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Sunday, July 4, 2010

बंटी चोर लाइव..

तारीख 27 जून। रात 9 बजे। चैनल की दुनिया का सबसे कीमती प्राइम टाइम। खुद को देश का सर्वश्रेष्ठ और सबसे तेज कहने वाला चैनल आज तक। इस चैनल के अनुभवी और तेज-तर्रार एंकर अभिसार शर्मा। कार्यक्रम ओए बंटी, बंटी ओए। कार्यक्रम का गेस्ट सजा भुगत चुका शातिर चोर बंटी। एंकर चोर से पूछता है कि, आपकी कोई गर्लफ्रेंड है? चोर बोलता है, नहीं। लेकिन दबाव देने पर बेचारे को कहना पड़ता है कि उसकी एक विदेशी गर्लफ्रेंड है। एंकर उससे चोरी के संबंध में भी पूछता है। इस तरह के तमाम वाहियात ( मेरी नजर में) सवाल किए जाते हैं .

बनटन कर स्टूडियों में आए बंटी चोर का आरोप है कि फिल्म ओए लकी, लकी ओए की कहानी उसके जीवन पर आधारित है। इसलिए उसे उसका हिस्सा चाहिए। यदि हिस्सा नहीं मिला तो वह कोर्ट जाएगा। इस तरह से वह मीडिया को जरिया बनाकर फिल्म के निर्माता को धमकाता है।
ये तो रही पर्दे पर की कहानी। आइए जानते है पर्दे के पीछे की कहानी। एक रोज पहले लाइव इंडिया चैनल पर बंटी चोर लाइव दिखाया गया था। पूरे कार्यक्रम के दौरान लोगों ने लाइव एक चोर से बात की। चोर ने चोरी के गुर बताए। शायद चैनल की टीआरपी उस दिन कुछ बढ़ गई। इसी से प्रभावित आज तक ने बंटी को प्राइम टाइम में लाइव चलाया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी मीडिया (इलेक्ट्रानिक) के पास खबरों की कमी हो गयी है कि इस तरह के फालतू कार्यक्रम चलाए जा रहे है? एक चोर को बैठा कर चोरी के गुर पूछे जा रहे है। हर चैनल एक दूसरे की नकल कर रहा है। अब तक इंडिया टीवी खबर के इतर सब कुछ दिखाने के लिए मशहूर था, लेकिन अब तो न्यूज 24, लाइव इंडिया सब उसी के नक्शे कदम पर चल रहे हैं। एक तरफ तो इनके स्टूडियो पर नये-नये वैज्ञानिक आकर तांत्रिकों का भांडा फोड़ने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ बाबा लोग बैठ कर लोगों के दुख दूर करने का उपाय और भविष्य बताते हैं।
भोपाल गैस त्रासदी पर मीडिया ने जो स्टैंड लिया था, उससे ऐसा लगा था कि शायद पीड़ितो को न्याय मिल सकेगा। मामला कुछ दिनों तक खूब सुर्खियों में रहा। खूब बहस हुई। भोपाल, दिल्ली और अमेरिका ; अर्जुन सिंह, राजीव गांधी और एंडरसन चर्चा के केन्द्र में रहे। लेकिन परिणाम क्या हुआ? 26 साल से न्याय के लिए तड़प रही भोपाल की जनता आज भी तड़प रही है। आज यह मुद्दा कहां दब गया किसी को पता नहीं। लोकतंत्र का चौथा खम्भा टीआरपी की रेस में अपने सिद्धांतों को बेचते जा रहा है। इसकी नींव खोखली होती जा रही है। पहले मीडिया और मीडियाकर्मियों को आदर से देखा जाता था। यह इज्जत खतम होती जा रही है। अब वह समय आ गया है कि मीडिया अपने सिद्धांतों और दायित्वों पर आत्म मंथन करे। वरना देर हो जाएगी।

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