Pillar of True Journalism to save Public Domain

Wednesday, April 27, 2011

जर्जर योजनाओं से हिचकोले खाता विकास का पहिया

अपने एक दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए बिहार के गोपालगंज जिले में गया हुआ था। रात के तीन बज रहे थे। दोस्त अपने जीवन संगनी संग सात फेरे ले रहा था। उसका ससुराल हजारों बल्ब की रौशनी में जगमगा रहा था। हलवाई सुबह के नाश्ते का इंतजाम करने में लगे थे। मैं शोर से थोड़ा निजात पाने के लिए मंडप से बाहर निकला।

सड़के के उस पार लालटेन की धीमी रौशनी टीमटीमा रहीथी। साथ ही टार्च की हल्की लाइट में कोई कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था। कौतुहलवश मैं उस रौशनी की तरफखिंचता चला गया। पास जाने पर देखा कि एक 55 साल के व्यक्ति बड़े-बड़े पन्नों पर कुछ लिख रहे थे। पूछने परपता चला कि वह गांव के स्कूल में टीचर हैं। और जनगणना से संबंधित काम कर रहे हैं।

पूरी रात काम करने वाले मास्टर साहब से जब पूछा कि आप कल बच्चों को कैसे पढाएंगे, तो उन्होंने कहा कि, जबतक यह काम चलेगा तब तक स्कूल में छुट्टी रहेगी। और कुरेदने पर तो उनके दिल का दर्द ही छलक उठा। उन्होंनेजो बयां किया, वो आप भी जान लीजिए। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहने लगे क़ि जनगणना के काम का बोझहम शिक्षको पर लाद दिया गया है।

हमें तो कुछ कहने तक का अवसर नहीं दिया गया। अब हम बच्चो को पढाये या जनगणना के काम में अपनीचप्पलें घिसे। हमारी हालत फिल्म 'थ्री ईडियट्स' के प्रोफेसर कि तरह हो गयी है जो एक समय में अपने दोनों हाथोंसे लिखता था और दो अलग-अलग काम एक साथ कर सकता था।


जनगणना जैसे अतिरिक्त काम ने तो हमारे जीवन कागणित ही बिगाड़ दिया है। अब इससे ज्यादा क्या कहे क़िहमारी निजी ज़िन्दगी भी कभी थी, इसको ही भूल बेठे हैं।स्कूल के बच्चो के लिए तो समय निकालना दीगर बात है, अपने बच्चों के चेहरे देखने तक का वक़्त नहीं मिलता।खाने-पीने की तो सुध ही नहीं, नींद भी पूरी नहीं हो पाती।

आंखों पर मोटा चश्मा लगाए ठण्ड से कांपते मास्टर साहबने बताया कि हमें तो दोहरी जिम्मेदारी दे दी गयी है। थोड़ीसंवेदना तो रखी होती हमसे भी। सर्दी जब कहर बरपा रही थी तब हम घर-घर के चक्कर काट रहे थे।

हमें शुरुआत में काफी दिक्कते आई। हर दरवाजे पर इंतज़ार करना मन में चिडचिडाहट भी पैदा कर देता था। कुछलोग तो अंदर आने को भी पूछ लेते हैं पर कुछ बाहर से ही रुखसत कर देते हैं। धीरे-धीरे इस बातों की आदत सीहोने लगी है। स्कूल में भी हमारे साथी एक दूसरे क़ि हालत पूछ कर खुद को तसल्ली देने क़ि कोशिश करते रहते हैं।कभी ना कभी तो काम निपटेगा इसी आस में लगे हैं कोल्हू के बैल की तरह। एक से दूसरे घर, दूसरे से तीसरे औरफिर यही क्रम रोज़ चलता रहता है।

काम निपटने को आ गया पर नींद अब भी हराम है। एक अनचाहा डर सताने लगा है क़ि सरकार आने वाले दिनों मेंऔर कौन-कौन से काम हमसे करवाएगी। हमारे उपर तो देश के भविष्य क़ि ज़िम्मेदारी है फिर हमें क्यूं ऐसे कामोंमें लगाया गया। कोई कुछ भी कहे पर सौ क़ि एक बात कहूंगा क़ि शायद ही कोई शिक्षक इस अनुभव को दोबाराजीने के लिए उत्सुक होगा।

अब बताइए कि देश के भविष्य के साथ ये क्या हो रहा है। जिस व्यक्ति का काम पढ़ना और पढ़ाना है, वह रात-दिन जनगणना का काम कर रहा है। यह नजारा केवल बिहार का ही नहीं कमोवेश पूरे देश का है।

Thursday, March 10, 2011

सावधान! आप सब्जी नहीं 'जहर' खा रहे हैं

बेमौसम हरी-भरी सब्जियों के देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। बैंगनी बैंगन और हरे मटर को देख जी ललचा उठता है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि प्रकृति के विरुद्ध जाकर हम जो काम करते हैं, उसका साइड इफेक्ट क्या होता है? नहीं हमारे पास इतनी फुर्सत कहां जो अपने हेल्थ के बारे में सोच सकें। पर नहीं जनाब इस घटना और जानकारी के जानने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

बुलंदशहर जिले में एक परिवार ने बड़े चाव से आलू दम की सब्जी बनाई और खाया। उस रात परिवार के सदस्यों की हालत बिगड़ गई। अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां दो लोगों की मौत हो गई। डॉक्टरों ने मौत की वजह पता लगाई तो होश उड़ गए। दोनों लोगों की मौत आलू की सब्जी खाने से हुई थी। इस तरह हमारे किचन में आने वाली हर सब्जी में जहर होने की संभावना बनी रहती है।

देश में खेती की जगह कम और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसान सब्जियों में केमिकल और किटनाशक धड़ल्ले से डाल रहे हैं। इनसे सब्जी में जहर तेजी से घुल रहा है और हमें मीठी मौत दे रहा है।

सब्जी नहीं केमिकल खा रहे हैं हम

सब्जियों में पाए जाने वाले पेस्टिसाइड और मेटल्स पर अलग-अलग शोध किया गया। शोध के अनुसार सब्जियों के साथ हम कई प्रकार के पेस्टिसाइड और मेटल खा रहे हैं। इनमें केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं और एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे घातक पेस्टीसाइड शामिल हैं।

सब्जियों के साथ शरीर में जाकर ये स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। सब्जियां तो हजम हो जाती हैं लेकिन यह जहर शरीर के विभिन्न संवेदनशील अंगों में जमा होता रहता है। इससे उल्टी-दस्त, किडनी फेल, कैंसर जैसी बीमारियां सामने आती हैं। पालक, आलू, फूल गोभी, बैंगन, टमाटर आदि में इस तरह का जहर पाया गया है। शोध के अनुसार खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है।

इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। प्रभुदान चारण ने टमाटरों के 28 नमूनों का निरीक्षण किया, जिनमें से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

फूलगोभी सबसे ज्यादा है प्रदूषित

खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है। इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। टमाटरों के 28 नमूनों में से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

ये हो सकती हैं ये बीमारियां

सब्जियों के साथ शरीर में जाकर एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे पेस्टिसाइड वसा उत्तकों में जम जाते हैं। बायोमैनीफिकेशन प्रक्रिया से शरीर में इनकी मात्रा बढ़ती रहती है। यह लंग्स, किडनी और कई बार दिल को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी अधिक मात्रा जानलेवा बन जाती है।

इसी तरह मेटल के कारण भी कई गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। केडमियम धातु लीवर, किडनी में जमा होकर इन्हें डेमेज करती है। यह धातु प्रोटीन के साथ जुड़कर उसका असर खत्म कर देता है। इससे कैंसर का खतरा रहता है। इटाई-इटाई नामक बीमारी होने से हड्डियां मुड़ जाती हैं। इस बीमारी को ब्रिटल बोन भी कहा जाता है। जापान में सबसे पहले यह तथ्य सामने आया था, जहां इसे इटाई-इटाई नाम दिया गया।

जिंक से उल्टी-दस्त, घबराहट होना आम है। ज्यादा मात्रा में जमा होने पर लीवर पैन की शिकायत हो जाती है। ज्यादा मात्रा होने पर इसे जिंकचीली कहा जाता है। सीसा की मात्रा शरीर में ज्यादा होने पर असहनीय दर्द होता है। किडनी पर इसका असर सीधा होता है और वह फेल हो सकती है। मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। खून में इसकी मात्रा बढ़ने पर एनिमिया हो जाता है। लीवर को भी यह प्रभावित करता है। इससे लकवा होने की आशंका भी रहती है। क्रोमियम से चर्मरोग व श्वास संबंधी बीमारियों के साथ शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म होने की समस्या रहती है।

कैंसर होने की संभावना भी बनती है। कॉपर से एलर्जी, चर्मरोग, आंखों के कॉर्निया का प्रभावित होना, उल्टी-दस्त, लीवर डेमेज, हाइपर टेंशन की शिकायत मिलती है। मात्रा बढ़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है। हिमोग्लोबिन के साथ जुड़कर यह उसे कम कर देता है।

साभार दैनिक भास्कर डॉट

Sunday, March 6, 2011

न्यूयार्क में हुए नैना चार, काशी में हुआ मंत्रोच्चार

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद वरुण गांधी और कोलकाता की ग्राफिक डिजाइनर यामिनी रॉय की शादी आज वाराणसी के कामकोटेश्वर मंदिर में सम्पन्न हो गई। इनकी शादी हनुमानघाट इलाके स्थित कामकोटेश्वर मंदिर में परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ वैदिक मंत्रोचार के बीच हुई।

विवाह के बाद वर-वधु ने काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर आर्शीवाद भी लिया। पर क्या आप जानते हैं कि इस जोड़े की प्रेम कहानी की शुरूआत सात-समंदर पार अमेरिका में हुई थी।बात सन् 2004 की है। उस समय वरुण अमेरिका के न्यूयार्क शहर गए हुए थे। वहीं एक भारतीय कार्यक्रम में उनकी मुलाकत यामिनी से हुई। दोनों की आंखें चार हुई और एक-दूसरे के लिए दिल में जगह बन गई। दोस्ती का सिलसिला शुरू हो गया।

लंदन में वरुण के एक दोस्त के रेस्टोरेंट में डिजाइनिंग का जिम्मा संभालने गई यामिनी से वरुण की नजदीकियां और बढ़ी।लंदन में पढ़ाई कर चुके वरुण के लिए यह शहर अनजान नहीं था। उन्होंने यामिनी को पूरे लंदन की सैर कराई। इस मस्ती में दोनों एक-दूसरे के नजदीक आते गए। दोनों का साथ में लगातार डिनर करना रिश्तों की गंभीरता को बयां कर रहा था।
वरुण भारत लौट आए। 20 साल की उम्र में उनकी कविता-संग्रह प्रकाशित हुई। इस संग्रह ने यामिनी का दिल ही लिया। दोनों के रिश्ते के बारे में मां मेनका गांधी को पता चल गया। पर मां ने इसका खुलासा नहीं किया। समय के दबाव में यह रिश्ता छुपाए रखा गया। जब मां को लगा की अब समय आ गया है, इस रिश्ते के बारे में बताने का, तो उन्होंने पूरी दुनिया के सामने इसकी घोषणा कर दी। सात साल पहले शुरू हुआ प्यार आज अपनी मंजिल पर पहुंच गया है। दोनों प्रेमी सात जन्मों के लिए एक-दूजे के हो चुके हैं।

दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार

Monday, January 24, 2011

''मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा''

देश के महान शास्त्रीय गायक और भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी का सोमवार सुबह 8.05 बजे पुणे के एक अस्पातल में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गडक में हुआ था। इनको बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 1932 में वह गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े।

अगले दो वर्षों तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से संगीत की शिक्षा ली। घर वापसी से पहले वह कलकत्ता और पंजाब भी गए। सन् 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने पंडित रामभन कुंडगोलकर से गडग के पास कुंडगोल में संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने खयाल गायकी की बारीकियां भी सीखीं।

पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया। उनको कई रागों को मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना करने का भी श्रेय जाता है। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल की है।

सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित

भीमसेन जोशी को 4 नवम्बर, 2008 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से पुरस्कृत किया गया। इन्हें भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन् 1985 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। इसके साथ इन्हें पद्म विभूषण और पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

19 साल की आयु में आये सार्वजनिक मंच पर

किराना घराना के जोशी ने 19 वर्ष की आयु में पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से अपनी गायन कला का प्रदर्शन किया था। उनकी अनवरत यात्रा आज समाप्त हुई है। उन्होंने पहली बार अपने गुरु सवाई गंधर्व के 60वें जन्मदिवस पर जनवरी 1946 में पुणे अपना गायन प्रस्तुत किया था।

गीत जो हो गए अमर

जोशी जी द्वारा गाए गए गीत लोगों के बीच समां बांध देते थे। उनके संगीत में गजब का जादू था। उनके द्वारा गाए गए गीत पिया मिलन की आस, जो भजे हरि को सदा और मिले सुर मेरा तुम्हारा संगीत के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं। इस का सम्मोहन आज भी बरकरार है।
दैनिक भास्कर से साभार

'साधु सराहि सुमन सुर बरषे' को कलंकित करते कलयुगी बाबा

धर्म और राजनीति का कॉकटेल तो आदि काल से चला आ रहा है, लेकिन सेक्स के तड़के ने आध्यात्म को दूषित कर दिया है। ऐसे में भरोसा करें तो किस पर? क्यों उठ रहा है आध्यात्मिक चेहरों से विश्वास ? तत्कालिक घटनाओं पर चलिए एक नजर डालते हैं, जिसने देश के कुछ चुनिंदा चमत्कारिक चेहरों को बेनकाब किया है।

वैसे तो साधु शब्द आते ही हृदय भावविह्वल हो उठता है। साधु की व्याख्या करते हुए तुलसीदास ने कहा है कि 'साधु सराहि सुमन सुर बरषे'। साधु बोलता है तब अमृत और फूलों का बरसात होती है। साधु को आध्यात्मिक, निस्वार्थ सेवक और सदाचारी कहा जाता है। शंकराचार्य, स्वामी परमहंस और आदि काल के बह्मर्षी समाज को मार्गदर्शन देते रहे हैं। ऐसे गौरवशाली इतिहास को आज भगवताचार्य राजेंद्र, नित्यानंद, पायलट बाबा, इच्छाधारी बाबा जैसे साधु कलंकित कर रहे हैं। घर्म के नाम पर धंधे की शुरूआत करने वाले ये साधु देह व्यापार तक अपनी पहुंच बना लिए हैं। कुछ ऐसी दुर्भाग्यशाली घटनाओं पर एक नजर...

गिरफ्त में आए भगवतार्य राजेंद्र उर्फ पोर्न स्वामी

हाल ही में वृंदावन पुलिस ने इस बाबा को गिरफ्तार किया है। यह यमुना नदी के घाटों और पवित्र स्थानों के आस-पास पर अश्लील फिल्में शूट करता था। इस स्वामी से कई अश्लील फिल्में और क्लिपिंक्स बरामद की गई हैं। फिल्मों में कुछ विदेशी युवक युवतियां के साथ स्वामी खुद भी अप्राकृतिक यौनाचार करता हुआ दिखा है। यहां तक की इस पोर्न बाबा ने अपनी बीबी की भी अश्लील फिल्में बनाकर बाजार में बेचा है।

भगवताचार्य पर आरोप है कि पैसों के लालच में उसने अपनी पत्नी के साथ के कुछ अंतंरग चित्रों को इंटरनेट पर अपलोड कर दिया और सीडी बना कर बाजार में बेच दिया है। लेकिन जब इन चित्रों और सीडी को लेकर साधु की बीवी को कुछ लोगों ने ब्लैकमेल किया तो उसने साधु के बचाव में ब्लैकमेल करने वाले और एक दुकानदार के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी है।

मामला यह है कि 28 जून को साधू राजेंद्र की पत्नी ने अपना लैपटॉप ठीक करवाने के लिए अरविंद नामक व्यक्ति को दिया था। साधु की पत्नी का आरोप है कि अरविंद और उसके साथियों ने लैपटॉप के साथ छेड़छाड़ की है। और उसके पति के कुछ अंतरंग चित्रों की सीडी बनाकर बाजार में बेच दी है। उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं कि वह उन्हें दस लाख रुपए दे वरना वह इसे समाज में सार्वजनिक कर देंगे।
अरविंद ने इस आरोप से इंकार करते हुए कहा कि, इस तरह की सीडी बाजार में पहले से आ रही थीं। उसने लैपटॉप के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की है। बाजार में इस सीडी का खुलासा होने के बाद से साधू राजेंद्र के खिलाफ मथुरा और वृंदावन के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

स्वामी नित्‍यानंद

नित्‍यानंद अपने सैक्स स्कैंडल के लिए सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। कहा जाता है कि स्‍वामी ‘प्राचीन तांत्रिक रहस्‍यों’ की शिक्षा देने और उनके प्रयोग के लिए अपने आश्रम में आने वाली महिलाओं से ‘सीक्रेट सेक्‍स एग्रीमेंट’ करता था। इसके अनुसार, महिलाओं को नग्‍नता और सेक्‍स के लिए सहमति जतानी होती थी। अपने अश्‍लील फोटो खींचने की अनुमति देनी पड़ती थी। साथ ही उन्‍हें इस बात की सख्‍त हिदायत दी जाती थी कि इस बात को वे आश्रम से बाहर नहीं ले जाएं। उस समय जो सेक्स सीडी बरामद की गई उसमें नित्यानंद, एक लड़की के साथ रंगरलिया मनाते दिखाई दिया था। लड़की को कथित अभिनेत्री रंजीता बताया गया।

बताते चलें कि स्वामी नित्यानंद का असली नाम राजशेखर है। वह तमिलनाडु के थिरुनामलाई के रहने वाले हैं। इसका थिरुनामलाई और बैंगलोर में बहुत बड़ा आश्रम है। इन्ही जगहों में से कहीं पर संत को कैमरे में कैद किया जा रहा था। वीडियो में साड़ी पहने एक महिला दिखती है जिसके साथ बाबा को बाद में आपत्तिजनक हालात में देखा जाता है। नित्‍यानंद पर फिलहाल केस चल रहा है।

भीमानंद उर्फ इच्छाधरी बाबा

भीमानंद, इच्छाधारी बाबा का चोला पहन कर देह व्यापार का धंधा करवाता था। उसके संपर्क में 600 लड़कियां थीं। इनमें से 50 लड़कियां केवल बाबा के लिए ही काम करती थी। लड़कियों के रेट का 40 फीसदी कमीशन बाबा अपने पास रखता था। बाबा ने अलग-अलग लड़कियों के अलग-अलग रेट रख रखे थे। मॉडल के लिए 50 हजार, स्टूडेंट के लिए 20 हजार और हाउसवाइफ के लिए 10 हजार। इन लड़कियों को देश भर में फैले बाबा के एजेंट लाते थे।

भीमानंद के पास से दस सेलफोन और करीब 100 मिली डायरी मिली। इनमें से कई में कॉल गर्ल्स से सम्बन्धित जानकारियों का जिक्र था। बाबा के आलीशान ठिकाने से चांदी के कवर वाली तलवार, बंदूक तथा बारहसिंगा के सींग बरामद किए गए। भीमानंद के परिवार वालों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनके कुख्यात ददुआ डकैत से गहरे ताल्लुकात थे।

भीमानंद के कमाई के कई जरिए थे। भक्ति कार्यक्रम में चढ़ावा तथा देह व्यापार से हासिल रुपये बाबा ने रीयल एस्टेट और ब्याज पर लगा रखे थे। विदेशों से भी चंदे के रूप में उसकी कमाई होती थी।

पायलट बाबा

देशभर में एक रूपये में कंप्यूटर शिक्षा देने का दावा करने वाले पायलट बाबा ने फ्रॉड करके करोड़ो कमाए। बडे़-बडे़ नेताओं ने पायलट बाबा का साथ देकर इसे जोरशोर से प्रसारित किया। इस गोरखधंधे के तहत आईकावा इंटरनेशनल कंप्यूटर कंपनी के साथ करार होने के बाद एक रूपये में कंप्यूटर शिक्षा देने का खेल पूरे देशभर में शुरू किया गया। कंप्यूटर सेंटर की फ्रेंचाइजी खोलने के लिये जमानत राशि के रूप में 50 हजार रूपये जमा कराए।

वहीं, कुंभ नगरी मे हुए हादसे को लेकर भी बाबा के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। इस हादसे में कई बेगुनाहो की जान चली गई। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ गिरफ्तारी हुई। कहा जाता है कि बाबा के ऊंचे पहुंच के कारण ही ऐसा संभव हो पाया है।

दैनिक भास्कर से साभार
http://www.bhaskar.com/article/NAT-saint-sex-cd-and-scandal-1776982.html?HF=

Sunday, January 16, 2011

सेक्स, पॉलिटिक्स और मर्डर मिस्ट्री की पूरी दास्तां...

4 जनवरी 2010 की सुबह। बिहार के पूर्णिया जिले का सिपाही टोला। यहां सदर से भाजपा विधायक राजकिशोर केशरी के घर पर जनता दरबार लगा हुआ था। राजहंस पब्लिक स्कूल की प्राचार्या रूपम पाठक जनता दरबार में आकर बैठ गई। उसने विधायक से अकेले में बात करने की इच्छा जतायी।

विधायक निर्धारित स्थल से हटकर बगल में उससे बातचीत करने लगे। इतने में उसने अपनी शॉल में छुपा चाकू निकाल कर विधायक के पेट पर वार कर दिया। चाकू लगते ही विधायक जमीन पर गिर गये। इस मंजर को देख वहां के लोगों के होश फाख्ता हो गए। जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक केशरी के प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

इस घटना के बाद आक्रोशित लोगों ने रूपम की जमकर पिटाई की। इस पिटाई में घायल उसे कटिहार मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उसकी स्थिति नाजुक बनी रही। कई बार तो उसके मरने की खबर भी उड़ी। होश में आने के बाद रूपम ने कहा कि उसने जो किया है, वो सही किया है। उसे पछतावा नहीं है। पर वह अब जीना नहीं चाहती है। उसे भी मार दिया जाय। पुलिस ने रुपम को गिरफ्तार कर लिया। उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत मिली है।

रूपम चीख-चीख कर कह रही थी कि विधायक उसका रेप करता रहा है। केवल वह ही नहीं उसके गुर्गे ने भी उसका रेप किया है। इनका मन उससे नहीं भरा तो अब उसकी 17 साल की बेटी की मांग कर रहे थे। उसकी बेटी का भी रेप करना चाहते थे। जब रूपम ने मना किया, तो उसे फोन पर धमकियां देने लगे। परिवार को सारी बात बता देने का डर दिखा कर स्कूल में जाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया करते थे। पर जब बात बेटी पर आ गई तो मां ने चंडी का रूप धारण कर लिया।

यह घटना पूरे देश में आग की तरह फैल गई। चूंकि मामला सियासत से जुड़ा था, इसलिए राजनीति होनी तय थी। इस घटना के तुरंत बाद सूब के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने विधायक पर रेप का आरोप लगाने वाली रुपम को ब्लैकमेलर कहा। उन्होंने कहा कि उसने पूर्णिया के एक अंग्रेजी अखबार लिंक एक्सप्रेस में खबर प्रकाशित करवा कर और इसके आधार पर 2007 की तथाकथित घटना के तीन साल बाद विधायक पर यौन शोषण का झूठा आरोप लगाया। फिर 14 जून 2010 को रुपम ने शपथपत्र दायर कर कहा कि किसी के बहकावे में आ कर उसने विधायक श्री केशरी के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज किया है। विधायक और उसके पीए विपिन राय से उसका किसी तरह का विवाद नहीं है।

मोदी के बयान के बाद पूरा बिहार रूपम के पक्ष मे आ गया। मोदी के इस्तीफे की मांग की जाने लगी। महिला संगठन लामबंद हो गई। सभी ने एक सुर में सीबीआई जांच की मांग की। आखिरकार मामले की गंभीरता और लोगों की मांग को देखकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीबीआई जांच की केंद्र से अनुशंसा कर दी। अब सीबीआई इस केस की जांच करेगी।
मामले का फ्लैश बैक

इस मर्डर और रेप केस की मिस्ट्री समझने के लिए फ्लैश बैक में चलते हैं। रूपम पाठक पूर्णिया में राजहंस पब्लिक स्कूल चलाती हैं। स्कूल के एक वार्षिकोत्सव में विधायक केशरी मुख्यअतिथि बनकर आये। यहां आने और रूपम से बातचीत करने के बाद केशरी की नीयत खराब हो गई। 18 अप्रैल 2007 को रूपम प्रोग्राम की फोटो देने के लिए विधायक के घर गई। वहां उनके साथ जबरन दुष्कर्म किया गया। बाद में उसके पीए विपिन ने रूपम का उसके ही विद्यालय के क्लास में रेप किया। इसके बाद विपिन उसे परिवार वालों को बता देने की धमकी दे कर यौन शोषण करता रहा।

रूपम के साथ विधायक का मन भर गया था। रूपम की 17 साल की बेटी पर उसकी नजर लग गई थी। कुछ दिन पहले ही विधायक ने अपनी ईच्छा जाहिर की थी। रूपम नाराज हो गई। विधायक को सख्त लहजे में मना किया। केशरी मानने वाला कहां था, इस जबरन कोशिश से रूपम नाराज हो गईं।

उसने 28 मई 2010 को यौन शोषण का मामला दर्ज कराया। पुलिस ने कांड संख्या 182/10 में विधायक राज किशोर केसरी एवं उनके एक सहयोगी विपिन राय को आरोपी बनाया था। इस घटना ने बिहार और पूर्णिया की राजनीति में हलचल मचा दी। मामले को सलटाने के लिए दोनों पक्षों के बीच सुलह कराई गई। उस समय मामला शांत हो गया। रूपम ने केस वापस ले लिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर की रात विधायक अपने गुर्गों के साथ न्यू ईयर की पार्टी मना रहा था। वह रूपम के घर पहुंच कर उससे जबर्दस्ती करने लगे। इस घटना से रूपम आपे से बाहर हो गई। बात अब बेटी की भी आन पर आ गई थी। उसने विधायक को सबक सिखाने की सोची। वह एक जनवरी को ही विधायक जी के आवास पर पहुंचीं, पर भारी भीड़ के कारण मौका नहीं मिल पाया। वह वापस लौट आईं। पर 4 जनवरी के सुबह 9.30 को उसे मौका मिल गया। और उसने विधायक का चाकू घोपकर मर्डर कर दिया।

मर्डर के बाद रूपम का परिवार

इस मर्डर के बाद रूपम के घर की स्थिति दयनीय हो गई है। पुलिस और प्रशासन के प्रेशर के कारण रूपम का परिवार भटक रहा है। सूत्रों की माने तो उसके घर पर पुलिस ने कब्जा कर रखा है। स्कूल में ताला जड़ दिया गया है। रूपम की मां को प्रताड़ित किया जा रहा है। इस भयंकर ठंड में एक वृद्ध भटकने के लिए मजबूर है। वह चाह कर भी अपनी बेटी से नहीं मिल पा रही है। उसे अपनी बेटी के किए पर पछतावा नहीं है। मां कहती है कि यदि विपिन मेरे सामने आ जाए तो उसका खून पी जाएंगी। विधायक और उसके गुर्गों ने उनकी बेटी का जीवन नरक बना दिया था।
मर्डर के बाद विधायक राजकिशोर केशरी का परिवार

लोगों की माने विधायक को तो अपने किए की सजा मिल चुकी है। पर उनका परिवार तड़प रहा है। वह अपने पीछे भरे-पूरे परिवार के साथ पत्नी और बेटा छोड़ गए हैं। जहां पहले हमेशा चहल-पहल रहा करती थी। जनता का दरबार लगा करता था। विधायक फैसले सुनाया करते थे। आज वहां अगर कुछ है तो सिर्फ सन्नाटा। हर ओर मातम और मायूसी। कोई किसी से बात तक करने की स्थिति में नहीं। जहां लोगों का मेला लगा करता था, आज वहां मातम है। यहां ऐसी स्थिति हो जाएगी, इसकी तो किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। पर, होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। विधायक राजकिशोर केशरी के मधुबनी टोला स्थित घर पर ख़ामोशी है। परिजन और परिचित आ जरुर रहे हैं, लेकिन मुंह पर चुप्पी साधे। घर के परिसर में श्राद्ध के लिए पंडाल लगभग बन कर तैयार हो गया है। वहीं पर एक टेबल पर विधायक की तस्वीर लगी है, जिस पर फूलों का माला लटका हुआ है।
दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार

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Friday, December 3, 2010

जर्जर इमारतें

मौत के साए में जिंदगी

दिल्ली के लक्ष्मी नगर में इमारत ढह जाने का जो दर्दनाक हादसा हुआ है, उसने सबको दहला कर रख दिया है। इसमें 70 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग जख्मी हुए। ऐसा ही कुछ मंजर गाजियाबाद सहित पूरे वेस्ट यूपी में भी देखने को मिल सकता है। यहां लक्ष्मी नगर जैसी कई जर्जर इमारतें हैं, जो कभी भी ढह कर मलबे में तब्दील हो सकती हैं। इमारतों में नीचे दुकानें हैं और ऊपर लोग रहते हैं। अगर भविष्य में यह इमारतें गिरीं तो तय है कि बड़ी संख्या में जान-माल का नुकसान होगा। इन बातों से बाखबर प्रशासन कन्नी काटता नजर आ रहा है, तो वहीं इन इमारतों का जन्मदाता जीडीए नींद में है। इमारतों में भूकंप के मामूली झटके बर्दाश्त करने की जरा भी कूवत नहीं है। भूकंप के हल्के झटके भर से जर्जर इमारतें ताश के पत्तों की तरह कभी भी भरभरा सकती हैं।
हाई रिस्क जोन में बहुमंजिला इमारतें
भूकंप शब्द से ही लोगों में दहशत फैल जाती है। खासकर दिल्ली और एनसीआर के लोगों में। यह क्षेत्र हाईरिस्क जोन में आने के कारण सबसे ज्यादा संवेदनहै। बहुमंजिला इमारतों की भरमार होने से यहां भूकंप आने पर जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।
दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुडग़ांव, फरीदाबाद जैसे शहरों में जगह की कमी के कारण ऊंची बिल्डिंग बनाने का चलन काफी समय से चल रहा है। लेकिन बहुमंजिला इमारत बनाने का यही चलन लोगों के लिए मुसीबत बन गया है। प्राधिकरण निजी बिल्डरों से भूकंपरोधी भवन नहीं बनवा पा रहे। भूकंप से बचाव के उपाय केवल कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। गनीमत बस इतनी है कि अभी तक दिल्ली और एनसीआर में बड़ा भूकंप नहीं आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 7 तक की तीव्रता का भूकंप आ सकता है। 4.5 से अधिक तीव्रता का भूकंप आने पर इमारतों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। भूस्खलन के साथ-साथ बड़े-बड़े भवन ढह सकते हैं। भूमिगत पाइप लाइनों के टूटने का खतरा बढ़ जाता है। भूकंप की तीव्रता बढऩे पर नदियों का मार्ग तक बदल सकता है।

यमुना तीरे इमारतों की बाढ़
यमुना के किनारे के रेतीले इलाकों में तेजी से बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा रहीं हंै। सबसे खतरनाक बात यह है कि यहां की ऐसी अनेक बहुमंजिला इमारतें हैं, जो भूकंप का हल्का झटका भी नहीं सह सकतीं। भूकंप वैज्ञानिकों के अनुसार अगर चार रिक्टर पैमाने की भी हलचल हुई तो ताश के पत्तों की तरह इस क्षेत्र की इमारतें ढह जाएंगी।
केन्द्र सरकार के शहरी भूकंप भेदता यूनीकरण कार्यक्रम (यूईवीआरपी) के अधिकारियों ने नदी में निर्माण को खतरनाक करार दिया है। ऐसी स्थिति में लोगों को यही कहा जाना चाहिए कि नदी के नहीं तो खुद के जीवन के लिए ही सही ऐसी जगहों पर बहुमंजिला इमारतें बनाने से बचें। आगरा भूकंपीय खतरे की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है। यहां भूकंप का झटका कभी भी लग सकता है। यूपी के राहत आयुक्त के नेतृत्व में चल रही यूईवीआरपी के प्रोजेक्ट समन्वयक जीवन पंडित के मुताबिक ठोस मिट्टी पर बनी इमारतों पर भूकंप का असर कम होता है। जबकि यमुना और इसके तट रेत से भरे हंै। भूकंप होने पर रेत में भूजल मिल जाता है, इसे लिक्वफिकेशन कहते हैं। यह दलदल बनाने का काम करता है। इससे नींव कमजोर हो जाती है और भवन ध्वस्त हो सकते हंै। भूकंप की दृष्टि से कभी भी नदी के पास निर्माण नहीं करना चाहिए।

क्या कहता है जियोलॉजिकल सर्वे
जियोलॉजिकल सर्वे में यह बात सामने आई है कि गाजियाबाद सहित पूरा दिल्ली-एनसीआर फोर्थ जोन में है। यानि हल्का भूकंप का झटका भी तबाही ला सकता है। ट्रांस हिंडन क्षेत्र में रियल स्टेट कारोबार के फैलने से भारी मात्रा में जल दोहन हो रहा है। जिससे मिट्टी खिसकती है और अत्याधिक बारिश से इमारतों में दरार की संभावना है। जबकि भू-जल पर्याप्त मात्रा में होने से दबाव बना रहता है और मिट्टी नहीं खिसकती। सर्वे के अनुसार यदि प्राकृतिक तरीके से मिट्टी खिसकती है तो कोई खतरा नहीं, लेकिन दोहन से इमारतों की नींव कमजोर हो सकती है।
भूकंप से सुरक्षित बनाने के लिए इमारतों को रिक्टर स्केल मैग्निटयूड 6 की तीव्रता का भूकंप झेलने के लिए तैयार किया जाता है। इसके लिए बिल्डिंग के कंस्ट्रक्शन के वक्त ही उसे भूकंपरोधी बनाने के सभी उपाय किए जाते हैं। घर खरीदने के पहले किसी सर्टिफाइड स्ट्रक्चरल इंजीनियर का सर्टिफिकेट, जिसमें रिक्टर स्केल मैग्निटयूड कम से कम छह रखा गया हो, उसे जरूर देखना चाहिए।

भूकंप की वजह
भूकंप आज भी ऐसा प्रलय माना जाता है जिसे रोकने या काफी समय पहले सूचना देने की कोई प्रणाली वैज्ञानिकों के पास नहीं है। प्रकृति के इस तांडव के आगे सभी बेबस हो जाते हैं। सामने होता है तो बस तबाही का ऐसा मंजर जिससे उबरना आसान नहीं होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन और हैती में आए भूकंप हैं।
भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है। सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण भंगुर होती है। ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें गिरती हैं तो भूकंप आता है। एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे होते हैं।
धरती की सतह से काफी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया। सतह से 600 किलोमीटर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिकों क्रियाओं के कारण भूकंप आते होंगे।
जानवरों को होता है भूकंप का अहसास!
बचपन में बड़े बुजुर्गों से सुना था कि जब भूकंप आने को होता है तो पशु-पक्षी कुछ अजीब हरकतें करने लगते हैं। चूहे अपनी बिलों से बाहर आ जाते हैं। अगर यह सही है तो वैज्ञानिक पशु-पक्षियों की इस अद्भूत क्षमता को भूकंप की पूर्व सूचना प्रणाली में क्यों नहीं बदल सकते। अगर ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति की इस तबाही पर मानव विजय पा सकेगा। भुज में आए भूकंप के समय ऐसा देखा गया था कि पशु वहां से भागने लगे थे।

घर बनाने या खरीदने के पहले इन बातों का रखें ध्यान
निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उस जगह की मिट्टी की जांच जरूरी होती है। इससे पता चलता है कि उसमें इमारत का वजन सहन करने की क्षमता है या नहीं। मिट्टी की क्षमता के आधार पर ही इमारत में फ्लोर्स की संख्या तय की जाती है। और डिजाइन तैयार किया जाता है।
अब सवाल उठता है कि मिट्टी की जांच कहां कराई जाए? मिट्टी की जांच की जिम्मेदारी सरकार से मान्यता प्राप्त प्राइवेट लैब संभालती है। इसके लिए वह बाकायदा एक तय फीस चार्ज करती है। यह 20 हजार से एक लाख रुपये तक हो सकती है। जांच के बाद लैब सर्टिफिकेट जारी करती है।
जांच में यह पता चलता है कि मिट्टी प्रति स्क्वेयर सेंटीमीटर कितना लोड झेल सकती है। वॉटर लेवल और बियरिंग कपैसिटी का सही अनुपात क्या है। मिट्टी की दशा क्या है यानी मिट्टी हार्ड है या सॉफ्ट।

बेसमेंट का ध्यान जरूरी
ललिता पार्क (दिल्ली) में गिरी इमारत के बेसमेंट में पानी भरा था। ऐसा माना जा रहा है कि नींव में पहुंचे पानी ने बिल्डिंग को कमजोर बना दिया। बेसमेंट इमारत का आधार होता है, इसलिए इसका मजबूत होना बहुत जरूरी है।
इमारत की वॉटर प्रूफिंग बहुत जरूरी होती है। इमारत का बिल्डर ही बेसमेंट की वॉटर प्रूफिंग के लिए जिम्मेदार होता है। जब उस इलाके में वॉटर लेबल ज्यादा हो, जैसे यमुना और हिंडन किनारे वाले इलाके, तब उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। संबंधित जगह के वॉटर लेवल के अनुसार ही यह तय किया जाता है कि बेसमेंट को किस तरह की वॉटर प्रूफिंग सुरक्षित रख सकती है। ऊंचे वॉटर लेवल वाले इलाकों में आमतौर पर बॉक्स टाइप वॉटर प्रूफिंग की जाती है, जिसमें नींव और चारों तरफ की दीवारों पर कोटा स्टोन की परत चढाई जाती है।

निर्माण सामग्री की करें जांच
मिट्टी का ठीक होना ही इमारत की सुरक्षा की लिए काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि इमारत को तैयार करने में लगाए जाने वाले सामग्री की गुणवत्ता अच्छी हो। इस सामग्री में क्रंक्रीट, सीमेंट, ईंट, सरिये आदि शामिल होती हैं। निर्माण सामग्री के ठीक होने या नहीं होने के बारे में ज्यादातर संतुष्टि सिर्फ देखकर ही की जाती है। फिर भी कुछ हद तक सावधानी बरती जा सकती है।
सबसे पहले प्लास्टर की जांच करनी चाहिए। इसके लिए एक कील या गाड़ी की चाबी लें, इसे दीवार पर हाथ से गाढऩे की कोशिश करें। अगर कील दीवार में धंस जाती है तो रेत झड़ता है, तो साफ है कि खराब सामग्री लगाया गया है। यदि कील आसानी से नहीं धंसती, तो समझ सकते हैं कि सामग्री अच्छी है और काफी तराई भी की गई है।
यदि आप संतुष्ट नहीं हैं, तो जांच में प्रोफेशनल की मदद लें सकते हैं। कंक्रीट फ्रेमवर्क के तहत आने वाली चीजों की जांच किसी प्रफेशनल से कराई जा सकती है। इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत पिलर, नींव, स्लैब्स आदि आते है। प्रोफेशनल स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग से सर्टिफिकेट लिया जा सकता है।
थर्ड पार्टी से गुणवत्ता जांची जा सकती है। इस प्रक्रिया के तहत बिल्डर मिट्टी समेत सभी निर्माण सामग्री आदि की गुणवत्ता की जांच कराता है। यह जांच प्राइवेट एजेंसियां तय मानकों के आधार पर करती हैं, जिन्हें मानना बिल्डर के लिए जरूरी होता है। सभी चीजों की जांच के बाद सर्टिफिकेट दिए जाते हैं, जिन्हें एक बार जरूर देख लेना चाहिए।

दस्तावेज जरूर लें
अगर आप इमारत की सुरक्षा के बारे में जांच-पड़ताल कर रहे हैं, लेकिन उसके वैध या अवैध होने पर लापरवाही कर जाते हैं, तो आप बड़ी भूल कर रहे हैं। कोई भी बिल्डर या सरकार तभी तक जिम्मेदार है, जब तक इमारत लीगल है।
नेशनल बिल्डिंग कोड के मानक, जो सीपीडब्ल्यूडी जैसी सरकारी संस्थाओं के पास या इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
सबके साथ यह भी जानना जरूरी है कि उस क्षेत्र में बिल्डिंग में कितने फ्लोर की इजाजत है, फ्लोर एरिया अनुपात के अनुसार कितनी जगह पर निर्माण किया जा सकता है, जोन के अनुसार, बिल्डिंग की अधिकतम ऊंचाई कितनी रखी जा सकती है, किस तारीख को प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया, यानी बिल्डिंग कितनी पुरानी है।

अग्नि सुरक्षा
घर लेने से पहले यह संतुष्टि कर लेना भी जरूरी है कि बिल्डिंग को आग के खतरों से सुरक्षित बनाया गया है या नहीं। इसके यह जांच कर लें कि अगर मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट है तो फायर डिपार्टमेंट से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिला है कि नहीं।

स्ट्रक्चरल इंजीनियर से जरूर लें सलाह
इमारत बनवाने या फ्लैट खरीदने से पहले किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह जरूर लें। यह सलाह ड्रॉइंग डिटेल्स बनवाने तक ही सीमित न रहे। उस डिटेल्स पर पूरी तरह अमल भी करें। घर के निर्माण के वक्त स्ट्रक्चरल इंजीनियर से यह चेक करवाते रहें कि निर्माण सही हो रहा है या नहीं। आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर का आपसी मेल-जोल होना बहुत जरुरी है। अगर खुद घर बनवा रहे हैं, तो निर्माण पर आने वाली कुल लागत का अनुमान लगाना आसान हो जाता है।

कानूनी प्रावधान
नेशनल बिल्डिंग कोड के अनुसार बिल्डिंग के डिजाइन व निर्माण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर तैयार की गई इमारत को सुरक्षा के आधार पर 100 फीसद खरा माना जा सकता है। इसे सबसे पहले 1970 में प्लानिंग कमिशन ने लागू किया था। 1983 में इसे संशोधित किया गया। इसके बाद दो बार 1987 में और एक बार 1993 में इसमें सुधार किए गए। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया 2005 लाया गया। 'एनबीसी 2005Ó का निर्माण ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड, म्यूनिसिपल एडमिस्ट्रिेशन, पब्लिक बॉडीज और प्राइवेट एजेंसी वगैरह ने मिलकर तैयार किया। इसका मकसद डेवलेपमेंट कंट्रोल रूल्स और बिल्डिंग की आम जरूरतों, फायर सेफ्टी जरूरतों, मटीरियल क्वॉलिटी, स्ट्रक्चरल डिजाइन, कंट्रक्शन और प्लंबिंग सर्विस आदि का ध्यान रखना है। जो बिल्डिंग कोड के मापदंड पर फिट नहीं बैठतीं, उन पर पेनल्टी भी ली जा सकती है या प्रोजेक्ट ही निरस्त भी किया जा सकता है।

कहां है लैबोरेट्रीज
देशभर में विभिन्न चीजों की जांच के लिए लैबोरेट्रीज को मान्यता 'नेशनल एक्रीडिशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेट्रीजÓ की ओर से दी जाती है। यह बोर्ड सरकार के विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय के तहत बनाया गया है, जिसका मुख्यालय न्यू महरौली रोड पर सत्संग विहार मार्ग पर स्थित है। बिल्डिंग मटीरियल और मिट्टी आदि की जांच के लिए बोर्ड ने दिल्ली-एनसीआर में कई लैब्स को अधिकृत किया के लिए फोन नंबर 011-46499999 पर भी संपर्क कर सकते हैं।

भुज और लातूर में भूकंप के बाद जिंदगी
26 जनवरी, 2001 का वो दिन भुलाए नहीं भूलता। इस दिन गुजरात के भुज में आए भूकंप ने हजारों लोगों को लील लिया। कितने घायल हुए, कितने अपनों से बिछड़ गए। यही कहर 30 सितंबर, 1993 में महाराष्ट्र के लातूर में बरपा था। भुज में 13 हजार 805 लोग मरे, तो लातूर में 7 हजार 928 लोग काल के गाल में समा गए। लेकिन इन दोनों घटनाओं में जीत जिंदादीली और हिम्मत की हुई थी। लोगों ने हिम्मत से काम लिया। उन्होंने इस घटना से सबक लेते हुए खुद को तैयार किया। आज इन दोनों जगहों पर भूकंपरोधी इमारतें बन चुकीं हैं। ये इमारतें हल्के -फुल्के भूकंप के झटके को यूं ही सह सकती हैं।


ऐसे बनाएं भूकंपरोधी इमारतें
आइए जानते हैं भूकंपरोधी इमारतों को किस तकनीक के सहारे बनाया जा सकता है। भूकंप के दौरान इमारतों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए दो आधारभूत तकनीक को अपनाया जा सकता है। इनमें पहला, बेस आइसोलेसन डिवाइस और दूसरा सिसमिक डैंपर है।

बेस आइसोलेसन डिवाइस
इस तकनीक से इमारत को ग्राउंड से एक रोलर के सहारे अलग रखा जाता है। इससे भूकंप आने पर इमारत को प्रत्यक्ष रूप से झटका नहीं लगता है। और इमारत क्षतिग्रस्त नहीं हो पाती है।

सिसमिक डैंपर
इस तकनीक से एक विशेष डिवाइस के जरिए काम लिया जाता है। यह डिवाइस भूकंप के समय पैदा होने वाली एनर्जी को अवशोषित कर लेती है। इस तरह से भूकंप का झटका इमारत को महसूस नहीं होता है।
भुज में भूकंप के बाद इसी डिवाइस पर आधारित इमारते बनाई गईं हैं, जो सामान्य भूकंप के झटके को आसानी से सह सकती हैं।

क्या करें भूकंप के दौरान

भूकंप के दौरान जितना संभव हो सुरक्षित स्थान पर रुकें। ध्यान रखें कि अधिकतर भूकंप कम समय के लिए आते हंै। भूकंप आते ही खुद को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठायें-

यदि अंदर हैं तो
किसी मेज के नीचे बैठ जाएं अथवा किसी फर्नीचर या लकड़ी के तख्ते से खुद को कवर कर लें। इस अवस्था में तब तक बैठे रहें जब तक कि भूकंपन खतम न हो जाए। यदि टेबल या फर्नीचर न हो तो कमरे के कोने में बैठकर अपने हाथों से चेहरे व सिर को ढक लें।
कांच की खिड़कीयों, बाहरी दरवाजों और बिजली के उपकरण जो से दूर रहें।
अगर आप पलंग पर हैं तो वहीं रहें और अपने सिर को तकिए से कवर करें। यदि आप किसी ऐसी चीज के नीचे हैं जो गिर सकती है तो किसी नजदीकी सुरक्षित स्थान पर जाएं।
यदि आप जानते हैं कि दरवाजे की चौखट मजबूत है और भार संभाल सकती है तो उसकी ओट लें।
तब तक अंदर रहें जब तक कि भूकंप रुक न जाए और बाहर निकलना सुरक्षित न हो जाए। यह सिद्ध हो चुका है कि सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं तब होती है जब लोग बाहर की ओर या बिल्डिंग में ही इधर-उधर भागते हैं।
ध्यान रखें कि बिजली चली गई हो और फव्वारे और फायर अलार्म चालू हों।
लिफ्ट आदि का उपयोग न करें।

यदि बाहर हैं तो यदि आप घर से बाहर हैं तो वहीं रुकें।
इमारतों, स्ट्रीट लाइटों और बिजली के तारों से दूर रहें।
यदि खुले में हैं तो भूकंप रुकने तक वहीं ठहरें। सबसे ज्यादा खतरा इमारतों के ठीक बाहर होता है, बाहरी दरवाजों पर या बाहरी दीवारों के निकट।

गाड़ी चलाते वक्त
जितनी जल्दी हो रुक जाएं और गाड़ी के अंदर रहें। इमारत के समीप, पेड़ के नीचे, फ्लाईओवर के नीचे और बिजली की तारों के नीचे रुकने से बचें।
सावधानी से आगे बढ़ें। उन सड़कों, पुलों और ढलानों से बचें जोकि भूकंप से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

यदि मलबे के नीचे दबे हैं
माचिस न जलाएं
मलबे में हिलें और ढकेले नहीं।
अपने मुंह को रुमाल या कपड़े से ढकें।
पाइप अथवा दीवार पर ठकठकाएं ताकि सुरक्षा दल आपको ढूंढ सकें। यदि सीटी है तो उसका उपयोग करें। केवल तभी चिल्लाएं जब कोई और चारा न हो। चिल्लाने से आपके मुंह में धूल जा सकती है. Photo by Ekkadamaage.

Monday, November 22, 2010

प्रेस की निष्पक्षता के लिए बहुआयामी संघर्ष छेडऩा होगा

16 नवंबर को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस था। यह दिन भारत की पत्रकारिता के नाम था। पर यह भी अपने देश के अन्य दिवसों की तरह मनाया गया। जागरण जैसे अखबार ने अन्दर के पेज एक विज्ञापन छाप कर अपने जिम्मेदारी की इतिश्री समझ ली, तो जनसत्ता ने अगले दिन एक खबर लगाकर।
अन्य राष्ट्रीय दिवसों की तरह इस दिन भी एक गोष्ठी काआयोजन किया गया। केरल भवन में दिल्ली यूनियन ऑफजर्नलिस्ट्स (डीयूजे) और डीएमसीटी की ओर से इसकाआयोजन किया गया था। पत्रकारिता बचाओ के तहत हुएआयोजन में ज्यादातर की राय थी कि देश में बहुसंख्यकलोगों का आज भी भरोसा प्रिंट मीडिया पर ही है। इसलिएइसे बचाए रखने के लिए सभी मीडियाकर्मियों को एकजुटहोना होगा। पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर नेकहा कि जब पत्रकारिता में थे तब आज की अपेक्षा बेहतर माहौल था। आज वे ठेके पर पत्रकारों की नियुक्ति औरविविध स्तरों पर पेड न्यूज का बोलबाला देख रहे हैं, उस पर उन्हें आश्चर्य है। ऐसे में जरूरी है कि देश में मजबूतलोकतंत्र की खातिर प्रिंट विजुअल और वेब से जुड़े तमाम मीडियाकर्मी न
केवल प्रेस की निष्पक्षता बल्कि अपनेपेशे में भी अच्छा कर पाने के लिए हावी दिखें। उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुआयामी संघर्ष छेडऩा होगा। इसकेलिए संसद को घेरना और अदालतों में न्याय की गुहार लगानी पड़ सकती है।
नैयर ने यहां डीयूजे और डीएमसीटी की ओर से प्रकाशित 'पे्रस फार सेल : वाच डाग अनमास्कड' (बिकाऊ है प्रेसपहरेदार का हुआ पर्दाफाश) पुस्तिका का लोकार्पण भी किया। उन्होंने कहा कि प्रेस को हर हालत में व्यवस्थाविरोधी होना चाहिए। प्रेस आज आजाद कतई नहीं है। ऐसे में हमें यह सोचना होगा कि ऐसे इसे लोकतंत्र की रक्षाकी खातिर बचाया जाए। उन्होंने कहा, यह जरूरी है कि भारत सरकार मीडिया पर एक व्यापक आयोग नियुक्त करे।मैं मानता हूं कि प्रेस को निडर, मजबूत और प्रामाणिक बनाने के लिए न केवल सत्ता बल्कि विपक्ष केजनप्रतिनिधि भी इस आंदोलन में पत्रकारों के साथ होंगे। उन्होंने कहा कि आपातकाल के बाद प्रेस को वाकईआजादी मिली थी, लेकिन समय के साथ अखबार मालिकों के नजरिए में आए बदलाव के चलते लोकतंत्र का यहचौथा खंभा अब खासा दरक गया है। इसे बचाने की जिम्मेदारी अब पत्रकारों पर है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कहा करते थे कि लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए विपक्ष नहीं बल्कि एक मजबूत मीडिया जरूरी है।
पेड न्यूज मामलों की छानबीन के लिए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया की ओर से बनी दो सदस्यीय कमेटी के एकसदस्य प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने कहा हमने इस संबंध में पूरे देश का दौरा किया। कई सौ लोगों से बातचीत की।राजनीतिक लोगों ने बताया कि किस तरह चुनावों में प्रचार के लिए उनसे पैसों की फरमाइश की गई। कुछ नेफरमाइश पूरी की। उन्होंने सबूत भी दिए। लेकिन हमारी 35 हजार शब्दों की रपट के समांतर प्रेस परिषद केदवाबों के तहत 35 सौ शब्दों में एक दूसरी रपट तैयार की और जारी कर दी।
उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि ज्यादातर जिलों में उन्होंने ऐसे संवाददाता पाए जिन्हें पारिश्रामिक बतौरया तो कुछ भी नहीं या फिर महज पांच सौ रुपये मासिक तौर पर मिलते हैं। इसके साथ ही उन पर विज्ञापन भीलाने का दबाव होता है। ऐसे में वे पेड न्यूज के सहायक हो जाते है।
डीयूजे के महासचिव एसके पांडे ने कहा कि इसी विषय हिंदी में जारी हुई राम बहादुर राय की संपादित पुस्तककाली खबरों की कहानी' : '
खासी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता से जुड़े तमाम मीडियाकर्मियों कोमिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए। जिससे देश में लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर प्रेस का महत्व बना रहसके और उसे खरीद सकने का दंभ तोड़ा जा सके।
इस तरह के आयोजन हर कुछ दिन के बाद हुआ करते हैं। हर वक्ता अपनी बात रखते हैं। लोग सराहते भी हैं। याद करें प्रभाष जोशी और विनोद दुआ की बातों को। इन लोगों ने पिछले लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज की जम कर मुखालफत की, लेकिन हुआ क्या? उनकी आवाज भी दब गई। अब जरूरत बोलने की नहीं, कुछ कर दिखाने की है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब दूसरों के हक लिए लडऩे वाला चौथा खंभा बिखर जाएगा।

Wednesday, November 3, 2010

महिला सशक्तिकरण की हकीकत

महिलाओं को आरक्षण देने से उनका सशक्तिकरण होगा, यहीं सोचकर पंचायती चुनावों में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया गया। और लोकसभा में 33 फीसद आरक्षण देने की मुखालफत हो रही है। पर महिलाओं की वास्तविक स्थिति में क्या फर्क आया है, इसका अंदाजा इस विज्ञापन को देखकर लगाया जा सकता है।
देश की आधी आबादी को आरक्षण के सपने दिखाए गए, आरक्षण दिया गया और कानून को लागू भी किया गया। और लागू होने के बाद सरकार ने अपनी उपलब्धियां गिनवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन किसी ने भी कानून लागू होने के बाद यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर योजनाओं का हाल क्या है?
जिस आरक्षण कानून को लेकर सरकार बड़ी-बड़ी डींगें हांक रही है उसे कहां तक क्रियांवित किया जा रहा है? आखिर जिस महिला वोट बैंक, को आरक्षण दिया गया है उसे इसका क्या और कितना फायदा मिल रहा है महिलाओं की पहचान बनाने और सशक्तिकरण के लिए यह कानून किस हद तक कारगर हैं? अगर इन सभी मुद्दों की जांच की जाए तो नतीजा वही निकलेगा ढांक के तीन पात। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिल रहा है उत्तर प्रदेश में चल रहे त्रिस्तरीय चुनावों में। यहां अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों में महिला प्रत्याशी के साथ-साथ उसके पति और ससुर का नाम छापा जा रहा है और यहां तक कि किसी-किसी विज्ञापन में तो नाम है महिला प्रत्याशी का और फोटो है उसके पति का।
आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किसी की पत्नी, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े लगी हुई है।
सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिलाओं के आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुसलिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ रबर स्टाम्प होगी। सबने सोचा था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो पार्षद पति ही करते हैं। इस तरह से पार्षद पति का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। ऐसे कई वार्ड हैं जहां महिलाएं प्रतिनिधि तो हैं, पर किसी ने आज तक उनका चेहरा नहीं देखा है।
लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।

 
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