Pillar of True Journalism to save Public Domain

Friday, June 3, 2011

आम आदमी की यह अजब दास्तान

मैंने तो सोचा था कि आम आदमी वह है, जो पैसों की गर्मी से फैलता और कमी से सिकुड़ता है। जो महंगाई की आहट से कांप जाता है। आम आदमी तो दुखों का ढेर है। अभावों का दलदल है। मुकम्मल बयान है, चेहरे पर दर्द का गहरा निशान है। तभी एक बात सोचकर मुस्करा दिया। किसी ने कहा था: फलों का राजा आम होता है। धत्, भला राजा भी कहीं ‘आम’ हो सकता है!

उस दिन भी रोज की तरह बगीचे में टहल रहा था। मन में अजब बेचैनी थी। तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। तभी मेरी नजर एक पके आम पर पड़ी। आम को देखते ही जाने क्यों आम आदमी का ख्याल आ गया। भाषण, लेख, हिदायतों और नसीहतों के बीच बचपन से ही आम आदमी के बारे में सुनता आ रहा हूं।

लगा कि भले बदलाव की तेज आंधी ही क्यूं न चले, पर आम आदमी के हाथ न कभी कुछ लगा है, न लग पाएगा। जब आम आदमी का जिक्र आता है तो मन में एक अजीब सहानुभूति आ जाती है। मैं सोच में डूबा सड़क पर आ गया। सोचा चलो आज सबसे पूछते हैं कि ये आम आदमी है कौन?

सामने मोटरसाइकिल दनदनाते दरोगाजी दिख गए। दुआ-सलाम के बाद उनसे पूछ ही लिया आम आदमी के बाबत। आम आदमी का नाम आते ही साहब लार टपकाते बोले - आम आदमी यानी पका फल, जिसे चूसने के बाद गुठली की तरह फेंक दिया जाता है। भाई साहब हमें तो यही ट्रेनिंग दी जाती है कि जब चाहो आम आदमी का मैंगो शेक बना लो या अचार डालकर मर्तबान में सजा लो। वैसे हमें आम आदमी का मुरब्बा बहुत पसंद है।

अभी आगे बढ़ा ही था कि एक रिक्शेवाला मिला। सोचा इनके भी विचार जान लेते हैं। पूछने पर पता चला कि वह पोस्ट ग्रेजुएट है और नौकरी नहीं मिलने की वजह से जीवन-यापन के लिए यह काम कर रहा है। बातचीत के दौरान ही मैंने सवाल दाग दिया, तुम आम आदमी के बारे में क्या सोचते हो? रिक्शेवाले ने मुझे टेढ़ी नजरों से देखा और बोला- आम आदमी? वह तो मेरे रिक्शे की तरह होता है। सारी जिंदगी चूं-चूं करते बोझ ढोता है। जब किसी के काम नहीं आता तो अंधेरी कोठी में कबाड़ की तरह डाल दिया जाता है।

रास्ते में मेरा स्कूल दिख गया। बचपन के इस स्कूल को देखते ही मैंने रिक्शा रुकवाया, दस का नोट पकड़ाया। स्कूल पहुंचा तो देखा पहले की तरह ही लकड़ी की कुर्सी पर बैठे गुरुजी ऊंघ रहे थे। स्कूल के फंड और मिड-डे मील पर चर्चा हुई। यहां भी वही सवाल। गुरुजी बोले, आम आदमी को मैं कोल्हू का बैल मानता हूं, जो नून-तेल-लकड़ी के लिए एक चक्कर में घूमता रहता है, लेकिन कहीं पहुंचता नहीं।


बातचीत में बहुत देर हो गई। घर आते ही मां बरस पड़ीं - इतनी देर कहां लगा दी? पैर में दर्द हो रहा है, सुबह से दवा के लिए बोल रही हूं। मां सचमुच दर्द से कराह रही थीं। मैं तुरंत डॉक्टर के पास चल पड़ा।


दवा लेने के बाद डॉक्टर साहब से भी सवाल दाग दिया। कान से आला निकालते हुए साहब दार्शनिक हो गए। बोले - आम आदमी हमारे लिए टीबी, मलेरिया, बुखार है। हमारे लिए वही सबसे भला है, जिसका इलाज हमारे क्लिनिक में लंबा चला है।

शाम सुहानी थी। मोहल्ले के कुछ दोस्तों ने दावत का प्रोग्राम बना दिया। जगह तो हरदम की तरह मोहल्ले के नेताजी का बरामदा थी। खाने का आनंद लेते समय नेताजी से भी पूछ बैठा आम आदमी के बारे में। नेताजी के चेहरे पर चमक आ गई। बोले, आम आदमी हमारे बड़े काम का है। हम जो चुनावी महाभारत रचते हैं, उसमें आम आदमी विपक्ष को पछाड़ने के लिए नोट है, बस इतना जान लें कि आम आदमी हमारे लिए अदना-सा वोट है।

मैं हैरत में था। सोचने लगा क्या आम आदमी की यही परिभाषा है? मैंने तो सोचा था कि आम आदमी वह है, जो पैसों की गर्मी से फैलता और कमी से सिकुड़ता है। जो महंगाई की आहट से कांप जाता है। आम आदमी तो दुखों का ढेर है। अभावों का दलदल है। मुकम्मल बयान है, चेहरे पर दर्द का गहरा निशान है। तभी एक बात सोचकर मुस्करा दिया। किसी ने कहा था: फलों का राजा आम होता है। धत्, भला राजा भी कहीं ‘आम’ हो सकता है!

Monday, May 16, 2011

मीडिया में गैर-हाजिर किसान

काश!

'सत्य सांई'

होते 'टिकैत'







इस शीर्षक को पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि मैं कैसी बेतुकी बातें कर रहा हूं। भला महेंद्र सिंह टिकैत को सत्य सांई बनने की क्या जरूरत है। टिकैत एक किसान नेता थे और सांई प्रख्यात संत। सांई में आस्था रखने वालों में बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल थी। वहीँ टिकैत अभाव में जी रहे किसानो क़ि एकमात्र आवाज़ थे। सांई लोगों क़ि नज़रो में भगवान और टिकैत मामूली नेता किसान। फिर एक किसान को संत बनने की क्या जरूरत है। पर जरूरत है।

देश के दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो जाता है। उनके निधन की खबर शायद ही किसी न्यूज चैनल की ब्रेकिंग खबर बन पाती है। किसी ने भी इस खबर को अपने तेज-20 या 100 में जगह देना उचित नहीं समझा। कहीं खबर चली तो वह भी एक बार नाम के लिए। अखबारों में इस खबर के लिए एक कॉलम की जगह देकर जिम्मेदारी से छुट्टी पा ली गई। ( कुछ जिम्मेदार अखबारों और चैनलों को छोड़कर)


वहीं जब सत्य सांई का निधन हुआ था, तो सारा मीडिया टूट पड़ा था। चैनलों में प्राइम टाइम पैकेज चलाए गए, तो अखबारों के कई पेज भरे गए। उनकी बीमारी से लेकर संपत्ति के बटवारें तक की चर्चा की गई। उत्तराधिकारी के लिए बहसवाड़े का आयोजन किया गया। वसीयत पर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दी गई। ये है दो महान व्यक्तियों के निधन पर मीडिया कवरेज की असलियत।

इस बात पर अधिकतर मीडियावालों की दलील होती है कि, भईया हम कॉरपोरेट मीडिया युग में काम कर रहे हैं। भला एक किसान के मरने की खबर को इतनी प्रमुखता कैसे दे सकते हैं। मैं भी मानता हूं कि मोटी सैलरी के लिए पूंजी की जरूरत होती है। और पूंजी के लिए विज्ञापन की। और विज्ञापन के लिए वैसी खबरों की। इसलिए वैसी खबरें देना मजबूरी है। पर मेरा मानना है कि आप तेज-20 या 100 में ऐसी खबरों को एक जगह तो दे ही सकते हैं।

खैर, बिन मांगे सुझाव देने की क्या जरूरत। जो मीडिया पुलिस और प्रशासन के एंगल से खबर बनाता हो, वह भला इस बात को क्या समझेगा। हाल ही में ग्रेटर नोयडा के भट्टा-परसौल में हुए पुलिस-किसान संघर्ष में अधिकतर मीडिया घरानों ने प्रशासन के एंगल से खबर लगाई थी। अखबारों में शीर्षक था- 'पुलिस-किसान में खूनी संघर्ष, 2 पुलिस वालों सहित 4 की मौत'। इस शीर्षक में दो किसानों की मौत को छुपा लिया गया। क्या पुलिस वालों की जान, किसान की जान से ज्यादा कीमती है?

हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि हमारा देश को कृषि प्रधान देश है। गांवों का देश है। पर दुर्भाग्य है इस देश का कि जिसके बलबूते पर हैं, उसी की सबसे ज्यादा बेइज्जती करते हैं। किसान अपने हक क़ि आवाज़ उठाते हैं तो उनका दमन करते हैं। उस पर पड़ने वाली हर लाठी में अपनी जीत का जश्न मनाते हैं।

निर्दोष मौत के बाद भी उसको मीडिया में भी वो जगह नहीं मिल पाती. जो लोगो में किसान के प्रति संवेदना जगाये। जो ये बताये क़ि अपने हक के लिए लड़ने वाले के साथ ये सुलूक कहां का इन्साफ है। हर तरफ से उपेक्षित हुआ किसान अब मीडिया से भी कोई आस नहीं लगा सकता। लोकतंत्र और कमजोरों निरीहों का तथाकथित पहरेदार मीडिया भी आंखें बंद करके इस दमनचक्र का गवाह जो बना हुआ है।


http://www.samachar4media.com/


http://www.samachar4media.com/content/mukesh-kumar-artical-on-media-00091%20


http://vichar.bhadas4media.com/media-manthan/1276-2011-05-16-12-59-15.html

Monday, May 9, 2011

ओसामा के माफिक 'तेवतिया' के पीछे पड़े माया के वर्दीवाले गुंडे

वेस्ट यूपी के ग्रेटर नोएडा, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के किसान हक के हवन कुंड में जल रहे हैं। खाकी खून की प्यासी हो गई है। बच्चे, बूढ़े, जवान सब पर वर्दी कहर बरपा रही है। जमीन की जंग में समूचे खेत और गांव जलाए जा रहे हैं। सियासत के सपेरें, तपते हुए इस मामले पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने भागे-भागे आ रहे हैं। यहां गिरफ्तारी देने की होड़ मची है। ऐसा लग रहा है, जैसे गिरफ्तारी के बाद मिलने वाले प्रसाद से इन सभी को मोक्ष मिल जाएगा।

इनाम की घोषणा कर ओसामा की माफिक यूपी पुलिस कथित किसान नेता 'तेवतिया' को ढूढ़ रही है। अपनी मांग को लेकर विद्रोह करने वाले शख्स को अपराधी घोषित कर दिया गया है। इस शख्स की पत्नी का कहना है कि, उसका पति अपराधी नहीं समाजसेवी हैं। यदि वह अपराधी हैं, तो अन्ना और केजरीवाल क्या हैं? पुलिस इलाके में डेरा डाले हुए है। उनके आतंक का आलम यह है कि किसान गांव छोड़कर भाग गए हैं। इस रवैये से साफ जाहिर हो रहा है कि मायावती के वर्दीवाले गुंडों ने आंदोलनकारी किसानों को सबक सिखाने का फैसला कर लिया है।

उदाहरण पेश करना चाहती है सरकार
कोशिश है कि किसानों का ऐसा दमन करो कि मिसाल कायम हो जाए। फिर कोई दूसरा सरकार के खिलाफ सर उठाने की कोशिश ना करें। जैसा अमेरिका ने ओसामा को मारकर विश्व के सामने एक उदाहरण पेश किया कि हमसे पंगा लोगे तो ऐसा ही होगा, कुछ इसी तरह यूपी सरकार तेवतिया को पकड़ कर उदाहरण देना चाहती है।

विकास के नाम पर कत्ल
पश्चिम उत्तरप्रदेश के विभिन्न इलाकों में अधिग्रहण और उसके विद्रोह का मामला कोई नया नहीं है। दिल्ली के फैलने के साथ आस-पास के इलाकों में शहरी क्षेत्र बसाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इस क्षेत्र के लोगों की जरूरत पूरी करने के लिए सड़क और उद्योग बसाने के लिए जमीन की जरूरत पड़ी। ऐसे में पहले नोएडा फिर ग्रेटर नोएडा का जन्म हुआ।

वेस्ट यूपी के इलाके की धरती सोना उगलती है। हरित क्रांति को सफल बनाने में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही है। इस उपजाऊं धरती को किसानों से छीनकर सरकार कंक्रीट का जहां बसाना चाहती है। सरकार ने बिल्डरों, रीयल इस्टेट कंपनियों और देशी-विदेशी बड़ी कंपनियों के हक में किसानों के खिलाफ एक तरह से हल्ला-बोल दिया है। सीधे-सीधे सरकार की अगुवाई में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन लूटी जा रही है।

क्या करें किसान
पेट मार लात मार रही सरकार से झल्लाये किसान विद्रोह ना करें तो क्या करें? विकास के नाम पर किसी की रोजी-रोटी छीनने की कोशिश की जाएगी तो यही हाल होगा। इन इलाकों के किसानों का कहना है कि मुआवजा तो एक समय तक चलता है, फिर इसके बाद का क्या होगा। कुछ किसानों का कहना है कि मुआवजा मिलने से हमारी आगामी पीढी़ भी खराब हो रही है। अचानक आए धन का नकारात्मक प्रभाव इन पर पड़ रहा है।

दलाली ना करे सरकार
यहीं, कुछ किसानों का मानना है कि, यदि विकास के लिए जमीन की जरूरत है तो उन्हें मुआवजा बाजार भाव के हिसाब से दिया जाए। सरकार जमीन की दलाली छोड़ दे। किसान, व्यापारियों से सीधे डील करना चाहते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों सरकार को इससे आपत्ति है? अपनी ताकत की बदौलत वह किसानों की आवाज दबाना चाहती है।

कहीं लीबीया और मिश्र जैसा ना हो जाए हश्र
यूपी सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि जब आवाम ठान लेती है तो बड़ी से बड़ी ताकत घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। इसका ताजा उदाहरण लीबीया और मिश्र में हुई क्रांति है। अब समय रहते सरकार को चेत जाना चाहिए, वरना गद्दाफी और मुबारक जैसा हश्र होने में देर नहीं लगेगी।

Wednesday, April 27, 2011

जर्जर योजनाओं से हिचकोले खाता विकास का पहिया

अपने एक दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए बिहार के गोपालगंज जिले में गया हुआ था। रात के तीन बज रहे थे। दोस्त अपने जीवन संगनी संग सात फेरे ले रहा था। उसका ससुराल हजारों बल्ब की रौशनी में जगमगा रहा था। हलवाई सुबह के नाश्ते का इंतजाम करने में लगे थे। मैं शोर से थोड़ा निजात पाने के लिए मंडप से बाहर निकला।

सड़के के उस पार लालटेन की धीमी रौशनी टीमटीमा रहीथी। साथ ही टार्च की हल्की लाइट में कोई कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था। कौतुहलवश मैं उस रौशनी की तरफखिंचता चला गया। पास जाने पर देखा कि एक 55 साल के व्यक्ति बड़े-बड़े पन्नों पर कुछ लिख रहे थे। पूछने परपता चला कि वह गांव के स्कूल में टीचर हैं। और जनगणना से संबंधित काम कर रहे हैं।

पूरी रात काम करने वाले मास्टर साहब से जब पूछा कि आप कल बच्चों को कैसे पढाएंगे, तो उन्होंने कहा कि, जबतक यह काम चलेगा तब तक स्कूल में छुट्टी रहेगी। और कुरेदने पर तो उनके दिल का दर्द ही छलक उठा। उन्होंनेजो बयां किया, वो आप भी जान लीजिए। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहने लगे क़ि जनगणना के काम का बोझहम शिक्षको पर लाद दिया गया है।

हमें तो कुछ कहने तक का अवसर नहीं दिया गया। अब हम बच्चो को पढाये या जनगणना के काम में अपनीचप्पलें घिसे। हमारी हालत फिल्म 'थ्री ईडियट्स' के प्रोफेसर कि तरह हो गयी है जो एक समय में अपने दोनों हाथोंसे लिखता था और दो अलग-अलग काम एक साथ कर सकता था।


जनगणना जैसे अतिरिक्त काम ने तो हमारे जीवन कागणित ही बिगाड़ दिया है। अब इससे ज्यादा क्या कहे क़िहमारी निजी ज़िन्दगी भी कभी थी, इसको ही भूल बेठे हैं।स्कूल के बच्चो के लिए तो समय निकालना दीगर बात है, अपने बच्चों के चेहरे देखने तक का वक़्त नहीं मिलता।खाने-पीने की तो सुध ही नहीं, नींद भी पूरी नहीं हो पाती।

आंखों पर मोटा चश्मा लगाए ठण्ड से कांपते मास्टर साहबने बताया कि हमें तो दोहरी जिम्मेदारी दे दी गयी है। थोड़ीसंवेदना तो रखी होती हमसे भी। सर्दी जब कहर बरपा रही थी तब हम घर-घर के चक्कर काट रहे थे।

हमें शुरुआत में काफी दिक्कते आई। हर दरवाजे पर इंतज़ार करना मन में चिडचिडाहट भी पैदा कर देता था। कुछलोग तो अंदर आने को भी पूछ लेते हैं पर कुछ बाहर से ही रुखसत कर देते हैं। धीरे-धीरे इस बातों की आदत सीहोने लगी है। स्कूल में भी हमारे साथी एक दूसरे क़ि हालत पूछ कर खुद को तसल्ली देने क़ि कोशिश करते रहते हैं।कभी ना कभी तो काम निपटेगा इसी आस में लगे हैं कोल्हू के बैल की तरह। एक से दूसरे घर, दूसरे से तीसरे औरफिर यही क्रम रोज़ चलता रहता है।

काम निपटने को आ गया पर नींद अब भी हराम है। एक अनचाहा डर सताने लगा है क़ि सरकार आने वाले दिनों मेंऔर कौन-कौन से काम हमसे करवाएगी। हमारे उपर तो देश के भविष्य क़ि ज़िम्मेदारी है फिर हमें क्यूं ऐसे कामोंमें लगाया गया। कोई कुछ भी कहे पर सौ क़ि एक बात कहूंगा क़ि शायद ही कोई शिक्षक इस अनुभव को दोबाराजीने के लिए उत्सुक होगा।

अब बताइए कि देश के भविष्य के साथ ये क्या हो रहा है। जिस व्यक्ति का काम पढ़ना और पढ़ाना है, वह रात-दिन जनगणना का काम कर रहा है। यह नजारा केवल बिहार का ही नहीं कमोवेश पूरे देश का है।

Thursday, March 10, 2011

सावधान! आप सब्जी नहीं 'जहर' खा रहे हैं

बेमौसम हरी-भरी सब्जियों के देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। बैंगनी बैंगन और हरे मटर को देख जी ललचा उठता है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि प्रकृति के विरुद्ध जाकर हम जो काम करते हैं, उसका साइड इफेक्ट क्या होता है? नहीं हमारे पास इतनी फुर्सत कहां जो अपने हेल्थ के बारे में सोच सकें। पर नहीं जनाब इस घटना और जानकारी के जानने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

बुलंदशहर जिले में एक परिवार ने बड़े चाव से आलू दम की सब्जी बनाई और खाया। उस रात परिवार के सदस्यों की हालत बिगड़ गई। अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां दो लोगों की मौत हो गई। डॉक्टरों ने मौत की वजह पता लगाई तो होश उड़ गए। दोनों लोगों की मौत आलू की सब्जी खाने से हुई थी। इस तरह हमारे किचन में आने वाली हर सब्जी में जहर होने की संभावना बनी रहती है।

देश में खेती की जगह कम और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसान सब्जियों में केमिकल और किटनाशक धड़ल्ले से डाल रहे हैं। इनसे सब्जी में जहर तेजी से घुल रहा है और हमें मीठी मौत दे रहा है।

सब्जी नहीं केमिकल खा रहे हैं हम

सब्जियों में पाए जाने वाले पेस्टिसाइड और मेटल्स पर अलग-अलग शोध किया गया। शोध के अनुसार सब्जियों के साथ हम कई प्रकार के पेस्टिसाइड और मेटल खा रहे हैं। इनमें केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं और एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे घातक पेस्टीसाइड शामिल हैं।

सब्जियों के साथ शरीर में जाकर ये स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। सब्जियां तो हजम हो जाती हैं लेकिन यह जहर शरीर के विभिन्न संवेदनशील अंगों में जमा होता रहता है। इससे उल्टी-दस्त, किडनी फेल, कैंसर जैसी बीमारियां सामने आती हैं। पालक, आलू, फूल गोभी, बैंगन, टमाटर आदि में इस तरह का जहर पाया गया है। शोध के अनुसार खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है।

इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। प्रभुदान चारण ने टमाटरों के 28 नमूनों का निरीक्षण किया, जिनमें से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

फूलगोभी सबसे ज्यादा है प्रदूषित

खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है। इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। टमाटरों के 28 नमूनों में से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

ये हो सकती हैं ये बीमारियां

सब्जियों के साथ शरीर में जाकर एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे पेस्टिसाइड वसा उत्तकों में जम जाते हैं। बायोमैनीफिकेशन प्रक्रिया से शरीर में इनकी मात्रा बढ़ती रहती है। यह लंग्स, किडनी और कई बार दिल को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी अधिक मात्रा जानलेवा बन जाती है।

इसी तरह मेटल के कारण भी कई गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। केडमियम धातु लीवर, किडनी में जमा होकर इन्हें डेमेज करती है। यह धातु प्रोटीन के साथ जुड़कर उसका असर खत्म कर देता है। इससे कैंसर का खतरा रहता है। इटाई-इटाई नामक बीमारी होने से हड्डियां मुड़ जाती हैं। इस बीमारी को ब्रिटल बोन भी कहा जाता है। जापान में सबसे पहले यह तथ्य सामने आया था, जहां इसे इटाई-इटाई नाम दिया गया।

जिंक से उल्टी-दस्त, घबराहट होना आम है। ज्यादा मात्रा में जमा होने पर लीवर पैन की शिकायत हो जाती है। ज्यादा मात्रा होने पर इसे जिंकचीली कहा जाता है। सीसा की मात्रा शरीर में ज्यादा होने पर असहनीय दर्द होता है। किडनी पर इसका असर सीधा होता है और वह फेल हो सकती है। मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। खून में इसकी मात्रा बढ़ने पर एनिमिया हो जाता है। लीवर को भी यह प्रभावित करता है। इससे लकवा होने की आशंका भी रहती है। क्रोमियम से चर्मरोग व श्वास संबंधी बीमारियों के साथ शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म होने की समस्या रहती है।

कैंसर होने की संभावना भी बनती है। कॉपर से एलर्जी, चर्मरोग, आंखों के कॉर्निया का प्रभावित होना, उल्टी-दस्त, लीवर डेमेज, हाइपर टेंशन की शिकायत मिलती है। मात्रा बढ़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है। हिमोग्लोबिन के साथ जुड़कर यह उसे कम कर देता है।

साभार दैनिक भास्कर डॉट

Sunday, March 6, 2011

न्यूयार्क में हुए नैना चार, काशी में हुआ मंत्रोच्चार

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद वरुण गांधी और कोलकाता की ग्राफिक डिजाइनर यामिनी रॉय की शादी आज वाराणसी के कामकोटेश्वर मंदिर में सम्पन्न हो गई। इनकी शादी हनुमानघाट इलाके स्थित कामकोटेश्वर मंदिर में परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ वैदिक मंत्रोचार के बीच हुई।

विवाह के बाद वर-वधु ने काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर आर्शीवाद भी लिया। पर क्या आप जानते हैं कि इस जोड़े की प्रेम कहानी की शुरूआत सात-समंदर पार अमेरिका में हुई थी।बात सन् 2004 की है। उस समय वरुण अमेरिका के न्यूयार्क शहर गए हुए थे। वहीं एक भारतीय कार्यक्रम में उनकी मुलाकत यामिनी से हुई। दोनों की आंखें चार हुई और एक-दूसरे के लिए दिल में जगह बन गई। दोस्ती का सिलसिला शुरू हो गया।

लंदन में वरुण के एक दोस्त के रेस्टोरेंट में डिजाइनिंग का जिम्मा संभालने गई यामिनी से वरुण की नजदीकियां और बढ़ी।लंदन में पढ़ाई कर चुके वरुण के लिए यह शहर अनजान नहीं था। उन्होंने यामिनी को पूरे लंदन की सैर कराई। इस मस्ती में दोनों एक-दूसरे के नजदीक आते गए। दोनों का साथ में लगातार डिनर करना रिश्तों की गंभीरता को बयां कर रहा था।
वरुण भारत लौट आए। 20 साल की उम्र में उनकी कविता-संग्रह प्रकाशित हुई। इस संग्रह ने यामिनी का दिल ही लिया। दोनों के रिश्ते के बारे में मां मेनका गांधी को पता चल गया। पर मां ने इसका खुलासा नहीं किया। समय के दबाव में यह रिश्ता छुपाए रखा गया। जब मां को लगा की अब समय आ गया है, इस रिश्ते के बारे में बताने का, तो उन्होंने पूरी दुनिया के सामने इसकी घोषणा कर दी। सात साल पहले शुरू हुआ प्यार आज अपनी मंजिल पर पहुंच गया है। दोनों प्रेमी सात जन्मों के लिए एक-दूजे के हो चुके हैं।

दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार

Monday, January 24, 2011

''मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा''

देश के महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी का सोमवार सुबह 8.05 बजे पुणे के एक अस्पातल में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गडक में हुआ था। इनको बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 1932 में वह गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े।

अगले दो वर्षों तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से संगीत की शिक्षा ली। घर वापसी से पहले वह कलकत्ता और पंजाब भी गए। सन् 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने पंडित रामभन कुंडगोलकर से गडग के पास कुंडगोल में संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने खयाल गायकी की बारीकियां भी सीखीं।

पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया। उनको कई रागों को मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना करने का भी श्रेय जाता है। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल की है।

सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित

भीमसेन जोशी को 4 नवम्बर, 2008 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से पुरस्कृत किया गया। इन्हें भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन् 1985 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। इसके साथ इन्हें पद्म विभूषण और पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

19 साल की आयु में आये सार्वजनिक मंच पर

किराना घराना के जोशी ने 19 वर्ष की आयु में पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से अपनी गायन कला का प्रदर्शन किया था। उनकी अनवरत यात्रा आज समाप्त हुई है। उन्होंने पहली बार अपने गुरु सवाई गंधर्व के 60वें जन्मदिवस पर जनवरी 1946 में पुणे अपना गायन प्रस्तुत किया था।

गीत जो हो गए अमर

जोशी जी द्वारा गाए गए गीत लोगों के बीच समां बांध देते थे। उनके संगीत में गजब का जादू था। उनके द्वारा गाए गए गीत पिया मिलन की आस, जो भजे हरि को सदा और मिले सुर मेरा तुम्हारा संगीत के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं। इस का सम्मोहन आज भी बरकरार है।
दैनिक भास्कर से साभार

'साधु सराहि सुमन सुर बरषे' को कलंकित करते कलयुगी बाबा

धर्म और राजनीति का कॉकटेल तो आदि काल से चला आ रहा है, लेकिन सेक्स के तड़के ने आध्यात्म को दूषित कर दिया है। ऐसे में भरोसा करें तो किस पर? क्यों उठ रहा है आध्यात्मिक चेहरों से विश्वास ? तत्कालिक घटनाओं पर चलिए एक नजर डालते हैं, जिसने देश के कुछ चुनिंदा चमत्कारिक चेहरों को बेनकाब किया है।

वैसे तो साधु शब्द आते ही हृदय भावविह्वल हो उठता है। साधु की व्याख्या करते हुए तुलसीदास ने कहा है कि 'साधु सराहि सुमन सुर बरषे'। साधु बोलता है तब अमृत और फूलों का बरसात होती है। साधु को आध्यात्मिक, निस्वार्थ सेवक और सदाचारी कहा जाता है। शंकराचार्य, स्वामी परमहंस और आदि काल के बह्मर्षी समाज को मार्गदर्शन देते रहे हैं। ऐसे गौरवशाली इतिहास को आज भगवताचार्य राजेंद्र, नित्यानंद, पायलट बाबा, इच्छाधारी बाबा जैसे साधु कलंकित कर रहे हैं। घर्म के नाम पर धंधे की शुरूआत करने वाले ये साधु देह व्यापार तक अपनी पहुंच बना लिए हैं। कुछ ऐसी दुर्भाग्यशाली घटनाओं पर एक नजर...

गिरफ्त में आए भगवतार्य राजेंद्र उर्फ पोर्न स्वामी

हाल ही में वृंदावन पुलिस ने इस बाबा को गिरफ्तार किया है। यह यमुना नदी के घाटों और पवित्र स्थानों के आस-पास पर अश्लील फिल्में शूट करता था। इस स्वामी से कई अश्लील फिल्में और क्लिपिंक्स बरामद की गई हैं। फिल्मों में कुछ विदेशी युवक युवतियां के साथ स्वामी खुद भी अप्राकृतिक यौनाचार करता हुआ दिखा है। यहां तक की इस पोर्न बाबा ने अपनी बीबी की भी अश्लील फिल्में बनाकर बाजार में बेचा है।

भगवताचार्य पर आरोप है कि पैसों के लालच में उसने अपनी पत्नी के साथ के कुछ अंतंरग चित्रों को इंटरनेट पर अपलोड कर दिया और सीडी बना कर बाजार में बेच दिया है। लेकिन जब इन चित्रों और सीडी को लेकर साधु की बीवी को कुछ लोगों ने ब्लैकमेल किया तो उसने साधु के बचाव में ब्लैकमेल करने वाले और एक दुकानदार के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी है।

मामला यह है कि 28 जून को साधू राजेंद्र की पत्नी ने अपना लैपटॉप ठीक करवाने के लिए अरविंद नामक व्यक्ति को दिया था। साधु की पत्नी का आरोप है कि अरविंद और उसके साथियों ने लैपटॉप के साथ छेड़छाड़ की है। और उसके पति के कुछ अंतरंग चित्रों की सीडी बनाकर बाजार में बेच दी है। उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं कि वह उन्हें दस लाख रुपए दे वरना वह इसे समाज में सार्वजनिक कर देंगे।
अरविंद ने इस आरोप से इंकार करते हुए कहा कि, इस तरह की सीडी बाजार में पहले से आ रही थीं। उसने लैपटॉप के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की है। बाजार में इस सीडी का खुलासा होने के बाद से साधू राजेंद्र के खिलाफ मथुरा और वृंदावन के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

स्वामी नित्‍यानंद

नित्‍यानंद अपने सैक्स स्कैंडल के लिए सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। कहा जाता है कि स्‍वामी ‘प्राचीन तांत्रिक रहस्‍यों’ की शिक्षा देने और उनके प्रयोग के लिए अपने आश्रम में आने वाली महिलाओं से ‘सीक्रेट सेक्‍स एग्रीमेंट’ करता था। इसके अनुसार, महिलाओं को नग्‍नता और सेक्‍स के लिए सहमति जतानी होती थी। अपने अश्‍लील फोटो खींचने की अनुमति देनी पड़ती थी। साथ ही उन्‍हें इस बात की सख्‍त हिदायत दी जाती थी कि इस बात को वे आश्रम से बाहर नहीं ले जाएं। उस समय जो सेक्स सीडी बरामद की गई उसमें नित्यानंद, एक लड़की के साथ रंगरलिया मनाते दिखाई दिया था। लड़की को कथित अभिनेत्री रंजीता बताया गया।

बताते चलें कि स्वामी नित्यानंद का असली नाम राजशेखर है। वह तमिलनाडु के थिरुनामलाई के रहने वाले हैं। इसका थिरुनामलाई और बैंगलोर में बहुत बड़ा आश्रम है। इन्ही जगहों में से कहीं पर संत को कैमरे में कैद किया जा रहा था। वीडियो में साड़ी पहने एक महिला दिखती है जिसके साथ बाबा को बाद में आपत्तिजनक हालात में देखा जाता है। नित्‍यानंद पर फिलहाल केस चल रहा है।

भीमानंद उर्फ इच्छाधरी बाबा

भीमानंद, इच्छाधारी बाबा का चोला पहन कर देह व्यापार का धंधा करवाता था। उसके संपर्क में 600 लड़कियां थीं। इनमें से 50 लड़कियां केवल बाबा के लिए ही काम करती थी। लड़कियों के रेट का 40 फीसदी कमीशन बाबा अपने पास रखता था। बाबा ने अलग-अलग लड़कियों के अलग-अलग रेट रख रखे थे। मॉडल के लिए 50 हजार, स्टूडेंट के लिए 20 हजार और हाउसवाइफ के लिए 10 हजार। इन लड़कियों को देश भर में फैले बाबा के एजेंट लाते थे।

भीमानंद के पास से दस सेलफोन और करीब 100 मिली डायरी मिली। इनमें से कई में कॉल गर्ल्स से सम्बन्धित जानकारियों का जिक्र था। बाबा के आलीशान ठिकाने से चांदी के कवर वाली तलवार, बंदूक तथा बारहसिंगा के सींग बरामद किए गए। भीमानंद के परिवार वालों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनके कुख्यात ददुआ डकैत से गहरे ताल्लुकात थे।

भीमानंद के कमाई के कई जरिए थे। भक्ति कार्यक्रम में चढ़ावा तथा देह व्यापार से हासिल रुपये बाबा ने रीयल एस्टेट और ब्याज पर लगा रखे थे। विदेशों से भी चंदे के रूप में उसकी कमाई होती थी।

पायलट बाबा

देशभर में एक रूपये में कंप्यूटर शिक्षा देने का दावा करने वाले पायलट बाबा ने फ्रॉड करके करोड़ो कमाए। बडे़-बडे़ नेताओं ने पायलट बाबा का साथ देकर इसे जोरशोर से प्रसारित किया। इस गोरखधंधे के तहत आईकावा इंटरनेशनल कंप्यूटर कंपनी के साथ करार होने के बाद एक रूपये में कंप्यूटर शिक्षा देने का खेल पूरे देशभर में शुरू किया गया। कंप्यूटर सेंटर की फ्रेंचाइजी खोलने के लिये जमानत राशि के रूप में 50 हजार रूपये जमा कराए।

वहीं, कुंभ नगरी मे हुए हादसे को लेकर भी बाबा के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। इस हादसे में कई बेगुनाहो की जान चली गई। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ गिरफ्तारी हुई। कहा जाता है कि बाबा के ऊंचे पहुंच के कारण ही ऐसा संभव हो पाया है।

दैनिक भास्कर से साभार
http://www.bhaskar.com/article/NAT-saint-sex-cd-and-scandal-1776982.html?HF=

Sunday, January 16, 2011

सेक्स, पॉलिटिक्स और मर्डर मिस्ट्री की पूरी दास्तां...

4 जनवरी 2010 की सुबह। बिहार के पूर्णिया जिले का सिपाही टोला। यहां सदर से भाजपा विधायक राजकिशोर केशरी के घर पर जनता दरबार लगा हुआ था। राजहंस पब्लिक स्कूल की प्राचार्या रूपम पाठक जनता दरबार में आकर बैठ गई। उसने विधायक से अकेले में बात करने की इच्छा जतायी।

विधायक निर्धारित स्थल से हटकर बगल में उससे बातचीत करने लगे। इतने में उसने अपनी शॉल में छुपा चाकू निकाल कर विधायक के पेट पर वार कर दिया। चाकू लगते ही विधायक जमीन पर गिर गये। इस मंजर को देख वहां के लोगों के होश फाख्ता हो गए। जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक केशरी के प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

इस घटना के बाद आक्रोशित लोगों ने रूपम की जमकर पिटाई की। इस पिटाई में घायल उसे कटिहार मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उसकी स्थिति नाजुक बनी रही। कई बार तो उसके मरने की खबर भी उड़ी। होश में आने के बाद रूपम ने कहा कि उसने जो किया है, वो सही किया है। उसे पछतावा नहीं है। पर वह अब जीना नहीं चाहती है। उसे भी मार दिया जाय। पुलिस ने रुपम को गिरफ्तार कर लिया। उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत मिली है।

रूपम चीख-चीख कर कह रही थी कि विधायक उसका रेप करता रहा है। केवल वह ही नहीं उसके गुर्गे ने भी उसका रेप किया है। इनका मन उससे नहीं भरा तो अब उसकी 17 साल की बेटी की मांग कर रहे थे। उसकी बेटी का भी रेप करना चाहते थे। जब रूपम ने मना किया, तो उसे फोन पर धमकियां देने लगे। परिवार को सारी बात बता देने का डर दिखा कर स्कूल में जाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया करते थे। पर जब बात बेटी पर आ गई तो मां ने चंडी का रूप धारण कर लिया।

यह घटना पूरे देश में आग की तरह फैल गई। चूंकि मामला सियासत से जुड़ा था, इसलिए राजनीति होनी तय थी। इस घटना के तुरंत बाद सूब के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने विधायक पर रेप का आरोप लगाने वाली रुपम को ब्लैकमेलर कहा। उन्होंने कहा कि उसने पूर्णिया के एक अंग्रेजी अखबार लिंक एक्सप्रेस में खबर प्रकाशित करवा कर और इसके आधार पर 2007 की तथाकथित घटना के तीन साल बाद विधायक पर यौन शोषण का झूठा आरोप लगाया। फिर 14 जून 2010 को रुपम ने शपथपत्र दायर कर कहा कि किसी के बहकावे में आ कर उसने विधायक श्री केशरी के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज किया है। विधायक और उसके पीए विपिन राय से उसका किसी तरह का विवाद नहीं है।

मोदी के बयान के बाद पूरा बिहार रूपम के पक्ष मे आ गया। मोदी के इस्तीफे की मांग की जाने लगी। महिला संगठन लामबंद हो गई। सभी ने एक सुर में सीबीआई जांच की मांग की। आखिरकार मामले की गंभीरता और लोगों की मांग को देखकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीबीआई जांच की केंद्र से अनुशंसा कर दी। अब सीबीआई इस केस की जांच करेगी।
मामले का फ्लैश बैक

इस मर्डर और रेप केस की मिस्ट्री समझने के लिए फ्लैश बैक में चलते हैं। रूपम पाठक पूर्णिया में राजहंस पब्लिक स्कूल चलाती हैं। स्कूल के एक वार्षिकोत्सव में विधायक केशरी मुख्यअतिथि बनकर आये। यहां आने और रूपम से बातचीत करने के बाद केशरी की नीयत खराब हो गई। 18 अप्रैल 2007 को रूपम प्रोग्राम की फोटो देने के लिए विधायक के घर गई। वहां उनके साथ जबरन दुष्कर्म किया गया। बाद में उसके पीए विपिन ने रूपम का उसके ही विद्यालय के क्लास में रेप किया। इसके बाद विपिन उसे परिवार वालों को बता देने की धमकी दे कर यौन शोषण करता रहा।

रूपम के साथ विधायक का मन भर गया था। रूपम की 17 साल की बेटी पर उसकी नजर लग गई थी। कुछ दिन पहले ही विधायक ने अपनी ईच्छा जाहिर की थी। रूपम नाराज हो गई। विधायक को सख्त लहजे में मना किया। केशरी मानने वाला कहां था, इस जबरन कोशिश से रूपम नाराज हो गईं।

उसने 28 मई 2010 को यौन शोषण का मामला दर्ज कराया। पुलिस ने कांड संख्या 182/10 में विधायक राज किशोर केसरी एवं उनके एक सहयोगी विपिन राय को आरोपी बनाया था। इस घटना ने बिहार और पूर्णिया की राजनीति में हलचल मचा दी। मामले को सलटाने के लिए दोनों पक्षों के बीच सुलह कराई गई। उस समय मामला शांत हो गया। रूपम ने केस वापस ले लिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर की रात विधायक अपने गुर्गों के साथ न्यू ईयर की पार्टी मना रहा था। वह रूपम के घर पहुंच कर उससे जबर्दस्ती करने लगे। इस घटना से रूपम आपे से बाहर हो गई। बात अब बेटी की भी आन पर आ गई थी। उसने विधायक को सबक सिखाने की सोची। वह एक जनवरी को ही विधायक जी के आवास पर पहुंचीं, पर भारी भीड़ के कारण मौका नहीं मिल पाया। वह वापस लौट आईं। पर 4 जनवरी के सुबह 9.30 को उसे मौका मिल गया। और उसने विधायक का चाकू घोपकर मर्डर कर दिया।

मर्डर के बाद रूपम का परिवार

इस मर्डर के बाद रूपम के घर की स्थिति दयनीय हो गई है। पुलिस और प्रशासन के प्रेशर के कारण रूपम का परिवार भटक रहा है। सूत्रों की माने तो उसके घर पर पुलिस ने कब्जा कर रखा है। स्कूल में ताला जड़ दिया गया है। रूपम की मां को प्रताड़ित किया जा रहा है। इस भयंकर ठंड में एक वृद्ध भटकने के लिए मजबूर है। वह चाह कर भी अपनी बेटी से नहीं मिल पा रही है। उसे अपनी बेटी के किए पर पछतावा नहीं है। मां कहती है कि यदि विपिन मेरे सामने आ जाए तो उसका खून पी जाएंगी। विधायक और उसके गुर्गों ने उनकी बेटी का जीवन नरक बना दिया था।
मर्डर के बाद विधायक राजकिशोर केशरी का परिवार

लोगों की माने विधायक को तो अपने किए की सजा मिल चुकी है। पर उनका परिवार तड़प रहा है। वह अपने पीछे भरे-पूरे परिवार के साथ पत्नी और बेटा छोड़ गए हैं। जहां पहले हमेशा चहल-पहल रहा करती थी। जनता का दरबार लगा करता था। विधायक फैसले सुनाया करते थे। आज वहां अगर कुछ है तो सिर्फ सन्नाटा। हर ओर मातम और मायूसी। कोई किसी से बात तक करने की स्थिति में नहीं। जहां लोगों का मेला लगा करता था, आज वहां मातम है। यहां ऐसी स्थिति हो जाएगी, इसकी तो किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। पर, होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। विधायक राजकिशोर केशरी के मधुबनी टोला स्थित घर पर ख़ामोशी है। परिजन और परिचित आ जरुर रहे हैं, लेकिन मुंह पर चुप्पी साधे। घर के परिसर में श्राद्ध के लिए पंडाल लगभग बन कर तैयार हो गया है। वहीं पर एक टेबल पर विधायक की तस्वीर लगी है, जिस पर फूलों का माला लटका हुआ है।
दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार

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