सभी अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, इससे भी ग्लोबल वाॄमग के असर को कम किया जा सकता है।
4. तकनीकी विकास से भी निबटा जा सकता है। ऐसे रेफ्रीजरेटर्स बनाए जाएं, जिनमें सीएफसी का इस्तेमाल न होता हो और ऐसे वाहन बनाएं जाएं, जिनसे कम से कम धुआं निकलता हो।


जलवायु परिवर्तन की वजह से फसलों के उत्पाद पर बुरा प्रभाव पड़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक दक्षिण अफ्रिका में 30 फीसदी तक फसलों के उत्पादन में गिरावट आ सकती है। वहीं दक्षिण एशिया में चावल और मक्का का उत्पादन 10 प्रतिशत कम हो जाएगा।

कृषि का वातावरण पर प्रभाव-

केवल जलवायु ही कृषि को प्रभावित नहीं करती है, बल्कि कृषि भी जलवायु को प्रभावित करती है। कृषि के दौरान मीथेन, कार्बन डाईआक्साइड और नाइट्रस आक्साइड जैसी गैसे निकालती हैं, जो ग्रीन हाउस गैसे हैं। खेती के लिए जंगलों की कटाई की जाती है जिससे कार्बनडाइआक्साइड गैसे अवशोषित नहीं हो पाती। धान की खेती के दौरान 54 फीसदी मीथेन गैस निकलती है। खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल से 80 फीसदी नाइट्रस आक्साइड निकलती है।

स्वामिनाथन और सिन्हा के रिपोर्ट के मुताबिक 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढऩे से चावल का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर घट जाता है। वहीं 0.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढऩे से गहंू की पैदावार 0.45 टन प्रति हेक्टेयर तक कम हो जाती है। शशीधरन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक डिग्री तापमान में बढ़ोतरी से चावल के उत्पादन में 6 डिग्री तक कमी आ जाती है.


सालाना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन-

1. औद्योगिक प्रक्रिया-16.8 प्रतिशत
2. ट्रांसपोटेशन ईंधन-14.0 प्रतिशत
3. कृषि बायो प्रोडक्ट्स-12.5 प्रतिशत
4. फासिल फ्यूल -11.3 प्रतिशत
5. पावर स्टेशन-21.3 प्रतिशत
6. वेस्ट डिस्पोजल और ट्रीटमेंट से -3.4 प्रतिशत
7. भूमि—प्रयोग और बायोमास बॢनंग से -10 प्रतिशत
8. आवासीय, वाणिज्यिक और दूसरे स्रोतों से -10.3 प्रतिशत





 
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