आम आदमी की यह अजब दास्तान
मैंने तो सोचा था कि आम आदमी वह है, जो पैसों की गर्मी से फैलता और कमी से सिकुड़ता है। जो महंगाई की आहट से कांप जाता है। आम आदमी तो दुखों का ढेर है। अभावों का दलदल है। मुकम्मल बयान है, चेहरे पर दर्द का गहरा निशान है।
बज गई चुनावी रणभेरी चढ़ गईं उनकी त्योरियां
बज गई चुनावी रणभेरी चढ़ गईं उनकी त्योरियां नाचने लगी उनकी आंखें बजने लगे उनके गाल बढ़ गई गरीबों की पूछ आम आदमी हुआ खास.



