Pillar of True Journalism to save Public Domain

Sunday, March 18, 2012

एक IPS अफसर की दिल झकझोर देने वाली दास्तां


''यार, यहां बहुत बेगार करवाते हैं। कोई सेल्फ रिस्पेक्ट ही नहीं है। इलेक्शन के खर्चों का टारगेट अभी से दे दिया है। क्या इसलिए इतनी पढ़ाई करके आईपीएस बना था? ये लोग वर्दी वालों से ही उगाही करवा रहे हैं। अब नौकरी छोड़ दूंगा।''


खुदकुशी से ठीक पहले बिलासपुर (छत्‍तीसगढ़) के एसपी राहुल शर्मा ने अपना यह दुख अपने दोस्त के साथ साझा किया था। राहुल और उनके दोस्त हरिमोहन थकुरिया जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में साथ में पढ़े थे। हरिमोहन के मुताबिक, सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर उन्होंने राहुल से पांच मार्च को बात की थी।

इस घटना के कुछ दिन पहले ही आईपीएस नरेंद्र कुमार को खनन माफिया ने ट्रैक्टर से रौंद कर मार डाला था। वह खनन पर अंकुश लगाने के लिए अभियान चला रहे थे। इसी बीच उनके साथ यह खौफनाक खूनी खेल गया था।

अब सवाल यह उठता है कि क्या ईमानदार अधिकारियों का यही हाल होता है। उन्हें या तो मौत के घाट उतार दिया जाता या फिर इस व्यवस्था से तंग आकर वे खुद मौत को गले लगा लेते हैं। अधिकांश मां-बाप अपने बेटे-बेटी को आईपीएस या आईएएस बनाना चाहते हैं। तैयारी में उनकी आधी उम्र निकल जाती है। सलेक्शन के बाद पोस्टिंग के लिए जुगाड़ लगाना पड़ता है।

उसके बाद यदि ऐसा हश्र हो तो दिल फटने लगता है। सपने टूट जाते हैं। दुनिया से मोह खत्म हो जाता है। और उसकी परिणति कुछ ऐसी ही होती है।


Sunday, March 4, 2012

यूपी चुनाव: रिजल्ट से पहले सियासी बिसात पर गठजोड़ का गणित!


यूपी में चुनाव परिणाम आने से पहले ही सियासी गलियारों में जोड़-तोड़ का गणित शुरू हो चुका है। चुनाव से पहले तक खुद के दम पर सरकार बनाने का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ में लगी हुई हैं। राजनीतिक पंडितों की मानें तो सपा चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे मजबूत स्थिति में रहेगी। ऐसी में सपा की सियासी चाल सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


चुनाव परिणाम छह मार्च को घोषित हो जाएंगे। अब तक के अनुमान के आधार पर यह लग रहा है कि कोई भी पार्टी बहुमत में नहीं आने वाली है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ कर सकती हैं। नए समीकरण के मुताबिक कांग्रेस के प्रति सपा का झुकाव बढ़ा है। रालोद के युवा चेहरे और अजित सिंह के उत्तराधिकारी जयंत के सपा के समर्थन में दिए बयान से साफ जाहिर हो रहा है कि सपा और कांग्रेस को एक करने में रालोद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


हालांकि सपा, कांग्रेस और रालोद के समीकरण में राहुल और सोनिया के साथ केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का अड़ियल रुख अड़ंगा डाल सकता है।बेनी ने कहा है कि यूपी में एसपी से हजार गुना बेहतर बीएसपी है। कांग्रेस को नतीजों के बाद बीएसपी से गठबंधन करना चाहिए। वैसे इस बयान से एक नया समीकरण भी बनता हुआ दिख रहा है। वह यह कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस, बीएसपी से भी हाथ मिला सकती है।


बीजेपी से हाथ मिलाएंगी मायावती?


दूसरा सबसे बड़ा समीकरण बीएसपी और बीजेपी के साथ बनता हुआ दिख रहा है। वैसे अभी तक दोनों ही पार्टियों ने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया है, जिसके आधार पर उनके बीच किसी तरह के गठजोड़ की बात पुख्ता तौर पर कही जा सके। पर दोनों ने इस बारें में कोई नकारात्मक बयान भी नहीं दिया है।


सूत्रों के हवाले से मिली खबर के मुताबिक, बीएसपी सरकार के एक बड़े अधिकारी ने बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के साथ मुलाकात की है। इतिहास पर भी नजर डाला जाए तो दोनों पार्टियों के बीच गठजोड़ की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।


यूपी की राजनीति पूरे देश की राजनीतिक दिशा और दशा तय करती है। सन् 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय पार्टियां खास करके कांग्रेस और बीजेपी ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएंगे जिससे लोकसभा का चुनाव प्रभावित हो। इसमें सपा, बसपा और रालोद जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का सत्ता मोह जरूर प्रभावित होगा और प्रभाव डालेगा। सही मायने में छह मार्च के बाद ही तस्वीर साफ हो पाएगी।

Saturday, December 24, 2011

बज गई रणभेरी, चढ़ गई त्योरियां


बज गई चुनावी रणभेरी
चढ़ गईं उनकी त्योरियां...


नाचने लगी उनकी आंखें
बजने लगे उनके गाल...


बढ़ गई गरीबों की पूछ
आम आदमी हुआ खास...


बहुर गए इनके दिन
झोपड़ी में दिखे राजकुमार...


खड़ंजें पर चली सैंडिल
पगडंडियों पर दौड़ी साइकिल...


कीचड़ में खिला कमल
हाथ का मिला साथ


पर अफसोस...


फिर छा जाएगी मायूसी
फिर सूनी हो जाएगी झोपड़ी


फिर उखड़ जाएंगे खड़ंजें
छूट जाएगा हाथ का साथ


फिर आम आदमी रह जाएगा 'आम'
खास यूं ही बना रहेगा खास


(जैसा कि अभी तक का अनुभव रहा है)

Friday, December 16, 2011

औकात


रमेश शापिंग कर रहा था। अचानक उसकी नजर एक महिला से टकराई। दोनों ठिठक गए। वह मोना थी। रमेश को देखते ही वह बोली, 'ओह माई गॉड, रमेश तुम? कैसे हो? इट्स सरप्राइज फॉर मी। इनसे मिलो, ये मेरे हसबैंड सोहन हैं। बहुत बड़ी कंपनी में काम करते हैं।' मोना बोलती जा रही थी, रमेश उसकी बातें गौर से सुन रहा था। इस बीच हैरान सोहन पत्नी की बात बीच में ही काटते हुए बोल पड़ा।

सोहन बोला, 'सर...आप...यहां? कोई जरूरत थी तो बता दिया होता, किसी को भी भेज कर सामान मंगवा देता। अब आपको इतनी जहमत उठाने की क्या आवश्यकता थी।' अपनी पत्नी की तरफ तुरंत मुड़ते ही सोहन उत्साहित होकर बोला, 'मोना, ये मेरे बॉस हैं। पांच हजार करोड़ सालाना टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक होते हुए भी सर बहुत सरल, सभ्य और सुशील हैं। इनके पास सबकुछ है। खुशियां कदम चूम रही हैं। पर पता नहीं क्यूं अभी तक शादी नहीं की।' रमेश बुत बना सब सुन रहा था। मोना की आंखें चौड़ी हो गईं। उसकी जबान हलक में अटक गई। आंखें खुलीं थी पर सामने दृश्य 10 साल पुराना था।

उस दिन कॉलेज का पहला दिन था। वह क्लास में अकेली बैठी थी। इतने में एक सीधा-साधा शर्मीला लड़का क्लास में आकर आगे की सीट पर बैठ गया। मोना ने तुरंत पूछा कि, 'इसी कोर्स में दाखिला लिया है तुमने? कहां से आए हो?' अचानक हुए सवालों के बौछार से रमेश सकपका गया। लड़की से इस तरह बातें करनी की उसे शायद आदत नहीं थी। फिर भी हिम्मत जुटाकर आंखे नीचे किए बोला, 'हां मैनें इसी कोर्स में दाखिला लिय़ा है। कानपुर से आया हूं। आप कहां से आई हैं?' मोना तपाक से बोली, 'यहीं फरीदाबाद से हूं। रहने वाली तो साउथ इंडिया की हूं, लेकिन यहां पापा जॉब करते हैं न इसलिए।'

इसी बीच दूसरे लड़के-लड़कियां भी आ गए। सबका इंट्रोडक्शन हुआ। उसके बाद हर कोई अपने पसंद के लड़के-लड़की के साथ बातें करने लगा। रमेश अकेला था। उससे कई लोगों ने बात करने की कोशिश लेकिन पता नहीं क्यूं वह खोया-खोया सा रहा।

इधर बुत बने रमेश की आंखों में भी वो दृश्य तैरने लगे। उसे याद आ रहा था कि छोटे शहर से निकल कर तब वह नया-नया दिल्ली आया था। उसका हाल कुछ उस मछली की तरह था, जिसे तलाब से निकालकर समंदर में डाल दिया गया हो। आंखों में एक बड़े सपने को संजोए। मां-बाप के नाम को और ऊंचा करने की शपथ लिए उसने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। कॉलेज का पहला दिन था। कैम्पस में सीनियर्स की रैगिंग से बचते-बचाते किसी तरह से क्लास में पहुंचा। उस समय तक केवल एक लड़की क्लास में मौजूद थी। मोना...उस लड़की से पहली मुलाकात से उसका दिल धड़क गया था।

मोना से बातचीत में पहला दिन तो जैसे पल में ही बीत गया। फिर तो सुबह उससे फिर मुलाकात हो। कुछ बात हो। बात ही बात में कोई बात बन जाए। ऐसे ख्याली पुलाव बनना तो रोज की बात हो गई। लेक्चर के समय मौका निकाल कर मोना को निहरता रहता था। छुट्टी का दिन तो जैसे काल बन गया था। बस एक ही काम, जब तक वो कॉलेज में है कभी पास तो कभी दूर से निहारना, बस निहारना।

पर कहते हैं न कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता। खासकर दोस्तों के बीच। हो गई मीठी नोक-झोंक शुरू। कभी कोई छेड़ता तो कभी कोई कहता, 'ओए होए क्या बात है। जनाब, मोना को बता दूं क्या? छुप कर उसे बहुत निहारते रहते हो।'

रमेश की तो जैसे जान ही निकल जाती। कभी-कभी मोना से हाय-हैलो कर लेता। जिस दिन नजरें टकरा जातीं और बात हो जाती तो माशाअल्लाह रात आंखों ही आंखों में ही कट जाती। सपनों के पंखों पर सवार होकर ख्वाब उड़ान भरने लगते। कभी-कभार बात करने वाला रमेश अब सेंटिमेंटल मैसेज भेजने लगा। मोना को भी दोस्तों की बातों पर यकीन होने लगा। फिर क्या? प्रेम की पंखुडियां पनपें नहीं इसलिए कन्नी काटने लगी। मोना के इस बदले बर्ताव से दुख हुआ। आहत रमेश का दिल उसके कन्नी काटने से और बेचैन हो गया। दोस्त भी रमेश को बार-बार जोर दे रहे थे। जो दिल में है वो बोल डाल।

दरअसल छोटे शहर के लड़कों के साथ यही समस्या होती है। बचपन मां-बाप के दबाव के कारण पढ़ने और रटने में गुजर जाता है। लड़के-लड़कियां बिगड़ें नहीं इसलिए अलग-अलग स्कूल कॉलेज होते हैं। जैसे रामाबाई कन्या विद्यालय यानी यहां सिर्फ लड़कियां पढ़ेंगी, महात्मा गांधी इंटर कॉलेज यानी यहां सिर्फ लड़के पढ़ेंगे। ऐसे माहौल से जब कोई लड़का पहली पहल दिल्ली जैसी जगह पर आ जाए, और उपर से बाबूजी की छत्रछाया ना हो तो ऐसा होना स्वभाविक ही है।

खैर, अगले दिन कॉलेज का फेस्ट था। मौका भी था, दस्तूर भी। सो, उस दिन प्रपोज करने की योजना बन ही गई। फेस्ट में सबने खूब एंजॉय किया। इस दौरान रमेश ने कई बार प्रपोज करने की हिम्मत जुटाई। पर असफल रहा। आखिरकार जब वह घर जाने के लिए चली तो उसके पीछे हो लिया। रास्ते में सही जगह देख कर उसने उसे आवाज दी। रमेश को पीछे आता देख वह आवाक रह गई।

कांपती हुई आवाज में रमेश बोला, 'हॉय कैसी हैं। वो मैं आपसे दोस्ती करना चाहता था।' वह बोली, 'ओके, हम दोस्त तो पहले से ही हैं।' रमेश बोला कि, 'अरे नहीं...वो अलग वाली दोस्ती करना चाहता हूं।' पहले से ही माजरा समझ रही मोना गुस्से से बोली, 'व्ह्वाट? क्या बात करते हो? देखो, तुमसे हंस कर कभी कभार बात कर लेती हूं, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरे काबिल हो। तुम्हारे महीने भर का पॉकेट खर्च, मैं रोज अपने दोस्तों पर लूटा देती हूं। ऐसी फिजूल की बातें कभी सोचना भी मत। अपनी औकात तो देखी होती।'

इतना कहकर वह तेज कदमों से चली गई। उसका यह जवाब सुन कर रमेश को गहरा धक्का लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। सिर पर हाथ रखे वह सड़क किनारे ही बैठ गया। पता नहीं कितना समय गुजर गया। बाद में खोया-खोया सा रमेश हॉस्टल वापस आया। रात भर सोचता रहा। फिर उसने तय किया अब सिर्फ अमीर बनना है।

उतना अमीर जितना प्यार को पाने के लिए जरूरी है। उतनी दौलत कमाना है जितनी मोना के सपनों को पूरी कर सके। इतना पैसा जुटाना है जितनी से उसकी औकात मोना की खुशियों को संजोने के लिए काफी हो सके। उसी जद्दोजहद में गुजर गए कई बरस। सपना तो पूरा हुआ लेकिन मोना खो गई। आज मिली भी तो किन हालात में।

सीयू, बॉय सर, सोहन कह रहा था। बॉय, रमेश की तंद्रा टूटी। नजर सामने गई तो देखा कि मोना अवाक सी रमेश को देखते हुए सोहन के साथ पॉर्किंग की तरफ बढ़ रही थी। औकात...औकात.....मोना शर्म से सिर भी नहीं उठा पा रही थी।

उस भीड़ में चमकते चेहरे दिखाई दे रहे थे। चहकते जोड़े बाजू से गुजर रहे थे। किसी को खबर भी नहीं हुई और चमचमाती लाइटों के बीच एक सपना दरक गया। रमेश की आंखों से दर्द बह रहा था। पाने और पाकर खोने का दर्द। सच्ची मोहब्बत शायद बलिदान की मोहताज होती है....हमेशा से।

Sunday, November 27, 2011

ऐसे ही बचते रहे 'युवराज' तो बची हुई सीटें ही आएंगी 'हाथ'!

गरीबों के मसीहा। मजलूमों के मददगार। आम के साथ इनका 'हाथ'। भ्रष्टाचार और अत्याचार देख तमतमाया हुआ एंग्री यंगमैन। कुछ इसी अंदाज में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब पूर्वांचल की यात्रा पर निकले तो लगा कि कांग्रेस की काया पलट हो जाएगी। आम आदमी की सहानुभूति मिलेगी। पर यह क्या आम आदमी की बात करने वाले राहुल ने अपनी पूरी यात्रा के दौरान एक बार भी उनकी बात नहीं की। उनसे जुड़े मुद्दों की बात नहीं की। उनसे बात नहीं की। 

राहुल ने बात की तो राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की। सपा, बसपा और भाजपा की। उनकी कमियों की। एक बार भी आम आदमी के दुखों की बात नहीं की, बल्कि उनकी दुखती रग पर प्रहार किया। राहुल ने जब भी गरीबों का गाल सहला कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की, तब मंहगाई और मुश्किलों का तमाचा पड़ा। गरीबों की तरफदारी करने वाला मंहगाई पर मौन रहा।

ऐसे ही देंगे जवाब?

राहुल जब यात्रा पर निकलने वाले थे तो पूरा यूपी 'जवाब हम देंगे' की होर्डिंग से पटा पड़ा था। राहुल ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि आपकी परेशानियों पर जवाब हम देंगे। यहां तो लोगों को जवाब देना तो दूर अपने कार्यकर्ताओं तक को जवाब नहीं दिया गया। राहुल ने कहा कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की रीढ़ तोड़ देने वाला यूपी अब दूसरे राज्यों की ओर देख रहा है। परप्रांत में जाकर विकास में अपनी मेहनत मजदूरी से योगदान दे रहा है। बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता। पर खुद ही राहुल और उनके दिग्गज साथी महंगाई जैसे मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए थे। जब खुद के कार्यकर्ताओं ने मंहगाई का मुद्दा उठाया तो खामोशी की चादर ओढ़ ली। सिद्धार्थनगर में गांव के लोगों ने रोका तो राहुल मुस्कराते हुए गाड़ी से उतरे। वहीं एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा कि ‘महंगाई को लेकर बहुत किरकिरी हो रही है, कुछ कीजिए। वर्ना जनता जीने नहीं देगी।’ इस मुस्कराते हुए राहुल मौन रहे। कोइ प्रतिक्रिया नही दी। 

बांसी रैली के भीड़ से आवाज आई ‘सांसदों के लिए संसद में एक रुपए की चाय, डेढ़ रुपए में दाल, एक रुपए में रोटी मिलती है। जबकि हम लोगों को इतने पैसे में सिर्फ रोटी मिलती है। ऐसी महंगाई क्यों।’ राहुल ने अनसुना कर दिया। सभा स्थल पर एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने माला से स्वागत करने के साथ उन्हे एक पत्र थमाया। इस पत्र में महंगाई के मुद्दे पर बोलने का आग्राह था। यहां भी राहुल ने इस मुद्दे को नजर अंदाज कर दिया। दरअसल, महंगाई और उसके बाद एफडीआई संबंधित केन्द्र सरकार के फैसले ने राहुल गांधी के यूपी दौरे के दौरान बन रहे माहौल को बिगाड़ दिया। राहुल गांधी गरीबों के सबसे बड़े पैरोकार बन कर उभर रहे थे। केन्द्र के निर्णय ने विपक्ष को केन्द्र सरकार और कांग्रेस को घेरने का मंहगाई के साथ नया मुद्दा दे दिया। 

रहे थे ललकार, निकल गई खुद की हवा

इधर राहुल गांधी विपक्ष को ललकार रहे थे तो उधर विपक्ष इनकी यात्रा की हवा निकालने में जुटा हुआ था। राहुल की चुटकी लेते हुए भाजपा नेता उमा भारती ने कहा कि राहुल गांधी को बहुत गुस्सा आता है तो अब मुझे भी गुस्सा आ रहा है। गुस्सा इतना कि वालमॉर्ट का एक भी स्टोर खुला तो आग लगा दूंगी।

मायावती ने कहा कि वह विदेशी कंपनियां यूपी में नहीं खुलने देंगी। राहुल के विदेशी दोस्तों को फायदा पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने रीटेल कारोबार में एफडीआई की अनुमति दी है। इससे छोटे व्यापारियों और किसानों को तो नुकसान होगा। महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी।

पूर्वांचल के दौरे पर थे पर ज्वलंत समस्याओं पर चुप्पी साधे रहे। गोरखपुर जिले में स्थित बन्द पडा खाद कारखाना, दिमागी बुखार की भयावहता, बन्द सुगर मिल, गन्ना किसानों की बदहाली आदि मुद्दों का जिक्र तक नहीं किया। दिमागी बुखार से प्रतिदिन मौतें हो रही है इससे विकलांग हुए लोगों की अलग समस्या है। बाबा राघवदास मेडिकल कालेज संसाधनों की मार झेल रहा है, राष्ट्रीय राजमार्ग की बुरी हालत है। प्रदेश का विभाजन हो रहा है। पर इन तमाम मुद्दों पर राहुल की खामोशी ने पूर्वांचल के लोगों को मायूस किया है। यही कारण था जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा।


ऐसे ही बचते रहे, तो बची हुई सीटें आएंगी 'हाथ'


राजनीति में एक-दूसरे पर छींटाकशी आम बात है, लेकिन सिद्धांतों को तिलांजली दे देना यह साबित करता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं। हर राजनेता और राजनीतिक पार्टी कोरी राजनीति करते हैं। किसी को न तो आम आदमी की फिक्र है ना किसी को विकास, महंगाई और बेरोजगारी जैसी भयंकर समस्याओं से मतलब। एक एक करके हर किसी के चेहरे से मुखौटा उतर जाता है। वही हाल राहुल का है। 

राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी का चेहरा बनकर विधान सभा के मैदान में उतरे हैं। राज्य में सरकार बनाने पार्टी ख्वाब देख रही है। पर जिनके कंधों पर कांग्रेस के उद्धार का भार है, वही नाजुक मुद्दे पर बोलने से इस कदर बचता रहा है। यदि राहुल ऐसे ही बचते रहे, तो इनके हिस्से बची बचाईं सीटें ही हाथ आने वाली हैं। अपने राजनीतिक सलाहकारों की वजह से वह एक बार बिहार चुनाव खो चुके हैं। अब यूपी की बारी है। उसके बाद केंद्र भी हाथ से निकलता दिख रहा है। राहुल का तो कुछ नहीं होगा, लेकिन दिग्गी राजा की गर्दन कटनी तय है। 

Friday, November 25, 2011

थप्पड़...ना 'ये' भगत सिंह की 'क्रांति' है, ना 'वो' बापू की 'गांधीगीरी'!


‘वह भ्रष्ट है। मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्फ भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो।....पागल हूं मैं.....। इनके पास घोटाले के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।’


यह कहते हुए ट्रांसपोर्ट व्यवसायी हरविंदर सिंह ने एनडीएमसी सेंटर में आयोजित समारोह में भाग लेने के बाद लौट रहे 71 वर्षीय शरद पवार पर हमला बोल दिया। अचानक हुए वार से वे बच नहीं सके। संतुलन भी खो बैठे। जैसे-तैसे संभले और रवाना हो गए।


इस थप्पड़ से पूरा देश गूंज उठा। हर तरफ इसकी चर्चा होने लगी। जहां नेताओं इसकी जमकर भर्त्सना की, वहीं कुछ लोगों ने हरविंदर की सराहना की। एक संगठन ने तो 11 हजार का इनाम तक घोषित कर दिया।


पवार पर हुए हमले की जानकारी जब अन्ना हजारे को मिली तो उनके मुंह से निकला-‘उन्हें थप्पड़ पड़ा! सिर्फ एक?’ लेकिन इसके थोड़ी देर बाद वे बयान से पलट गए। उन्होंने संयत शब्दों का इस्तेमाल किया। वे बोले, ‘वह बहुत गुस्से में होगा। यह ठीक नहीं है। अन्ना ने बयान को बदल कर स्थिति संभाल ली। उनके पहले बयान से साफ झलक रहा था कि वो यही कह रहे थे कि एक ही थप्पड़ क्यों मारा। इससे पहले भी अन्ना ने कहा था कि शराबियों को बांध कर मारो। क्या ये गांधीगिरी है या आधुनिक अन्नागिरी।


अब सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे लोग जरूरत से ज्यादा प्रचार पाने में सफल रहते हैं। इनके मन में कानून का कोई डर नहीं है? यदि जरा भी डर होता तो हरविंदर सिंह थप्पड़ ना मारता। और शरद पवार के समर्थक दंगा नहीं करते। लोग यह कह रहे हैं कि ये घटना भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आम जनता के गुस्से का नतीजा है। ऐसा कहकर गलत दिशा में जा रहे हैं। इसे सनक और सुरक्षा में कमी मानना चाहिए। पर हां, आम आदमी के मन में भ्रष्टाचार और महंगाई प्रति रोष को भी नकारा नहीं जा सकता।


आम आदमी बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार पर अंकुश न लग पाने से परेशान है। उसमें भी विरोध जताने का ये कैसा तरीका कि आप किसी पर जूते-चप्पल फेंके, उसे थप्पड़ मारे। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश पर चले नफरत के जूते का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह आज केंद्रीय मंत्री शरद पवार पर गुस्से के थप्पड़ पर आ गया।


भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में कभी नेताओं को जूता तो कभी थप्पड़ जड़ा गया है। एक इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर 2008 में जूता फेंका था। इसके अलावा, गृहमंत्री पी चिदंबरम, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और चीनी राष्ट्रपति वेन जियाबाओ पर भी जूते फेंके जा चुके हैं।


मानता हूं कि हमारी सरकार बहरी है। उसे कम सुनाई देता है। इसका मतलब ये नहीं कि उसके कानों तले बम विस्फोट किया जाय। हिंसा किया जाय। जरा याद करें बापू को उन्होंने कब हिंसा की। पर सैकड़ों सालों से राज कर रहे अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिया। उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया।


भगत सिंह बनने वालों, क्या उनके विचारों को पढ़ा है। जिसने पढ़ा भी है तो उसे अपने अनुसार समझा है। यदि हम इस तरह की घटनाओं का सपोर्ट करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी युवा पीढ़ी हिंसक हो जाएगी। और ऐसे समय में यदि गलती से भी उनका रास्ता भटक गया, तो समूची सृष्टी पर संकट आ जाएगा।

Monday, November 21, 2011

हम जाहिल हैं, आरोप अच्छा है: आशुतोष

मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है। वह अपनी भूमिका ठीक से निभाएगा तभी सरकारों और नेताओं को तकलीफ होगी। नेताओं को तकलीफ होगी तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा। वरना नेता तो चाहते हैं कि लोकतंत्र सोता रहे। 


नया-नया जर्नलिज्म में आया था। अयोध्या का आंदोलन उफान पर था। बनारस में दंगे हुए थे। मुझे कवर करने के लिए भेजा गया था। वहां कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत हो रही थी। वे कह रहे थे कि पत्रकारिता की नई गंगा अब बनारस से निकलेगी। दंगों के दौरान की रिपोर्टिंग देख मैं पहले से ही सदमे में था। सब के सब उग्र हिंदूवादी रंग मे रंगे थे। 

रिपोर्ट के नाम पर अफवाहें खबर बन रही थीं। दिल्ली से जाने के बाद उन खबरों की पुष्टि मैंने कई बार करने की कोशिश की। हर बार प्रशासन ने कहा, तथ्यहीन। नामी-गिरामी अखबारों की खबर एक खास समुदाय को टारगेट करके, उनको विलेन बताने के मकसद से लिखी जाती थी। लौटकर मैंने एक छोटा-सा बॉक्स बनाया था, जिस पर एक अखबार के मालिक इतने नाराज हो उठे कि मेरी शिकायत संपादक से कर दी। संपादक जी की कृपा से मैं बच गया। 

अयोध्या विवाद खत्म होते-होते मैं टीवी में आ गया। पहले सिर्फ दूरदर्शन था, सरकार का प्रेस रिलीज विभाग। निजी प्रोड्यूसरों ने खबरों को नया तेवर दिया। देखते-देखते दूरदर्शन के ये बुलेटिन फिनामिना बन गए। बुलेटिन से निकल कर टीवी चैनल में तब्दील हो गया। 2004 तक सब ठीक-ठाक चला। अचानक नंबर एक बनने की दौड़ शुरू हो गई और नई तरह की खबरों को परोसने का सिलसिला भी। सबसे पहले एमएमएस का बाजार गरम हुआ था। 

हर चैनल पर एमएमएस की खबरें ही दिखने लगीं। अपराध जगत की खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने का अंदाज भी इस दौर में ईजाद किया गया। नाट्य रूपांतरण होने लगे। मुझे याद है इस बीच एक वीडियो क्लिप करीना और शाहिद कपूर का कहीं सेलफोन वाले के हाथ लग गया था। ‘लिप टू लिप किस’ एक चैनल पर चला तो दूसरे भी कहां पीछे रहते। न तस्वीर को धुंधला किया गया और न पहचान छिपाने की कोशिश। न्यूजरूम में पहली बार विरोध के स्वर संपादकों को सुनने पड़े। असल रिपोर्टर दंग थे। नकल रिपोर्टर मस्त। 

किसी चैनल पर चला कि फलां आदमी शाम चार बजे मरने वाला है। ओबी वैन दौडऩे लगीं। बेशर्म होकर पत्रकारों ने दिन भर उस शख्स पर लाइव किया। किसी ने एक और खबर निकाल ली। एक शख्स यमराज से मिल कर आया था। उसका लाइव भी खूब हुआ। इस बीच पुनर्जन्म की भी लॉटरी निकल आई। स्टूडियो में ऐसे गेस्ट लाने के लिए चैनलों के बीच मारपीट होने लगी। मंदिर का रहस्य सफलता की गांरटी हो गया। 

नंबर वन की रेस और तेज हुई तो सांप-बिच्छू और भूत-प्रेत ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, आडवाणी की जगह ले ली। एलियन भी टीवी पर छाने लगे। नंबर वन की इस रेस में जब कुछ चैनल कामयाब हुए तो बाकी चैनलों ने भी यही आसान रास्ता पकड़ लिया। अब न्यूजरूम में हर शख्स खबरों की जगह टीआरपी की जुगाड़ में लग गया। एडिट मीटिंग्स में खबरों की जगह आधे घंटे के प्रोग्राम की बात होने लगी। रिपोर्टर की जगह स्ट्रिंगरों ने ले ली। चैनल अब एडिटर के हाथ से निकल कर असिस्टेंट प्रोड्यूसर के हाथ में चला गया। 

शायद ही कोई चैनल हो, जिसने ये रास्ता न पकड़ा हो या किसी न किसी रूप में इस रास्ते पर चलने की कोशिश न की हो। कुछ कामयाब थे और कुछ नाकामयाब। कोशिश सभी ने की थी। इन दिनों मंै अक्सर बनारस के उन दिनों को याद कर लिया करता था। खबरों की बलि तब भी चढ़ी थी। उस वक्त भी खबरों की जगह कहानी-किस्सों ने ली थी और इस दौर में भी। तब विचारधारा की आड़ में, इस दौर में टीआरपी की आड़ में बिसात बिछाई गई। 

ऐसा नहीं था कि उस दौर में अच्छे अखबार और अच्छे पत्रकार नहीं थे। इस दौर में भी अच्छे चैनल और अच्छे पत्रकार थे। इस दौर में भी टीवी ने कुछ बहुत अच्छे काम किए थे। दहेज हत्या, स्त्री उत्पीडऩ, भ्रूण हत्या के खिलाफ जबरदस्त कैंपेन, सांप्रदायिकता का तगड़ा विरोध। दंगों को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं हुई। टीवी ने आम आदमी को बात कहने का एक मजबूत प्लेटफार्म दिया। घूस और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े स्टिंग ऑपरेशन किए गए। पहली बार मैंने कैमरे को देख कर पुलिस और नौकरशाहों को कांपते देखा। 

देश के एक कोने के त्योहार को देश के दूसरे कोने तक पहुंचाने का काम भी टीवी ने किया। गुजरात का गरबा बिहार पहुंच गया और बिहार का छठ महाराष्ट्र। दही-हांड़ी की तस्वीरें पूरे देश को रोमांचित करने लगीं। टीवी ने करवाचौथ को फैशनेबल बना दिया। नए तरह के सांस्कृतिक धागे में पूरे देश को बांधने का काम टीवी ने किया। लेकिन एलियन और सांप ने ऐसा बदनाम किया कि टीवी वालों के लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो गया। 

हैरत की बात यह है कि जब तक टीवी राखी सावंत और राजू श्रीवास्तव में व्यस्त था, सरकार की नींद नहीं टूटी लेकिन जैसे ही टीवी ने मुंबई हमलों पर सरकार की धज्जियां उड़ानी शुरू कीं, सरकार को लगा टीवी हदें पार कर रहा है। रेगुलेशन की बहस गति पकडऩे लगी। 

सरकार जानती है अखबार और प्रेस की ताकत। उसे ऐसा मीडिया अच्छा लगता है जो उसकी तरफ ध्यान न दे। वह टीआरपी के खेल में उलझा रहेगा तो सरकार की कमजोरियों को नहीं उघाड़ेगा। उसके घोटाले नहीं दिखाएगा। लेकिन, मुंबई हमले ने टीवी के दिमाग को बदला। मैं नहीं कहता कि सारे टीवी वाले बदल गए लेकिन कुछ लोग सोचने के लिए मजबूर हुए।

 इंडस्ट्री के अंदरूनी दबाव ने भी धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू किया। टीवी 2009 आने तक पटरी पर आता दिखा। अब सरकार के कान खड़े होने लगे। टीवी एक के बाद एक घोटालों को उजागर करने लगा। आईपीएल, कॉमनवेल्थ, आदर्श, २जी स्पेक्ट्रम घोटाले सामने आने लगे। टीवी ने बढ़-चढ़ के दिखाना शुरू किया। सरकार परेशान होने लगी। उसके खिलाफ माहौल बनने लगा। घाव में मिर्च लगी, जब अन्ना अनशन पर बैठे। टीवी ने उन्हें रातोरात उठा लिया। 

अब टीवी पर लोकतंत्र विरोध के आरोप लगने लगे। रेगुलेशन की आवाज बुलंद होने लगी। कुछ ऐसे लोगों को छोड़ा जाने लगा, जो टीवी को जनहित विरोधी बताने लगे, सांप्रदायिकता बढ़ाने का दोष देने लगे। पत्रकार रिपोर्टर अपढ़ हो गए। जाहिल। लेकिन ये आरोप उन आरोपों से बेहतर हैं।

 उन आरोपों को सुनकर शर्म आती थी और आज गर्व से सीना चौड़ा होता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है। वह अपनी भूमिका ठीक से निभाएगा तभी सरकारों और नेताओं को तकलीफ होगी। नेताओं को तकलीफ होगी तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा। वरना नेता तो चाहते हैं कि लोकतंत्र सोता रहे।


साभार: दैनिक भास्कर

Friday, November 18, 2011

आपको पता है कि क्या होती है नौटंकी?

'नौटंकी मत करो' ऐसा बार-बार लोगों को बोलते हुए आपने सुना होगा। पर क्या आपको पता है क्या होती है नौटकी? आइए हम आपको बताते हैं। नौटंकी एक जीवंत, लोकप्रिय और प्रभावशाली लोककला है।


यह कला जन-मानस से जुड़ी है। इस विधा में अभिनय थोड़ा लाउड किया जाता था। ठीक पारसी थियेटर की तरह। विषय कई बार बोल्ड रखे जाते थे, डायलॉग तीखे चुभने वाले होते थे। समयांतर इस विधा में विकृति आ गई औऱ इसे अश्लीलता का भी पर्याय माना जाने लगा।


विद्वानों के मुताबिक, यह कहना कठिन है कि नौटंकी का मंच कब स्थापित हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ। किंतु यह सभी मानते हैं कि नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में जिस सट्टक को नाटक का एक भेद माना है, इसके विषय में जयशंकर प्रसाद और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि सट्टक नौटंकी के ढंग के ही एक तमाशे का नाम है।


संगीत प्रधान लोकनाट्य नौटंकी सदियों तक उत्तर भारत में प्रचलित स्वांग और भगत का मिश्रित रूप है। स्वांग और भगत में इस प्रकार घुलमिल गई है कि इसे दोनों से अलग नहीं किया जा सकता। संगीत प्रधान इस लोक नाट्य के नौटंकी नाम के पीछे एक लोक प्रेमकथा प्रचलित है। इसकी जन्मस्थली उत्तर प्रदेश है। हाथरस और कानपुर इसके प्रधान केंद्र है।


हाथरस और कानपुर की नौटंकियों के प्रदर्शन से प्रेरित होकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, मेरठ और बिहार में भी इसका प्रसार हुआ। मेरठ, लखनऊ, मथुरा में भी अलग-अलग शैली की नौटंकी कंपनियों की स्थापना हुई। आज नौटंकी खत्म होती जा रही है, थोड़ा-बहुत जहां बचा है वहां इसका अश्लील पर्याय ही देखने को मिलता है। सरकार की ओर से इसे संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इस कला के प्रेमी आज भी बीते दिनों की याद करते हैं, जब नौटंकी प्रदर्शन जगह-जगह होते थे। उनका मानना हैं कि, बाहर से उजड़ी है, दिल में बसी है- नौटंकी।

साभार: दैनिक भास्कर डॉट कॉम

Monday, November 14, 2011

बाल दिवस: कितनी हकीकत, कितना फसाना


आज पूरे देश में बाल दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। सुविधासंपन्न बच्चों के लिए तो आज का दिन वाकई ख़ास है. पर उन बच्चों का क्या, जो हर सुविधा से महरूम हैं। उनका भोला चेहरा जब हमारी तरफ आशा की नज़र से देखता है तो क्या हमारे मन में टीस नहीं उठती ? 


चाचा नेहरू के इस देश में लगभग 5 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। जो चाय की दुकानों पर नौकरों के रूप में, फैक्ट्रियों में मजदूरों के रूप में या फिर सड़कों पर भटकते भिखारी के रूप में नजर आ ही जाते हैं। कुछेक ही बच्चे ऐसे हैं, जिनका उदाहरण देकर हमारी सरकार सीना ठोककर देश की प्रगति के दावे को सच होता बताती है। 


यही नहीं आज देश के लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चे शोषण का शिकार है। इनमें से अधिकांश बच्चे अपने रिश्तेदारों या मित्रों के यौन शोषण का शिकार है। शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेल रहे इन मासूमों के लिए भला बाल दिवस के क्या मायने हो सकते हैं? अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता व अज्ञानता के कारण ये बच्चे शोषण का शिकार होकर जाने-अनजाने कई अपराधों में लिप्त होकर अपने भविष्य को अंधकारमय भी कर रहे हैं। 


इनकी फिक्र अगर किसी को होती तो इनका बचपन इनसे न छिना होता। ये भी बेफिक्र होकर, खिलखिला कर हसना जानते। ये भी अपने सपने बुनते और सुनहरे भविष्य की और अग्रसर होते।


सुविधासंपन्न बच्चे तो सब कुछ कर सकते हैं परंतु यदि सरकार देश के उन नौनिहालों के बारे में सोचे, जो गंदे नालों के किनारे कचरे के ढ़ेर में पड़े हैं या फुटपाथ की धूल में सने हैं। उन्हें न तो शिक्षा मिलती है और न ही आवास। सर्व शिक्षा के दावे पर दंभ भरने वाले भी इन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ नहीं पाते।


पैसा कमाना इन बच्चों का शौक नहीं बल्कि मजबूरी है। ये मासूम तो एक बंधुआ मजदूर की तरह अपने जीवन को काम में खपा देते हैं और देश के ये नौनिहाल शिक्षा, अधिकार, जागरुकता व सुविधाओं के अभाव में, अपने सपनों की बलि चढ़ा देते है। 


यदि हमें 'बाल दिवस' मनाना है तो सबसे पहले हमें गरीबी व अशिक्षा के गर्त में फँसे बच्चों के जीवनस्तर को ऊँचा उठाना होगा और उनके अँधियारे जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैलाना होगा। यदि हम सभी केवल एक गरीब व अशिक्षित बच्चे की शिक्षा का बीड़ा उठाएँगे तो निसंदेह ही भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा तथा हम सही मायने में 'बाल दिवस' मनाने का हक पाएँगे।


इसके साथ ही हमारे अंदर जो संवेदना मर चुकी है उसे फिर से जिलाना होगा। नहीं देखना चाहते अब हम बच्चो को इस हालत में। उनका बचपन उन्हें लौटाना है। उनका भविष्य सवारना है.ऐसा माहौल बनाना है की हर बच्चे को देखकर हम गर्व करें।

Monday, October 24, 2011

कर्नल गद्दाफी और विद्रोहियों के आतंक की कहानी, सुनिए इस गवाह की जुबानी!


लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की मौत की पूरी दुनिया में चर्चा है। सभी इस पर अलग अलग तरह सोच रहे हैं। कोई इसे तानाशाही का अंत कह रहा है तो कोई इसे तेल का खेल। कुछ लोगों का कहना है कि पश्चिमी देशों ने तेल के कुओं पर अधिकार पाने के लिए गद्दाफी विरोधी लोगों को सह दिया था।


कुछ लोगों का कहना है कि गद्दाफी के तानाशाही रवैये के कारण वहां के लोगों में गुस्सा था। जिसकी परिणती उसके मौत के रूप में हुई। लीबिया के तानाशाह की मौत से कायम हुए शांति की वजह से केवल लीबियाई ही खुश नहीं है, बल्कि यह लहर यूपी तक पहुंच गई है।

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के रहने वाले 34 वर्षीय अरविंद जायसवाल को गद्दाफी की मौत से न तो खुशी है ना गम। उनको तो वहां फैले अराजकता और खूनखराबे से मिली निजात से खुशी है। उनको आज भी वो मंजर भुलाए नहीं भूलता। पिछले आठ महीनों तक लीबिया में गद्दाफी विरोधी हिंसक आंदोलन में फंसे अरविंद को भयंकर मानसिक और शारीरिक पीड़ा का शिकार होना पड़ा था। अपने दुख में वह अकेले थे। कोई नहीं साथ देने वाला था। यहां तक की दूतावास के भारतीय अधिकारियों से भी उनको कोई मदद नहीं मिली।

अपनी सारी उम्मीदें खो चुके थे, लेकिन तभी चमत्कार हुआ और उनको घर आने का मौका मिला। अंतत: 15 सितंबर की शाम घर लौट आए। जायसवाल के साथ तीन बांग्लादेशी नागरिकों को भी इस विध्वंशक परिस्थिती से मुक्ति मिली। ये इनके साथ लीबिया में काम कर रहे थे।

अरविंद ने कहा कि, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं सुरक्षित हूं। वहां की सड़क के किनारे पर गोलीबारी एक आम नजारा था। भगवान का शुक्र है कि हम जिंदा बच कर आ गए। 

18 जनवरी 2011 को लीबिया काम करने के लिए गए अरविंद अपने पीछे पत्नी सविता देवी और तीन बच्चों को छोड़ गए थे। उन्होंने कहा कि, ''वहां के हालात इतने खराब हैं कि हम अपने निवास में ही फंसे हुए थे। बाहर निकलने पर गोलिय़ों के शिकार होने का खतरा था। एक दिन कुछ बंदूकधारी हमारे घर आए। हमने उन्हें बताया कि हम पिछले दो दिनों से कुछ खाए नहीं हैं, तो उन्होंने हमें भोजन दिया और चले गए।''
  
अरविंद ने बताया कि, "पिछले तीन महीनों से हम लगातार भारत सरकार से भारतीय दूतावास के जरिए संपर्क में थे। लेकिन उनका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता था। मैं जिस कंपनी में काम करता था, उसी से वापस भारत जाने का अनुरोध किया तो उन्होंने मदद की और हम भारत लौटने में कामयाब रहे।


कटेंट साभार दैनिक साभार डॉट कॉम

 
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